इलेक्टोरल बॉन्ड स्कैम भारतीय लोकतंत्र के लिए खतरा क्यों है?

इलेक्टोरल बॉन्ड स्कैम भारतीय लोकतंत्र के लिए खतरा क्यों है?

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इलेक्टोरल बॉन्ड्स पर चर्चा इस समय सड़क से लेकर संसद तक हो रही है. लेकिन इस पर इतना बवाल आखिर है क्यों? क्विंट के एडिटोरियल डायरेक्टर संजय पुगलिया और पूनम अग्रवाल ने एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) के फाउंडिंग मेंबर जगदीप छोकर और RTI कार्यकर्त्ता अंजलि भारद्वाज से विशेष बातचीत की और इलेक्टोरल बॉन्ड्स से जुड़े हर मुद्दे को समझा.

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ADR ने अप्रैल 2018 में इलेक्टोरल बॉन्ड्स के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की थी. जगदीप छोकर बताते हैं कि कोर्ट ने सुनवाई के बाद कहा, " काफी महत्वपूर्ण मुद्दें उठाए गए हैं जिनका असर देश के इलेक्टोरल सिस्टम पर होता है." छोकर कहते है कि ये सुनवाई 12 अप्रैल 2018 को हुई थी लेकिन उसके बाद कुछ नहीं हुआ.

हमने कुछ दिन पहले ही एक नई एप्लीकेशन डाली है. RTI से कुछ जानकारियां मिली हैं जो इन बॉन्ड्स को लेकर हमारे शक को पुख्ता करती है. सबसे खतरनाक बात ये है कि एक अनुमान विपक्षी पार्टियों की फंडिंग बंद होने का है और सारा पैसा सत्ताधारी दल को मिल जाए. एक बार कोई सत्ता में आ गया तो उनको हटाना लगभग नामुमकिन हो जाएगा क्योंकि दूसरी पार्टियों के पास पैसा ही नहीं होगा.
जगदीप छोकर

RTI कार्यकर्त्ता अंजलि भारद्वाज का कहना है कि इलेक्टोरल बॉन्ड्स के इस मुद्दे को स्कैम ही कहना चाहिए. अंजलि कहती हैं, "इसमें जिस तरह लोगों की आंखों में धूल झोंककर सब कुछ हुआ, एक लोकतंत्र में जिस पारदर्शिता से काम होना चाहिए वो नहीं हुआ, ये सब स्कैम ही होता है."

सरकार जिस तरह से इलेक्टोरल बॉन्ड स्कीम लाई और चार कानूनों को फाइनेंस बिल के जरिए, वो अपने आप में लोगों के साथ छलावा है. क्योंकि कोई पब्लिक कंसल्टेशन नहीं हुई, किसी को कुछ मालूम नहीं था और सब इतने गोपनीय तरीके से हुआ कि शक पैदा होता है. सरकार ने गोपनीय ढंग से RBI एक्ट, इनकम टैक्स एक्ट, Companies एक्ट और FCRA एक्ट में बदलाव किए थे. इससे ये हुआ कि देश-विदेश की कोई भी कंपनी एक शेल कंपनी बनाकर कितना भी पैसा हमारे देश के इलेक्टोरल सिस्टम में डाल सकती है. और सत्ताधारी दल के अलावा किसी को मालूम नहीं होगा कि ये पैसा किसने दिया है. 
अंजलि भारद्वाज

क्या है इलेक्टोरल बॉन्ड्स?

इलेक्टोरल बॉन्ड स्कीम को मोदी सरकार में जनवरी 2018 में अधिसूचित किया गया था. कहा गया था कि इससे राजनीतिक फंडिंग में पारदर्शिता आएगी. लेकिन इसने चुनावी फंडिंग को अपारदर्शी बना गया है. राजनीतिक पार्टियों के लिए यह जरूरी नहीं है कि वह इलेक्टोरल बॉन्ड डोनर के बारे में चुनाव आयोग को बताए.

बीजेपी को मिला इलेक्टोरल बॉन्ड से सबसे ज्यादा चंदा

इलेक्शन कमीशन में जमा की गई रिपोर्ट के मुताबिक बीजेपी को साल 2017-18 में सबसे ज्यादा चंदा मिला है. बीजेपी को 210 करोड़ रुपये 2000 रुपये के रूप में मिले. देश की सभी राजनीतिक पार्टियों को इलेक्टोरल बॉन्ड के जरिए जो चंदा मिला, उसमें से बीजेपी का 94.5% हिस्सा है. जमा की गई रिपोर्ट में बताया गया है कि बीजेपी को 210 करोड़ रुपये मिले है. चुनावी चंदे के लेनदेन को पारदर्शी बनाने के लिए बने इलेक्टोरल बॉन्ड के जरिए इस साल सबसे अधिक चंदा बीजेपी को ही मिला है.

इलेक्टोरल बॉन्ड पर सरकार ने किया गुमराह

एक यूनिक, छिपे हुए, अल्फान्यूमेरिक कोड के जरिए सभी इलेक्टोरल बॉन्ड के लेन-देन का पता लगाया जा सकता है. इस छिपे हुए कोड को सिर्फ अल्ट्रा वॉयलेट (यूवी) लाइट में देखा जा सकता है. इस खबर का खुलासा क्विंट ने अप्रैल 2018 में किया था. द क्विंट के आर्टिकल के जवाब में वित्त मंत्रालय ने एक प्रेस रिलीज जारी की. इस रिलीज में वित्त मंत्रालय ने लोगों को गुमराह किया

रिलीज में लिखा था- स्टेट बैंक ऑफ इंडिया ये नंबर किसी भी इलेक्टोरल बॉन्ड के खरीदार या बॉन्ड जमा करने वाली राजनीतिक पार्टी की जानकारी के साथ नोट नहीं करता है.

लेकिन अब दस्तावेज बता रहे हैं कि छिपे हुए अल्फान्यूमेरिक कोड SBI रिकॉर्ड करता है. SBI वही बैंक है जिसने इलेक्टोरल बॉन्ड जारी किए हैं. स्टेट बैंक ऑफ इंडिया का ये डॉक्यूमेंट आरटीआई के जरिए प्राप्त किया गया है, जिसमें साफ-साफ लिखा है कि वित्त मंत्रालय ने बैंक को अल्फान्यूमेरिक कोड को रिकॉर्ड करने की इजाजत दी और कहा- 'इन जाकारियों का खास तौर पर कॉन्फिडेंशियल रखें, जिससे ये किसी भी तरीके से लीक न हो सकें.'

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