दिलचस्प है अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव प्रक्रिया,आसान भाषा में समझें 

अगर किसी भी उम्मीदवार को इलेक्टोरल वोट का बहुमत न मिले तो क्या होता है?

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(वीडियो एडिटर: आशुतोष भारद्वाज)

अमेरिका में राष्ट्रपति चुनाव का अभियान जोरों पर है. इस चुनाव की प्रक्रिया काफी जटिल मानी जाती है, जो कई फेज से गुजरती है. तो चलिए, इस जटिलता को आसान भाषा में समझने की कोशिश करते हैं.

सबसे पहले जानते हैं कि अमेरिका में कौन राष्ट्रपति पद का चुनाव लड़ सकता है? अमेरिकी संविधान के हिसाब से, राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनने के लिए 3 शर्तों को पूरा करना होता है:

  1. उम्मीदवार कम से कम 35 साल का हो
  2. वो अमेरिका का 'नैचुरल बॉर्न सिटिजन' हो
  3. कम से कम 14 साल अमेरिका में रहा हो

चलिए, अब बात करते हैं राष्ट्रपति चुनाव के अलग-अलग 4 अहम फेज की. जिसमें , पहला होता है प्राइमरी और कॉकस, दूसरा नेशनल कन्वेंशन, तीसरा जनरल इलेक्शन और चौथा इलेक्टोरल वोट से राष्ट्रपति का चुना जाना.

अमेरिका में राष्ट्रपति चुनाव का प्रोसेस प्राइमरी और कॉकस के साथ शुरू होता है. प्राइमरी और कॉकस दो अलग-अलग तरीके हैं, जिनका इस्तेमाल अलग-अलग पॉलिटिकल पार्टी के राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार चुनने के लिए किया जाता है. वैसे अमेरिका में दो ही पार्टी के इर्द-गिर्द राष्ट्रपति चुनाव होता है- रिपब्लिकन पार्टी और डेमोक्रेटिक पार्टी.

प्राइमरी और कॉकस से डेलिगेट्स का चुनाव होता है, ये वो लोग होते हैं जो पार्टी के नेशनल कन्वेंशन में अपने स्टेट का प्रतिनिधित्व करते हैं. जिस राष्ट्रपति उम्मीदवार को डेलिगेट्स का बहुमत मिलता है, वो पार्टी का राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार नामांकित हो जाता है.

सामान्य तौर पर, प्राइमरी में वोटिंग के लिए सीक्रेट बैलेट का इस्तेमाल होता है और इनको आयोजित कराने की जिम्मेदारी स्टेट और लोकल गवर्नमेंट उठाती हैं. मुख्य तौर पर प्राइमरी दो तरीके की होती हैं- क्लोज्ड और ओपन. क्लोज्ड प्राइमरी में सिर्फ पार्टी के रजिस्टर्ड वोटर ही हिस्सा ले सकते हैं. ओपन प्राइमरी में वोटरों के पार्टी के साथ पंजीकृत होने की जरूरत नहीं होती. पिछले कुछ सालों से अमेरिका के ज्यादातर राज्यों में प्राइमरी की प्रक्रिया ही अपनाई जा रही है.

बात कॉकस की करें तो ये प्राइवेट मीटिंग्स होती हैं, जिनका आयोजन पॉलिटिकल पार्टी करती हैं. इनको काउंटी या डिस्ट्रिक्ट जैसे किसी लेवल पर आयोजित किया जाता है. आम तौर पर कॉकस में हिस्सा लेने वाले लोग अपनी पसंद के उम्मीदवार के हिसाब से खुद को ग्रुप्स में बांट लेते हैं. हर ग्रुप स्पीच देता है और दूसरों को अपने ग्रुप में लाने की कोशिश करता है. इसके बाद ये ग्रुप डेलिगेट्स का चुनाव करते हैं.

पार्टी डेलिगेट स्लॉट की कुछ संख्या ऐसे लोगों के लिए भी रिजर्व रखती हैं, जो सामान्य तौर पर किसी उम्मीदवार विशेष के प्रति बाध्य नहीं होते, इन लोगों को सुपर डेलिगेट्स कहा जाता है.

प्राइमरी और कॉकस की जो प्रक्रियाएं यहां बताई गई हैं, वो आम तौर इस्तेमाल होती हैं. मगर इनको लेकर कुछ तय नहीं है, ऐसे में अलग-अलग जगह अलग-अलग प्रक्रियाएं देखने को मिल सकती हैं.

अब बात करते हैं नेशनल कन्वेंशन की. प्राइमरी और कॉकस के बाद अमेरिका की दोनों बड़ी पार्टी अपने-अपने नेशनल कन्वेंशन का आयोजन करती हैं, जिसमें पार्टी के राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति पद के उम्मीदवारों का आधिकारिक तौर पर नामांकन होता है. उपराष्ट्रपति पद के उम्मीदवार का ऐलान राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार करता है.

पिछले कुछ दशकों में नेशनल कन्वेंशन महज औपचारिकता पूरी करने और राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति पद के उम्मीदवारों को हाईलाइट करने के इवेंट के तौर पर ही नजर आए हैं. हालांकि, अगर प्राइमरी और कॉकस के दौरान अगर कोई साफ तौर पर उम्मीदवार के तौर पर उभरकर सामने नहीं आता, तो उम्मीदवार के नामांकन के लिए नेशनल कन्वेंशन में एक या कई चरण की वोटिंग की जरूरत पड़ सकती है. ऐसे में सामान्य तौर पर पहले चरण में उम्मीदवारों के लिए बाध्य डेलिगेट्स वोट करते हैं.

नेशनल कन्वेंशन के बाद राष्ट्रपति चुनाव का सबसे अहम फेज आता है- जनरल इलेक्शन. इस इलेक्शन के लिए हर स्टेट से, अमेरिकी संसद यानी कांग्रेस में उसके सदस्यों की संख्या के बराबर इलेक्टर्स चुने जाते हैं. वॉशिंगटन डीसी से 3 इलेक्टर्स चुने जाते हैं. इस तरह राष्ट्रपति चुनाव के लिए इलेक्टर्स की कुल संख्या 538 हो जाती है.

किसी उम्मीदवार को राष्ट्रपति बनने के लिए कम से कम 270 इलेक्टर्स के वोट की जरूरत होती है. इलेक्टर्स के ग्रुप को इलेक्टोरल कॉलेज कहते हैं.

इलेक्टर्स का चुना जाना भी दो चरण की प्रक्रिया होती है. पहले, हर राज्य में पॉलिटिकल पार्टी संभावित इलेक्टर्स के लिए नामांकन करती हैं. इसके बाद जनरल इलेक्शन के दौरान हर राज्य में वोटर इलेक्टर्स चुनने के लिए वोट करते हैं.

मगर बात यहीं खत्म नहीं हो जाती. इसके बाद राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार के लिए जिस तरह इलेक्टर्स के वोट का डिस्ट्रीब्यूशन होता है, वो भी कम दिलचस्प नहीं है. मेन और नेबरास्का को छोड़कर, बाकी सभी राज्यों और वॉशिंगटन डीसी में पॉपुलर वोट के आधार पर विनर-टेक-ऑल पॉलिसी अपनाई जाती है. उदाहरण के लिए इस पॉलिसी के तहत कैलिफोर्निया के सभी 55 इलेक्टोरल वोट उस उम्मीदवार को मिलेंगे, जो राज्य में पॉपुलर वोट यानी जनता के वोट का विजेता होगा.

ऐसे में यह भी देखने को मिलता है कि किसी उम्मीदवार को पूरे देश में ज्यादा पॉपुलर वोट मिल जाएं और वह फिर भी राष्ट्रपति चुनाव हार जाए.

साल 2016 के राष्ट्रपति चुनाव में ऐसा ही देखने को मिला था, जब डेमोक्रेटिक पार्टी की उम्मीदवार हिलेरी क्लिंटन को पूरे देश में रिपब्लिकन पार्टी के उम्मीदवार डोनाल्ड ट्रंप से ज्यादा पॉपुलर वोट मिले थे, लेकिन वह इलेक्टोरल वोट में पिछड़ने की वजह से चुनाव हार गईं. इससे पहले साल 2000, 1888, 1876 और 1824 के राष्ट्रपति चुनाव में भी ऐसी ही स्थिति सामने आई थी.

यहां एक सवाल यह भी उठता है कि क्या इलेक्टर्स अपने राज्य में पॉपुलर वोट के हिसाब से राष्ट्रपति उम्मीदवार को वोट करने के लिए बाध्य होते हैं?

अमेरिकी संविधान में इस तरह का कोई प्रावधान नहीं है. हालांकि कुछ राज्य में इलेक्टर्स पॉपुलर वोट के हिसाब से वोट करने के लिए बाध्य होते हैं. ये बाध्यता दो तरीके की होती है- राज्य के कानून की बाध्यता और पॉलिटिकल पार्टीज की शपथ की बाध्यता.

अगर कोई इलेक्टर उस उम्मीदवार को वोट न करे, जिसके लिए उसे पॉपुलर वोट के हिसाब से वोट करना चाहिए तो उसे ‘फेथलैस इलेक्टर’ कहा जाता है.

अगर किसी भी राष्ट्रपति उम्मीदवार को 270 इलेक्टोरल वोट नहीं मिलते, तो चुनाव प्रक्रिया कांग्रेस में चली जाती है. ऐसी स्थिति में हाउस ऑफ रिप्रजेंटेटिव राष्ट्रपति का चुनाव करता है और सीनेट उपराष्ट्रपति का.

आखिर में बात उन दो राज्यों की जो विनर-टेक-ऑल पॉलिसी नहीं अपनाते यानी कि मेन और नेबरास्का, वहां 'कांग्रेशनल डिस्ट्रिक्ट मेथड' अपनाया जाता है. इसके तहत ये राज्य स्टेट पोपुलर वोट विनर को दो इलेक्टोरल वोट अलोकेट करते हैं और फिर हर कांग्रेशनल डिस्ट्रिक्ट में पॉपुलर वोट विनर को एक-एक वोट मिलता है.

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