इंडो-पाक बॉर्डर के पास महिलाओं तक नहीं पहुंचा PM मोदी का विकास

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राजस्थान चुनाव से पहले क्विंट पहुंच चुका है इंडो-पाक बॉर्डर के नजदीक बीड़ा गांव में, जहां पिछले सात साल में एक भी लड़की ने 12वीं क्लास पास नहीं की है. साथ ही सिर्फ 7 लड़कियां 10वीं पास हैं. यहां प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 'बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ' स्कीम के विस्तार की बात कही थी.

देश के 7वें सबसे ज्यादा आबादी वाले राज्य में बेटियां अपनी जिंदगी के लिए तो संघर्ष कर ही रही हैं, साथ ही पढ़ाई के लिए भी उन्हें संघर्ष करना पड़ रहा है.

स्कूल के हेडमास्टर भीम सिंह ने क्विंट से खास बातचीत में बताया कि राजस्थान के बीड़ा गांव में 10वीं की पढ़ाई साल 2011 से होने लगी. उससे पहले ये एक मिडिल स्कूल था.

बच्चियां सिर्फ 8-9वीं क्लास तक ही पढ़ती हैं. उसके बाद या तो उनकी शादी कर दी जाती है, या घर के कामों में लगा दिया जाता है, जिसके कारण वो स्कूल नहीं आ पातींं.
भीम सिंह, हेडमास्टर

बीड़ा गांव की यमुना और अन्या (जिनकी अब शादी हो चुकी है) ने बताया कि उन्हें किन कारणों से पढ़ाई छोड़नी पड़ी थी. यमुना का कहना है कि पहले स्कूल सिर्फ 10वीं तक ही था, इसलिए उन्हें पढ़ाई छोड़नी पड़ी.

इस बारे में अन्या कहती हैं:

हमारे गांव में 8वीं क्लास तक का ही स्कूल था, हमें बाहर जाना पड़ता था, इसलिए मैंने स्कूल छोड़ दिया. भाई ने जैसलमेर में जाकर पढ़ाई पूरी कर ली, लेकिन मैं जा नहीं पाई, इसलिए पढ़ाई छोड़ दी.

अन्या और यमुना जैसी न जाने कितनी लड़कियों को इन्हीं कारणों से स्कूल छोड़ना पड़ा. इन्‍हीं में से एक हैं कट्टू, जिन्होंने स्कूल में अकेली लड़की होने के कारण स्कूल छोड़ दिया.

‘‘मुझे स्कूल जाना पसंद था. मैं अकेली लड़की थी, बाकी सभी लड़के ही पढ़ रहे थे, इसलिए मैं स्कूल नहीं गई.’’

इतनी सब परेशानियों के बाद जो लड़कियां हिम्मत कर सारी कठिनाइयों को पार कर स्कूल जाती हैं, उन्हें स्कूल में पढ़ाने के लिए कोई टीचर नहीं मिल पाता. ये तब है, जब पूरे देश में राजस्थान का महिला साक्षरता रेट बहुत खराब है.

स्कूल में टीचरों की कमी पर हेडमास्टर का कहना है कि राजस्थान में काउंसिल सिस्टम के तहत टीचरों की भर्ती होती है और बॉर्डर के पास होने की वजह से इलाके में कनेक्टिविटी भी नहीं है. ढंग से आने-जाने का साधन भी नहीं मिल पाता है, इस वजह से कई लोग यहां आने में कतराते हैं.

राजस्थान में साक्षरता के आंकड़ों को देखकर सरकार और कई प्राइवेट स्टेक होल्डर चौकन्ने हो गए हैं, जिन्होंने पहले लड़कियों को पढ़ाई के लिए जागरूक करने के लिए स्कीम चलाई थी.

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