दमन Vs नियंत्रण: लॉकडाउन के बाद क्या?

ये जो इंडिया है ना...इसे दमन से नियंत्रण में जाने की जरूरत है और जल्द.

Updated13 Apr 2020, 06:16 AM IST
वीडियो
4 min read

वीडियो एडिटर: मोहम्मद इब्राहीम

एक जरूरी शब्द है-दमन और एक दूसरा अहम शब्द है, असल में शायद ज्यादा जरूरी-नियंत्रण
लॉकडाउन कब और कैसे खत्म करना है, ये समझने के लिए हमें इन दोनों शब्दों को अच्छे से समझना बहुत जरूरी है.

दमन क्या है?

हमारे पास जो भी है, उससे कोरोनावायरस पर हमला, इसे खत्म करने के लिए पूरा लॉकडाउन. कोई हवाई यात्रा नहीं, कोई ट्रेन नहीं, सड़कें भी बंद. सब घर में. राष्ट्रीय स्तर पर सोशल डिस्टेंसिंग. कारोबार, फैक्ट्रियां, खेती सब बंद. लाखों बेरोजगार, इकनॉमी ठप, ये सब कोविड 19 को हराने के लिए हुआ.

तो क्या इस दमन ने काम किया है?


लॉकडाउन जब शुरू हुआ तो भारत में 500 पॉजिटिव केस थे और जब मैं ये वीडियो रिकॉर्ड कर रहा हूं तो 8500 से ज्यादा मामले. ये संख्या चार-पांच दिनों में दोगुनी भी हो सकती है. ये संख्या शायद अमेरिका की तरह नहीं लेकिन पूरे देश में लॉकडाउन से संख्या जितनी कम होनी चाहिए थी, शायद ये उतनी कम भी नहीं होगी. सबक ये है कि दमन से फायदा होता है लेकिन एक हद तक.

इसी मोड़ पर हम दूसरे शब्द पर आते हैं- नियंत्रण, कंट्रोल. इसका मतलब है कि जिले, तालुका और ब्लॉक लेवल तक अच्छी प्लानिंग, कोरोना कैसे फैल रहा है, इसके भरोसेमंद डेटा को समझदारी से इस्तेमाल करके हम इसे काबू में रखते हैं, हम कोरोना के फैलने को रोकते हैं और हम मौतों को कम से कम करते हैं.

जी हां, दमन और नियंत्रण , दोनों जरूरी हैं. लेकिन एक देश को ये जानना जरूरी है कि कब दमन की जरूरत है और कब नियंत्रण की. कम टेस्टिंग की क्षमता, कमतर स्वास्थ्य सुविधाएं और कोरोना के लगातार बढ़ते मामले और मौतें. 24 मार्च को हमें दमन की जरूरत थी ताकि चढ़ते ग्राफ को घटा सकें, कोरोना वायरस को फैलाव को धीमा कर सकें.

लेकिन अब कुछ लोग कह रहे हैं कि ये जो इंडिया है ना इसे कोरोना वायरस से लड़ने के लिए नियंत्रण की रणनीति अपनानी चाहिए. लेकिन नियंत्रण सियासी तौर पर जोखिम भरा काम है. हम कई मुख्यमंत्रियों को सुन चुके हैं ये कहते हुए कि लॉकडाउन को जारी रखना चाहिए. तो समझिए कि क्यों ?

क्योंकि लॉकडाउन के बाद, सोशल डिस्टेंसिंग के बाद, अगर कोरोना के मामले बढ़ते हैं, मौतें बढ़ती हैं तो पब्लिक सीएम साहब से सवाल पूछेगी और इसी असमंजस में मोदी सरकार भी है.

लेकिन सच बताऊं तो यही वक्त जब केंद्र और राज्य सरकारों को सियासी तौर पर कठिन फैसला करना है, वो फैसला जिसकी जरूरत है?


सरकार चाहे तो नियंत्रण के कई फॉर्मूले चुन सकती है. भीलवाड़ा मॉडल है, कंटेनमेंट जोन वाली रणनीति है, केरल का मॉडल है, महामारी के विशेषज्ञों ने और अर्थशास्त्रियों ने नियंत्रण के कई प्लान दिए हैं.

चलिए मैं आपको छोटे में समझाता हूं.

  1. जिन जिलों में कोरोना नही है, उसे खोल दें - देश के 736 जिलों में सिर्फ 290 जिलों में कोरोना के मामले सामने आए हैं. तो करीब 450 कोरोना फ्री हैं. इन जिलों से लॉकडाउन हटा लीजिए, यहां इकनॉमी को चलने दीजिए.
  2. धीरे-धीरे लॉकडाउन खत्म कीजिए - क्लस्टर कंटेनमेंट पर फोकस कीजिए, धीरे-धीरे यात्रा पर रोक को हटाइए, बुजुर्ग को आइसोलेट कीजिए, सार्वजनिक जगहों और दफ्तरों आदि में  सोशल डिस्टेंसिंग लागू कीजिए
  3. योजनाबद्ध कम्युनिटी टेस्टिंग - बड़ी संख्या में, पूरे देश में ताकि आप कोरोना के नए इलाकों को वक्त रहते पहचान पाएं. नए हॉटस्पॉट को बनने से पहले ही रोक दें.
  4. अपनी स्वास्थ्य सुविधाएं बढ़ाइए-ताकि लोग बीमार भी पड़ें तो ठीक हो जाएं और मौत की संख्या कम हो जाए.
  5. आर्थिक उपाय भी कीजिए - तुरंत, बाद में नहीं. मनरेगा का दायरा बढ़ाइए. सबसे गरीब लोगों को डायरेक्ट कैश ट्रांसफर कीजिए, गेहूं  की तैयार फसल को कटने दीजिए, उन्हें मंडियों तक पहुंचे दीजिए. इनकम टैक्स अभी ना लीजिए, छोटे और मझोले उद्योग जिंदा रह पाएं, इसके लिए उन्हें इमरजेंसी फंड दीजिए, कारोबार और खेती के लिए सस्ता कर्ज दीजिए, और ये सबको दीजिए.

ये सब करना, कोरोना को नियंत्रण में रखना है. ऐसा करेंगे तो कोरोना से भी निपट पाएंगे और आर्थिक संकट का इलाज भी कर पाएंगे



ये अलग बात है कि नियंत्रण वाली रणनीति, ज्यादा चुनौतिपूर्ण है. इसमें ज्यादा प्लानिंग की जरूरत है. इसमें केंद्र और राज्य सरकारों के बीच, मंत्रालयों के बीच, जिलों के बीच तालमेल की जरूरत होती है. क्या यही वजह है कि केंद्र से लेकर राज्य सरकारें चाहती हैं - ज्यादा लॉकडाउन, ज्यादा दमन. क्या उन्हें लगता है कि वो नियंत्रण वाले रास्ते पर नहीं  चल पाएंगी? हम नहीं  जानते. लेकिन पूरा लॉकडाउन खत्म न करने का ये एक बहाना  हो सकता है? है ना.


लॉकडाउन को जारी रखने का आर्थिक असर बड़ा होगा, इतनी नौकरियां जाएंगी कि हम कल्पना भी नहीं कर सकते . लाखों कारोबार तबाह हो जाएंगे... फसल खेतों और मंडियों में सड़ जाएगी. इससे गरीबों में भुखमरी की नौबत आ सकती है. किसानों की खुदकुशी बढ़ सकती है. क्या ऐसी मौतें कोरोना से हो रही मौतों से कम दुखद होंगी?


जो नेता सियासी जोखिम से डर रहे हैं उन्हें एक बात बता दूं - इकनॉमी को बचाने में नाकामी उतनी ही महंगी पड़ेगी जितनी कोरोना को रोकने की नाकामी.


इसलिए ये जो इंडिया है ना...इसे दमन से नियंत्रण में जाने की जरूरत है और जल्द. तब तक सेफ रहें.

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Published: 13 Apr 2020, 06:02 AM IST
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