कारगिल जंग के शहीद विजयंत की मां उनके हर जन्मदिन पर बनाती हैं खीर

कारगिल जंग के शहीद विजयंत की मां उनके हर जन्मदिन पर बनाती हैं खीर

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विजयंत थापर 22 साल के उस नौजवान का सपना देश के लिए अपना सबकुछ न्योछावर करने का था. बचपन से ही विजयंत का एक ही सपना था, आर्मी ज्वाइन करने का. उन्होंने अपने जीवन में कुछ और करने के लिए कभी सोचा ही नहीं. 26 दिसंबर को उनका जन्मदिन है. उनकी मां आज भी उनके हर जन्मदिन के मौके पर अपने बेटे के पसंद की खीर बनाना नहीं भूलती हैं.

कश्मीर में हुई थी पहली पोस्टिंग

विजयंत की पहली पोस्टिंग कश्मीर के कुपवाड़ा में हुई, जहां आतंक सर उठा रहा था.सेना में विजयंत को सिर्फ तीन महीने ही हुए थे, जब करगिल वॉर छिड़ी. विजयंत अपने कमांडिग ऑफिसर के कमांड पर द्रास पहुंचे, जहां बटालियन 2 राजपूताना राइफल्स को तोलोनिंग से दुश्मनों को मार भगाने का मिशन मिला. 12 जून 1999 को लगातार लड़ाई के बाद तोलोनिंग पर तिरंगा लहराया गया.

शहादत से पहले दुश्मनों को मार गिराया

विजयंत के सामने तोलोलिंग के बाद दूसरी चुनौती थी पिंपल्स और नॉल पर कब्जा करना, जहां से दुश्मन छिपकर गोलियां बरसा रहे था. पंद्रह हजार फीट की ऊंचाई और सीधी चढ़ाई भी विजयंत थापर के हौसलों को डिगा नहीं सकी. इस मुश्किल मिशन में उनकी टुकड़ी के कई जांबाज शहीद हो चुके थे, लेकिन विजयंत थापर आगे बढ़ने से रुके नहीं.

वक्त ने विजयंत को उस समय थाम लिया, जब एक सीधी गोली उनके माथे पर लगी और शहादत का तिलक कर गई. सिर्फ 6 महीनों की नौकरी ही विजयंत ने पूरी की और शहादत पर हंसते-हंसते दस्तखत कर दिया.

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