फेसबुक, गूगल, ट्विटर... अब छिड़ेगा ‘वर्ल्ड वॉर’?  

ऑस्ट्रेलिया सरकार से भिड़ गया फेसबुक, अब ऑस्ट्रेलिया जुटा रहा दुनिया का समर्थन

वीडियो एडिटर: कनिष्क दांगी

फेसबुक...पहले हमारा-आपका दोस्त बना और फिर न जाने कब नेताओं, सियासत से इसे मोहब्बत हो गई. सरकारों ने इसपर खूब लाड दिखाया. लेकिन ये लाडला अब बड़ा हो गया है. इतना कि इन सरकारों को अपनी चौधराहट दिखा रहा है. एक दो देश में नहीं, पूरी दुनिया में. पुशबैक तो कई जगह हो रहा था लेकिन ऑस्ट्रेलिया अड़ गया है. लेकिन फेसबुक-गूगल जैसे टेक महाकायों के खिलाफ ये अभी क्यों हो रहा है.

आग पहले से लगी थी, धमाका अब हुआ है

अचानक नहीं, इनपर नकेल की कोशिश लंबे समय से चल रही है. जब ऑस्ट्रेलिया ने कहा कि वो कानून ला रहा है. अब फेसबुक, गूगल को कंटेंट के इस्तेमाल के लिए मीडिया हाउस को पैसा देना होगा तो गूगल तो मान गया लेकिन फेसबुक अड़ गया. उसने ऑस्ट्रेलिया को अनफ्रेंड कर दिया. इसे ऑस्ट्रेलिया ने फेसबुक की ढिठाई बताया और फेसबुक ने वहां की सरकार की नासमझी.

रेगुलेट करने पर काफी पहले से हो रहा था विचार

ये सिलसिला काफी समय से चल रहा था. दुनियाभर की सरकारें इस पर विचार कर रही थीं कि इन बड़ी कंपनियों, खासतौर पर गूगल और फेसबुक को कैसे रेगुलेट किया जाए. कैसे एक फ्रेमवर्क में लाया जाए. फेसबुक ने ऑस्ट्रेलिया को ही सेंसर कर दिया. यानी वहां के लोग अब उसका कंटेंट न तो शेयर कर सकते हैं और न ही देख सकते हैं.

इसे ऑस्ट्रेलिया में अब एक तरह की बगावत माना जा रहा है. ऑस्ट्रेलियाई सरकार के मंत्री इसे अहंकार बता रहे हैं. वहीं फेसबुक का कहना है कि ऑस्ट्रेलिया की सरकार को ये समझ नहीं है कि इंटरनेट काम कैसे करता है. लेकिन विडंबना देखिए, ये फेसबुक वही है जो नेट न्यूट्रैलिटी लेकर एक स्पेशल कैटेगरी क्रिएट करना चाहता था. अब जब उसी तरीके से जब आज ऑस्ट्रेलिया रिटर्न कर रहा है तो फेसबुक को ऐतराज हो गया है. इसकी जद में गूगल भी आया, लेकिन उसने पब्लिशर्स के साथ करार कर लिया और फ्री कंटेंट के बदले रेवेन्यू देने की बात कही है. ये एक काफी बड़ी घटना है, जिसे देखते हुए बुनियादी बातों को समझना जरूरी है.

फेसबुक के सामने खड़े हैं दुनिया के कई देश

अब हम ये बार-बार इसलिए कह रहे हैं कि ये अचानक नहीं हुआ है, क्योंकि दुनियाभर के कई देश, खासकर यूरोपियन यूनियन, अमेरिका, यूके, कनाडा, फ्रांस, इंग्लैंड, जर्मनी और ऑस्ट्रेलिया जैसे देश इंटरनेट की इन बड़ी कंपनियों के बारे में कोई न कोई कानून बनाने की कोशिश कर रहे हैं. इस वक्त फेसबुक कम से कम 6-7 देशों के सामने खड़ा है और उनके बीच आमना-सामना हो रहा है कि इसे कैसे रेगुलेट किया जाए. फेसबुक की तरफ से इसका बड़ा प्रतिरोध आ रहा है. लेकिन गूगल इस मामले में थोड़ा अलग बिहेव कर रहा है.

ऑस्ट्रेलियाई पीएम ने कनाडा, फ्रांस, ब्रिटेन और भारत के पीएम को फोन कर ये बात बताई कि, क्यों दुनियाभर के देशों को फ्री स्पीच और अच्छी पत्रकारिता के पक्ष में खड़ा होना होगा. फेसबुक का कहना है कि दरअसल ऑस्ट्रेलिया की सरकार को इंटनरेट कैसा चलता है, ये समझ नहीं आता. इसीलिए ये सब हुआ है.

लेकिन यूरोपियन यूनियन ने भी सख्ती करने की कोशिश की थी, अमेरिका में भी कानून बनाने की बात हो रही है. इन सब जगहों पर पब्लिशर्स ने सरकारों को ये समझाया कि, हमारा रेवेन्यू लॉस हो रहा है. गूगल और फेसबुक 80 से लेकर 90 फीसदी रेवेन्यू लेकर चले जाते हैं. तो ये अनरेगुलेटेड मार्केट है.

रेगुलेशन के लिए एकजुट हो रहे देश

शुरू में सरकारों को ये बातें तो पता थीं, लेकिन वो रेगुलेशन के लिए कोई रास्ता नहीं ढूंढ़ पा रही थीं. लेकिन अब अमेरिका, कनाडा, फ्रांस, ईयू, जर्मनी, यूके और ऑस्ट्रेलिया एक फ्रेमवर्क लेकर सामने आ रहे हैं. इतने सारे देशों से फेसबुक का जो मुकाबला चल रहा है और ऑस्ट्रेलियाई पीएम दुनिया के देशों से बात कर रहे हैं तो देखना ये होगा कि कौन-कौन से देश इनके साथ जुड़ते हैं और उनकी लाइन का समर्थन करते हैं.

अमेरिका के पब्लिशर्स जो कानून का खाका तैयार कर रहे हैं और अमेरिकी सांसद उस पर विचार कर रहे हैं, वो भी इसी प्रकार का है जो ऑस्ट्रेलिया का है. इनके अलावा कनाडा भी इसी फॉरमेट को फॉलो करने की कोशिश कर रहा है.

लेकिन एक मजे की बात ये है कि टिम बर्नर्स ली, जो इंटरनेट के वर्ल्ड वाइड वेब के फाउंडर हैं, उनका मानना है कि ऑस्ट्रेलिया का कानून बहुत अच्छा तरीका नहीं है. इंटरनेट दार्शनिक रूप से फ्री एक्सेस है, उसे ही इंटरनेट कहते हैं. अगर आप ऐसा करेंगे कि वो किसी को मिले, किसी को न मिले तो ये ठीक नहीं होगा.

कैसे इस चुनौती से निपटेंगे लोकतांत्रिक देश?

लेकिन ऑस्ट्रेलिया ने शायद एक विवादास्पद पहल की है. इससे बेहतर तरीका कोई और हो सकता है. ये जो ऑस्ट्रेलिया बनाम फेसबुक का अचानक विवाद सामने आया है, ये एक बहुत खराब स्थिति पैदा करता है. अब यहां से फेसबुक बैकफुट पर जाएगा या फिर ऑस्ट्रेलिया की सरकार पीछे होगी, ये अभी कहा नहीं जा सकता है. जरूरी बात समझने की ये है कि जब ये बिग टेक कंपनियां बड़ी हो रही थीं, यूजर्स को फ्री में बहुत सारी सहूलियत मिल रही थी, लोग कनेक्ट हो रहे थे तो तब हमने इस बात का खयाल नहीं किया कि किसी दिन तो इसकी कीमत चुकानी होगी.

दूसरी बात ये है कि सरकारों को और राजनीतिक दलों को इन कंपनियों से वोटर तक पहुंचने में मदद मिल रही थी, तो इसकी ग्रोथ के समय वो लोग भी एक तरह से हमराज थे. अब ये सवाल खड़ा हो गया है कि अगर ये कंपनियां देशों और सरकारों से ज्यादा ताकतवर हो जाएं तो दुनियाभर के लोकतांत्रिक देश इसे कैसे हैंडल करेंगे, ये सबसे बड़ी चुनौती है.

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