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हर घर तिरंगाः शहीद खुदीराम बोस की कहानी, जिनकी चिता की राख के ताबीज बने

खुदीराम बोस को 18 साल की उम्र में 11 अगस्त 1908 को फांसी दे दी गई थी.

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11 अगस्त 1908 का दिन...मुजफ्फरपुर में एक क्रांतिकारी के गले में फंदा डाला जा रहा था और मात्र 18 साल का वो लड़का सीना तानकर खड़ा था. माथे पर एक शिकन तक नहीं थी और मुस्कुरा रहा था. इम्पीरियल अखबार ने ये खुदीराम बोस की फांसी के बाद लिखा था.

आज जब हम आजादी का अमृत महोत्सव मना रहे हैं, हर घर तिरंगा फहरा रहे हैं तो याद रखिएगा...उन क्रांतिकारियों को, जिनकी वजह से आज हम और आप अपने घरों पर गर्व से तिरंगा फहरा पा रहे हैं. उन्हीं में से एक हैं खुदीराम बोस. जिन्होंने 18 साल की उम्र में फांसी का फंदा चूम लिया ताकि...झंडा ऊंचा रहे हमारा.

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खुदीराम बोस से जुड़े किस्से

जब खुदीराम बोस की राख के ताबीज बनाए गए

इंपीरियल अखबार ने 1908 में लिखा था कि जब खुदीराम बोस का अंतिम संस्कार किया गया तो लोग डिब्बियां लेकर इंतजार कर रहे थे. बाद में माओं ने अपने बच्चों को खुदीराम बोस की चिता की राख से ताबीज बनाकर दिये, ताकि वो खुदीराम बोस जैसे बहादुर देशभक्त बनें.

विदेशी माल से भरे गोदाम को आग लगाई

मिदनापुर में खुदीराम बोस विदेशी वस्तुओं का विरोध कर रहे थे. लेकिन कई दुकानदार बार-बार समझाने के बाद भी विदेशी वस्तुओं को बेचने से नहीं रुक रहे थे. जब अनुरोध और चेतावनी का कोई असर दुकानदारों पर नहीं हुआ तो खुदीराम बोस ने विदेशी माल से भरे गोदाम को आग के हवाले कर दिया.

16 साल की उम्र में हवलदार को जड़ा मुक्का

1906 में मिदनापुर के पुराने जेल परिसर में एक कृषि प्रदर्शनी के आखिरी दिन जिलाधिकारी प्रमाणपत्र बांट रहे थे. दूसरी तरफ, उसी भीड़ के बीच खुदीराम वंदेमातरम की प्रतियां लोगों को बांट रहे थे. शिक्षक राम चन्द्र सेन ने उन्हें रोका. न मानने पर वहां मौजूद पुलिस को खबर कर दी गई. जब पुलिस पकड़ने के लिए उनकी तरफ आई तो वो हवलदार की नाक पर मुक्का मारकर फरारा हो गए. इसके लिए उन पर केस दर्ज हुआ लेकिन कम उम्र का हवाला देकर उन्हें जेल नहीं भेजा गया.

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किंग्सफोर्ड की हत्या का काम हाथ में लिया

खुदीराम बोस 1908 आते-आते मिदनापुर पुलिस की आंख में चढ़ गए थे. इसलिए परिवार के कहने पर वो कलकत्ता चले गए. जहां वो अरविंद घोष और बारिन घोष जैसे क्रांतिकारियों के संपर्क में आये. कलकत्ता में उन दिनों किंग्सफील्ड नाम का एक अंग्रेज अधिकारी हुआ करता था जो क्रांतिरियों पर बहुत जुल्म करता था. जब तक खुदीराम वहां पहुंचे तब तक किंग्सफील्ड का ट्रांसफर मुजफ्फरपुर हो गया था. लेकिन क्रांतिकारी उसे छोड़ना नहीं चाहते थे, लिहाजा किंग्सफील्ड को मारने का प्लान बना.

खुदीराम बोस ने किंग्सफील्ड को मारने की इच्छा जाहिर की और 10-11 अप्रैल को वो प्रफुल्ल चाकी के साथ मुजफ्फरपुर पहुंच गए. एक धर्मशाला को दोनों ने ठिकाना बनाया, वहां वो किंग्सफील्ड की फील्डिंग लगा रहे थे. तय हुआ कि, किंग्सफील्ड रोज क्लब जाता है, उसे वहीं ठिकाने लगाया जाएगा. तारीख 30 अप्रैल 1908 तय की गई. किंग्सफील्ड की बग्गी पर दोनों क्रांतिकारियों ने बम फेंका, लेकिन बाद में पता चला कि उस बग्गी में किंग्सफील्ड था ही नहीं. उसमें वकील प्रिंगल केनेडी की पत्नी और बेटी थी, जिनकी मौत हो गई.

इसके बाद खुदीराम बोस और प्रफुल्ल जब वहां से भागे तो उनके जूते और चादर घटनास्थल पर छूट गए. दोनों ने अलग-अलग रास्ते चुने और प्रफुल्ल चाकी को पुलिस ने घेर लिया तो उन्होंने खुद को गोली मार ली. इसके बाद 1 मई को खुदीराम बोस भी पकड़े गए, गिरफ्तारी के बाद उन्होंने जोर से वंदे मातरम् का नारा दिया और पुलिस के साथ चल दिये. 25 मई से उनके खिलाफ मुकदमे की शुरुआत हुई और 11 अगस्त 1908 को 18 साल की उम्र में खुदीराम बोस को फांसी दे दी गई.
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देशभक्त और नर्म दिल के मालिक

खुदीराम बोस की शख्सियत को इस तरीके से भी समझा जा सकता है कि, एक बार कासवंती नदी ने उनके पड़ोस के गांव में सबकुछ तबाह कर दिया. तब खुदीराम बोस और उनके साथियों ने वहां से लोगों को सुरक्षित निकालने के लिए खूब मेहनत की. एक और किस्सा भी खुदीराम की शख्सियत को हमारे सामने रखता है जब उन्होंने अपने पिता की कीमती शॉल जाड़े में ठिठुरते एक भिखारी को दे दी और जब उनकी दीदी ने कहा कि वो बेच देगा तो खुदीराम बोस का जवाब था कोई बात नहीं...पैसे भी उस गरीब के किसी काम में ही आएंगे.

खुदीराम बोस का शुरुआती जीवन

3 दिसंबर, 1889 को पश्चिम बंगाल के मिदनापुर के करीब हबीबपुर गांव में जन्मे खुदीराम के पिता त्रिलोक्यनाथ बसु नाराजोल स्टेट के तहसीलदार थे. मां लक्ष्मीप्रिया देवी ने बेटे के पैदा होने के बाद अकाल मृत्यु टालने के लिए प्रतीकस्वरूप उसे किसी को बेच दिया. उस दौर और इलाके के चलन के मुताबिक बहन अपरूपा ने तीन मुठ्ठी खुदी (चावल के छोटे-छोटे टुकड़े) देकर अपना भाई वापस ले लिया. चूंकि खुदी के बदले परिवार में बच्चे की वापसी हुई, इसलिए नाम दिया खुदीराम. खुदीराम तो बच गए, लेकिन उनके छह साल का होने तक माता-पिता दोनों का साया सिर से उठ गया. उनकी बड़ी बहन ने सारी जिम्मेदारियां निभाई, शादी के बाद भी अपने साथ रखा.

बंगला कवि ने ऐसे खुदीराम को किया था याद

18 साल बाद मशहूर बंगला कवि नजरुल इस्लाम ने लिखा था, ओ माताओं! क्या तुम एक बिन मां के बच्चे को फांसी पर चढ़ते देख सकती हो? तुम अपने बेटे की मंगलकामना के लिए तैंतीस करोड़ देवी-देवताओं की पूजा-अर्चना करती हो, किंतु क्या तुमने उन देवताओं से प्रार्थना की कि वे खुदीराम की रक्षा करें? क्या इसके लिए लज्जा अनुभव करती हो? मुझे मालूम है तुम्हारे पास मेरे सवालों का जवाब नहीं है.

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