इलेक्टोरल बॉन्ड: विपक्ष और मीडिया को डेढ़ साल बाद जगने के लिए बधाई

इलेक्टोरल बॉन्ड: विपक्ष और मीडिया को डेढ़ साल बाद जगने के लिए बधाई

ब्रेकिंग व्यूज

प्रोड्यूसर: कौशिकी कश्यप/कनिष्क दांगी

कैमरा: अभिषेक रंजन

एडिटर: मोहम्मद इरशाद आलम

संसद में इस समय इलेक्टोरल बॉन्ड फिर से चर्चा में है और खूब हंगामा हो रहा है. मगर हम बधाई देना चाहते है मीडिया को और विपक्ष को डेढ़ साल बाद जागने के लिए!

साल 2017 में कानून बनने के बाद इलेक्टोरल बॉन्ड का प्रावधान आया. द क्विंट ने मान्यता प्राप्त संस्थान से जांच कराया था जिसमें पता चला कि ये ट्रेसेबल है यानी इसमें डोनर का पता चल सकता है. और ये जानकारी सिर्फ सरकार को मिल सकती है, पब्लिक को नहीं.

इसका मतलब इलेक्टोरल बॉन्ड जिसे ये बताकर पेश किया गया कि ये काला धन रोकेगी, चुनाव सुधार में अहम भूमिका निभाएगी वो महज एक कहानी थी, सच्चाई उसके ठीक विपरीत है.

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समझते है कि आखिर अभी ये चर्चा में क्यों है?

एक RTI से ये पता चला कि RBI ने सरकार से कहा था कि ये बॉन्ड सही नहीं है और इससे मनी लॉन्डरिंग का खतरा बढ़ता है. इसके अलावा चुनाव आयोग ने भी आपत्ति जताते हुए कहा था कि इससे ब्लैक मनी का सर्कुलशन बढ़ेगा. मगर इन तमाम आपत्ति को दरकिनार करके सरकार इलेक्टोरल बॉन्ड लेकर आई.

आखिर इलेक्टोरल बांड क्या है?

इलेक्टोरल बॉन्ड एक बेयरर बॉन्ड है यानी कोई भी व्यक्ति, कॉरपोरेट घराना या संस्था SBI से ये बॉन्ड खरीद सकता है और राजनीतिक दलों को चंदे के रूप में दे सकता है. राजनीतिक दल इस बॉन्ड को बैंक में भुनाकर रकम हासिल करते हैं.

पहले राउंड का जब डोनेशन खत्म हुआ था तो ADR की एक रिसर्च में ये बात सामने आई थी कि डोनेशन का 90 % पैसा रूलिंग पार्टी बीजेपी के खाते में गई.

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इलेक्टोरल बॉन्ड की पारदर्शिता को जब SC में चैलेंज किया गया तो कोर्ट ने कहा कि ‘सील्ड कवर’ में हमें बताइए कि किसको कितना पैसा गया. आम जनता को इसकी खबर नहीं मिल सकी. ‘सील्ड कवर’ भी संस्थानों के बेअसर होने का एक टूल है.

ये भी जान लीजिए कि इलेक्टोरल बॉन्ड को लेकर एक प्रावधान है कि जिसके पास 1% वोट शेयर होगा वही चंदा ले सकता है. इस बात पर लॉ मिनिस्ट्री ने एतराज जताया मगर इसे भी दरकिनार कर दिया गया.

RTI में एक और खुलासा

RTI से एक और बात सामने आई है जिसे कांग्रेस भी मुद्दा बनाने की कोशिश कर रही है. ये कानून लोकसभा चुनाव में चंदा इकट्ठा करने के लिए बना था, मगर सरकार के शीर्ष स्तर पर दबाव बना के इसे विधानसभा के लिए भी लागू कर दिया गया.

लोकसभा चुनाव खत्म होने के बाद बताया गया कि लगभग 6000 करोड़ रुपये का डोनेशन हुआ. मगर हकीकत इन आंकड़ों से मीलों दूर है. जानकारों के मुताबिक इस चुनाव का अनुमानित खर्च 50,000-60,000 करोड़ था. तो अगर कोई ये मानता हो कि ये चुनाव सिर्फ चेक से आए हुई राशि से हुआ है तो वो सत्य से कोसों दूर है.

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इस पूरी प्रक्रिया को अपारदर्शी बनाया गया, एक डर का माहौल बनाया गया कि अगर कोई चाहे भी तो भी विपक्षी दलों को चंदा न दे सके. एजेंसियों का डर बिठाया गया. सरकार को मालूम है कि अगर किसी ने 100 रुपये के बॉन्ड में 90 रुपये उसे दिए तो बाकी के 10 रुपये कहां गए. प्रक्रिया तामझाम वाली है, लेकिन सरकार के लिए ये मुमकिन है. इसलिए विपक्षी पार्टियों को चंदा देने से डरते हैं डोनर!

इलेक्टोरल बॉन्ड से पहचान छिपाए जाने का दावा, पारदर्शिता का दावा, काला धन खत्म करने का दावा गलत है.

जब विवाद बढ़ा तो वित्त मंत्रालय ने PIB के जरिये एक बयान जारी किया कि ये ‘रैंडमाइज्ड सीरियल नंबर’ है यानी शब्दों के जाल में फंसाया गया.

मेनस्ट्रीम मीडिया के जरिये लोगों तक ये बात नहीं पहुंची, विपक्ष ने मुद्दे को गंभीरता से नहीं उठाया, देर से जागा. अब जब ये मामला गर्म है तो समझना होगा कि विपक्ष की फंडिंग पर वार, लोकतंत्र का दम घोंटने जैसा है. इस स्कैंडल की जांच होनी चाहिए और सच सामने आना चाहिए. क्योंकि मालिक जनता है, हुक्मरान नहीं!

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