मार्टिन लूथर के सपने, कभी आएंगे ऐसे भी दिन अपने?

मार्टिन लूथर के सपने, कभी आएंगे ऐसे भी दिन अपने?

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वीडियो एडिटर: विवेक गुप्ता

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“दोस्तों, इस वक्त जब हम आज और कल की मुश्किलों से जूझ रहे हैं फिर भी आज आप सभी से कहता हूं, आज मेरा एक सपना है. ये वो सपना है जो अमेरिका के सपनों से गहराई से जुड़ा है.”
डॉ. मार्टिन लूथर किंग जूनियर, अमेरिकी सिविल राइट्स एक्टिविस्ट

28 अगस्त 1963 को, लिंकन मेमोरियल की सीढ़ियों से मार्टिन लूथर किंग जूनियर के इन शब्दों ने दुनिया पर एक अमिट छाप छोड़ी. ये किसी भी परिस्थिति का सामना कर रहे लोगों को प्रेरित करती है. तब अफ्रीकी अमेरिकी समुदाय के लिए हकों की मांग के साथ वॉशिंगटन सिविल राइट्स मार्च बुलाया गया था. अमेरिकी सिविल राइट्स एक्टिविस्ट, डॉ. मार्टिन लूथर किंग जूनियर ने वॉशिंगटन की ओर कूच के दौरान नौकरी और आजादी के लिए प्रभावशाली भाषण "मेरा एक सपना है" दिया था.

ये भाषण, तब 250,000 से ज्यादा लोगों ने सुना था.

56 साल बाद जब हम डॉ. मार्टिन लूथर किंग जूनियर के उस भाषण को भारत के संदर्भ से जोड़ें तो लगता है ये हमारे देश के खराब होते सामाजिक-राजनीतिक माहौल के खिलाफ दिए गए किसी भाषण का हिस्सा हो.

“मेरा सपना है कि एक दिन ये राष्ट्र सिद्धांतों के असल मायनों के लिए उठ खड़ा होगा, जिसमें हम पूरी सच्चाई से मानते हैं कि सभी को बराबर बनाया गया है.’’  

“सभी को बराबर बनाया गया है” इसका सच होना हमारे लिए सपना है. क्योंकि जब 17 अक्टूबर 2018 को हिंसक विरोध के बीच सबरीमाला मंदिर में महिलाओं ने एंट्री की कोशिश की तो उन्हें रोक दिया गया. महिलाओं को मंदिर में प्रवेश के बिना वापस लौटना पड़ा.

डॉ. मार्टिन लूथर किंग जूनियर ने कहा था,

मेरा सपना है कि एक दिन जॉर्जिया के लाल पहाड़ों पर गुलाम रहे लोगों के बच्चे और उन गुलामों के मालिकों के बच्चे भाईचारे के साथ बैठ सकें.

लेकिन ये हमारे देश के लिए सपना सरीखा है. 11 जुलाई 2016 को गुजरात के उना में मरी हुई गाय की खाल उतारने के आरोप में 4 दलितों की गौरक्षकों ने कपड़े उतरवाकर पिटाई की थी. हिंसक लोगों ने दलितों को कार से चेन में बांधकर बेरहमी से पीटा था, जिसका वीडियो भी वायरल हुआ था.

मेरा सपना है कि मेरे चारों बच्चे एक ऐसे देश में रहेंगे जहां उन्हें चमड़ी के रंग की वजह से नहीं बल्कि चरित्र से परखा और पहचाना जाएगा.

दिल्ली में नाइजीरियाई नागरिक को खंभे से बांधकर बुरी तरह पीटा गया. ये खबर हमें बताती है कि हम इस सपने से कितना दूर खड़े हैं.

जब ऐसा हो जाएगा, जब हम आजादी की आवाज को गूंजने देंगे, जब हम इसे हर गांव और हर राज्य और हर शहर से गूंजने देते हैं तब हम उस दिन को गति देने में सक्षम होंगे जब भगवान के सभी बच्चे, काले और गोरे लोग, यहूदी और अन्य जातियों के लोग, प्रोटेस्टेंट और कैथोलिक, हाथ मिलाने और पुराने धार्मिक गीत गाने में सक्षम होंगे ...  

दुनिया ने भले ही इन शब्दों से सीख ले ली हो लोकिन भारत के लिए उम्मीद भरे इन शब्दों को अपनाना आज भी एक सपना सा ही है.

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