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Finland और Sweden क्यों होना चाहते NATO में शामिल,रूस और यूरोप पर क्या होगा असर?

Finland और Sweden ने NATO की सदस्यता के लिए औपचारिक आवेदन कर दिया है. गुटनिर्पेक्ष रहे देश ने ये फैसला क्यों लिया?

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Finland और Sweden क्यों होना चाहते NATO में शामिल,रूस और यूरोप पर क्या होगा असर?
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रूस-यूक्रेन युद्ध (Russia-Ukraine War) के बीच यूरोप ही नहीं पूरी दुनिया के लिए सामरिक रूप से महत्वपूर्ण खबर सामने आई है. स्वीडन और फिनलैंड ने औपचारिक रूप से NATO में शामिल होने के लिए अपने आवेदन जमा कर दिए हैं. NATO के महासचिव, जेन्स स्टोलटेनबर्ग ने व्यक्तिगत रूप से ब्रसेल्स में इन दोनों नॉर्डिक देशों की सदस्यता के आवेदन स्वीकार किए.

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दोनों देशों का यह फैसला खास इसलिए है क्योंकि दोनों ही देश अपने रूस बनाम अन्य पश्चिमी देशों के संघर्ष में अपनी तटस्थता (न्यूट्रलिटी) के लंबे इतिहास और सैन्य गठबंधनों से बाहर रहने के लिए जाने जाते रहे हैं.

चलिए हम आपको आसान भाषा में समझाते हैं कि फिनलैंड और स्वीडन ने NATO में शामिल होने का मन क्यों बना लिया है, अगर ऐसा हुआ तो क्या बदलेगा, दोनों देशों के लिए इससे जुड़े क्या खतरे हैं और यूरोप के लिए NATO में दोनों देशों का आना वरदान साबित होगा या अभिशाप.

फिनलैंड और स्वीडन NATO में शामिल क्यों होना चाहते हैं?

NATO - उत्तरी अटलांटिक संधि संगठन (North Atlantic Treaty Organisation) - दूसरे विश्व युद्ध के खत्म होने के तुरंत बाद स्थापित 30-देशों का रक्षात्मक सैन्य गठबंधन है. वैसे तो इसका मुख्यालय Brussels में है लेकिन इसपर अमेरिका समेत अन्य परमाणु हथियार संपन्न अन्य पश्चिमी देशों का प्रभुत्व है.

दूसरी तरफ रूस, और विशेष रूप से वहां के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन, NATO को रक्षात्मक गठबंधन के रूप में नहीं देखते हैं. इसके ठीक विपरीत वह इसे रूस की सुरक्षा के लिए खतरा मानते हैं. 1991 में सोवियत यूनियन के विघटन के बाद NATO का पूर्व में रूस के पड़ोस में तेजी से विस्तार हुआ और इसे रूस ने हमेशा शक की निगाह से देखा.

अब इसी विस्तार में फिनलैंड और स्वीडन शामिल होना चाहते हैं. फिनलैंड रूस के साथ 1340 किलोमीटर का बॉर्डर शेयर करता है. अब तक यह रूस की दुश्मनी से बचने के लिए NATO से बाहर रहा है. फिनलैंड और रूस (तब का सोवियत संघ) दूसरे विश्व युद्ध में विरोधी पक्ष में थे.

फिनलैंड ने 1939-40 में सोवियत आक्रमण का बहादुरी से मुकाबला किया था. फिनलैंड ने अंतिम शांति समझौते में अपनी 10% जमीन खो दी और शीत युद्ध के दौरान भी उसने गुटनिरपेक्षता का दामन थामे रखा. लेकिन अब फिनलैंड के लिए कहानी बदल गयी है.

NATO में शामिल होने के लिए फिनलैंड की जनता का समर्थन सालों से केवल 20-25% था. लेकिन लेटेस्ट जनमत सर्वेक्षण के अनुसार यूक्रेन पर रूस के आक्रमण के बाद से NATO के लिए फिनलैंड की जनता का समर्थन रिकॉर्ड 76% तक पहुंच गया है.

स्वीडन में भी अब 57% आबादी देश के NATO में शामिल होने का समर्थन करती है, जो कि रूस-यूक्रेन युद्ध से पहले की तुलना में कहीं अधिक है. सवाल है कि रूस-यूक्रेन युद्ध ने ऐसा क्या बदल दिया है कि अपने गुटनिरपेक्ष स्टैंड के लिए जाने-जाने वाले फिनलैंड और स्वीडन NATO के साथ अपना भविष्य देख रहे हैं.

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दरअसल यूक्रेन पर हमला कर व्लादिमीर पुतिन ने उत्तरी यूरोप में लंबे समय से चली आ रही स्थिरता की भावना को चकनाचूर कर दिया है, जिससे स्वीडन और फिनलैंड असुरक्षित महसूस कर रहे हैं.

फिनलैंड की जनता के लिए यूक्रेन पर रूसी हमले ने उन परिचित खौफनाक यादों को फिर से ताजा कर दिया है जब 1939 के अंत में सोवियत यूनियन ने उनपर आक्रमण किया था और तीन महीने से अधिक समय युद्ध चला था. फिनलैंड की नजर रूस के साथ लगे अपनी 1340 KM की बॉर्डर पर है, और वह खुद से सवाल कर रहा है कि "क्या हमारे साथ भी रूस ऐसा कर सकता है?"

दूसरी तरफ हाल के वर्षों में स्वीडन ने भी रूस की तरफ से खतरा महसूस किया है. कई बार रूस के सैन्य विमान स्वीडन की संप्रभुता का उल्लंघन कर उसके एयरस्पेस में घुस चुके हैं. 2014 में स्वीडन को उन रिपोर्टों ने सन्न कर दिया गया था कि एक रूसी पनडुब्बी स्टॉकहोम द्वीपसमूह आ गयी है.

फिनलैंड और स्वीडन NATO में शामिल हुए तो क्या बदलेगा?

एक्सपर्ट्स का मानना है कि कुछ मायनों में ज्यादा कुछ नहीं बदलेगा. स्वीडन और फिनलैंड 1994 में ही NATO के ऑफिसियल पार्टनर बन गए थे. शीत युद्ध की समाप्ति के बाद से उन्होंने कई NATO मिशनों में भाग लिया है.

लेकिन सबसे बड़ा बदलाव NATO के "आर्टिकल 5" के कारण होगा, जिसके अनुसार NATO के किसी एक सदस्य देश पर हमला सभी पर हमले के बराबर होगा. NATO में शामिल होने के बाद पहली बार फिनलैंड और स्वीडन के पास परमाणु देशों (अमेरिका,यूनाइटेड किंगडम और फ्रांस) से सुरक्षा की गारंटी मिलेगी.

फिनलैंड और स्वीडन, दोनों देशों के लिए इससे जुड़े क्या खतरे हैं?

रूसी राष्ट्रपति पुतिन ने अक्सर यूक्रेन पर अपने आक्रमण को जायज ठहराने के लिए उसके द्वारा NATO में शामिल होने की संभावना का इस्तेमाल किया है. यही कारण है कि स्वीडन और फिनलैंड के इस सैन्य गठबंधन में शामिल होना रूस के लिए एक उकसावे के रूप में माना जाएगा.

रूस के विदेश मंत्रालय का कहना है कि दोनों देशों को इस तरह के कदम के "नतीजों" के बारे में चेतावनी दी गई है. पुतिन के करीबी सहयोगी दिमित्री मेदवेदेव और पूर्व रूसी राष्ट्रपति ने चेतावनी दी है कि NATO के विस्तार के बाद रूस पोलैंड और लिथुआनिया के बीच रूसी नियंत्रण वाले- Kaliningrad में परमाणु हथियार तैनात कर सकता है.
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इन खतरों को खारिज नहीं किया जा सकता. इसके अलावा रूस दोनों देशों के खिलाफ साइबर अटैक, प्रोपेगेंडा फैलाने और नियमित तौर पर हवाई क्षेत्र के उल्लंघन जैसे अधिक यथार्थवादी कदम उठा सकता है.

यूरोप के लिए NATO में दोनों देशों का आना वरदान साबित होगा या अभिशाप?

वरदान कैसे?

अगर हम सैन्य दृष्टिकोण से देखें तो फिनलैंड और स्वीडन के NATO में शामिल होने से यूरोप के उत्तरी क्षेत्र में NATO की रक्षात्मक शक्ति को एक बड़ा बल मिलेगा, जहां अभी रूस की सेना का प्रभाव कहीं अधिक है.

फिनलैंड के पास F35 फाइटर जेट है जबकि स्वीडन के शामिल होने से NATO के पास पैट्रियॉट मिसाइल बैटरी आएगी. फिनलैंड और स्वीडन दोनों की सेनाएं आर्कटिक क्षेत्र में युद्ध लड़ने में एक्सपर्ट हैं, उन्होंने स्कैंडिनेविया के बर्फ जमे हुए जंगलों में लड़ने और जीवित रहने के लिए ट्रेनिंग ले रखी है.

मालूम हो कि स्कैंडिनेविया का अर्थ उत्तरी यूरोप के देशों का एक समूह है जिसमें डेनमार्क, नॉर्वे और स्वीडन, कभी-कभी फिनलैंड, आइसलैंड और फरो आइलैंड्स भी शामिल हैं.

जब रूस ने दूसरे विश्व युद्ध के दौरान फिनलैंड पर आक्रमण किया था तो तो फिनलैंड की सेना ने आक्रमणकारियों को कड़ी चुनौती दी थी, जिससे उन्हें गंभीर नुकसान हुआ.

भौगोलिक रूप से बात करें तो फिनलैंड के जुड़ने से NATO को बहुत बड़ा अपर हैंड मिलेगा क्योंकि अभी रूस के साथ लगी इसकी सीमा फिर दोगुनी हो जाएगी यानी रूस और घिर जायेगा.

राजनीतिक रूप से बात करें तो फिनलैंड और स्वीडेन का जुड़ना पश्चिमी देशों को एक पाले में खड़ा करेगा और पुतिन को एक संकेत भेजेगा कि लगभग पूरा यूरोप एक संप्रभु देश के रूप में यूक्रेन पर आक्रमण के खिलाफ एकजुट है.

अभिशाप कैसे?

यहां जोखिम यह है कि रूस के ठीक बॉर्डर पर NATO का इतना बड़ा विस्तार मॉस्को को इतना क्रोधित कर देगा कि वह किसी न किसी रूप में इसका जवाब जरूर देगा.

जब रूसी राष्ट्रपति पुतिन ने इसके जवाब में "सैन्य तकनीकी उपाय" की धमकी दी, तो इसका मतलब दो चीजों से निकाला गया - रूस पश्चिम देशों के करीब सैनिकों और मिसाइलों को तैनात करके अपनी सीमाओं को मजबूत करेगा या संभवतः स्कैंडिनेविया इलाके में साइबर हमला करेगा. क्रेमलिन के प्रवक्ता दिमित्री पेसकोव ने पहले ही चेतावनी दी है कि फिनलैंड और स्वीडन के NATO में शामिल होने से "यूरोप को अधिक सुरक्षा नहीं मिलेगी".

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स्वीडन के घरेलू हथियार उद्योग को भी इसकी आर्थिक कीमत चुकानी होगी क्योंकि वह अपने खुद के हथियारों के बजाय NATO के हथियार खरीदने के लिए बाध्य होगा.

यूक्रेन के NATO में शामिल होने की “कोशिशों” का परिणाम यूक्रेन, यूरोप और पूरी दुनिया ने देख लिया है. यदि फिनलैंड और स्वीडन के NATO में शामिल होने के बाद रूस यह मानता है कि उनके उत्तरी हिस्से पर हुआ यह अचानक विस्तार रूस की सुरक्षा के लिए एक संभावित खतरा है, तो कोई नहीं जानता कि इस बार मॉस्को की प्रतिक्रिया क्या होगी?

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