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कोरोना महामारी ने महिलाओं के लिए पीरियड्स को बनाया और मुश्किल

दुनियाभर से महिलाएं COVID19 में बदलती menstrual cycle पर अनुभव साझा कर रही हैं

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<div class="paragraphs"><p>heavy bleeding से लेकर no cycle- औरतें किस तरह तकलीफ उठा रही हैं</p></div>
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दुनिया भर में औरतों को अनोखे अनुभव हो रहे हैं लेकिन इस पर कोई स्टडी नहीं की जा रही कि कोविड (COVID-19) का मैन्स्ट्रुअल साइकिल (menstrual cycle) पर क्या असर होता है.

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मार्च में जब गायत्री कृष्णराज कोविड-19 पॉजिटिव हुई तो उसके पीरियड्स चल रहे थे. यह वह समय था जब देश महामारी की दूसरी लहर की चपेट में था. उसे एक हफ्ते तक तेज बुखार और जबरदस्त बदन दर्द रहा. छाती में भारीपन बना रहा. लेकिन सिर्फ इतना ही नहीं, उसे 60 दिन, यानी दो महीने तक हेवी ब्लीडिंग होती रही. बस, बीच में एकाध दिनों को छोड़कर.

द क्विंट के साथ अपना थकान भरा अनुभव साझा करते हुए गायत्री बताती है,

“कभी कभी मुझे महसूस भी नहीं होता था, लेकिन ब्लीडिंग होती रहती थी. मैं जानती थी कि यह एकदम अलग है. जिन दिनों हमेशा की तरह फ्लो नहीं भी हो रहा होता, तो भी एकाध बूंद जरूर दिखाई दे देती.”

डॉक्टरों ने उसके कुछ टेस्ट किए और पाया कि उसका हीमोग्लोबिन लेवल एकदम से गिर गया है. वह बताती है,

“चेन्नई में मेरी डॉक्टर ने कहा कि मैं जबरदस्त स्ट्रेस में थी. इसके अलावा कोविड से लड़ने के लिए मेरे शरीर ने काफी ऊर्जा खर्च की है. इन दोनों की वजह से मेरे शरीर के हार्मोन्स डांवाडोल हो गए हैं. लेकिन मैं इस बात से हैरान नहीं हुई कि हम इससे ज्यादा कुछ नहीं जानते.”
गायत्री
कोरोना महामारी ने महिलाओं के लिए पीरियड्स को बनाया और मुश्किल

दुनिया भर में औरतों ने अपने अपने अनुभवों को साझा किया है कि किस तरह कोरोनावायरस ने उनके मैन्स्ट्रुअल साइकिल्स को बिगाड़कर रख दिया है. लेकिन गायत्री की ही तरह दूसरी बहुत सी औरतें इस बात से हैरान नहीं हैं कि महामारी के इस पहलु पर शायद ही कोई अध्ययन किया गया है.

हेवी ब्लीडिंग से लेकर नो साइकिल- औरतें किस तरह तकलीफ उठा रही हैं

पुणे की 28 साल की फार्मासिस्ट रूपा जैन को जून 2020 में पहली बार कोरोनावायरस हुआ, और फिर नवंबर 2020 में दोबारा वह इसके कब्जे में आ गईं. तब से उनका पीरियड साइकिल रेगुलर नहीं है, और खून में क्लॉटिंग भी बढ़ गई है.

“मेरे पीरियड्स समय पर होते थे. लेकिन अब लगता है, मेरे शरीर ने आपा खो दिया है. कई बार मेरा साइकिल सिर्फ 15 दिनों का होता है, और फ्लो भी बहुत ज्यादा होता है. कई बार पीरियड्स होते ही नहीं. मतलब कई साइकिल मिस हो जाते हैं. यह एक बुरे सपने जैसा है. सबसे बुरी बात यह है कि इसकी कोई वजह नहीं पता. क्या स्ट्रेस की वजह से ऐसा होता है? हो सकता है. क्या वायरस ने मेरे शरीर को बर्बाद कर दिया है? हो सकता है. लेकिन रिसर्चर्स इस पर स्टडी क्यों नहीं कर रहे? क्या सिर्फ बच्चे पैदा करने के अलावा हमारा कोई महत्व नहीं है?”
रूपा ने क्विंट से कहा
कोरोना महामारी ने महिलाओं के लिए पीरियड्स को बनाया और मुश्किल
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वह कहती हैं, “यह दर्द बर्दाश्त से बाहर है. मैं खाना नहीं खा पाती, और न ही सो पाती हूं. मैं पहले जैसी होना चाहती हूं, नहीं चाहती कि लगातार बिस्तर पर पड़ी रहूं.”

श्रीयंका सिंह का नोएडा में एक छोटा सा बिजनेस है. प्री मैन्स्ट्रूअल सिंड्रोम यानी पीएमएस को अक्सर लोग नजरंदाज कर दिया करते हैं, लेकिन अब वह बहुत परेशान कर रहा है. जैसा कि श्रीयंका कहती हैं, उनके परिवार से लेकर दोस्तों तक, कोई नहीं समझ सकता है कि उन पर क्या गुजर रही है.

“18 साल की उम्र में मुझे पीसीओएस हुआ था. इसलिए पिछले 10 साल से मेरा साइकिल रेगुलर नहीं रहता. लेकिन ऐसा तजुर्बा मुझे पहले नहीं हुआ. मुझे अजीबो गरीब किस्म के मूड स्विंग्स होते हैं. मेरी एन्जाइटी बढ़ गई है. पीरियड के दो दिन पहले से मैं चल फिर नहीं सकती. मुझे बहुत थकान होती है, और मैं लगातार रोती रहती हूं. लोग इसने नजरंदाज करते हैं और कहते हैं कि ऐसा सभी को होता है. लेकिन ऐसा सबको नहीं होता.”
श्रीयंका सिंह

कोविड-19 वायरस और मैन्स्ट्रुएशन पर सिर्फ एक स्टडी

कोविड संक्रमित महिलाओं के मैन्स्ट्रुएशन, सेक्स हार्मोन्स और ओवेरियन रिजर्व्स पर सार्स-कोवि-2 का क्या असर होता है, इस पर सिर्फ एक स्टडी हुई है. यह स्टडी वुहान, चीन में हुई है और सितंबर 2020 में इसे प्रकाशित किया गया है.

177 महिला मरीजों के मैन्स्ट्रुएशन डेटा की जांच करके रिसर्चर्स ने पाया कि 45 मरीजों के मैन्स्ट्रुएशन वॉल्यूम में बदलाव हुआ (25 प्रतिशत) और 50 मरीजों का मैन्स्ट्रुअल साइकिल बदल गया (28 प्रतिशत). वॉल्यूम में कमी हुई (20 प्रतिशत) और साइकिल लंबा खिंच गया (19 प्रतिशत). प्रजनन आयु वर्ग की महिलाओं के औसत सेक्स हार्मोन और एएमएच कॉन्सेनट्रेशन बाकी लोगों से अलग नहीं थे. इसी स्टडी में यह भी कहा गया कि कोरोनावायरस से संक्रमित हर पांच में से एक महिला के पीरियड्स पर कुछ न कुछ असर जरूर हुआ है.
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औरतों की सेहत को दरकिनार करना बंद कीजिए

भारत में डॉ. शहला जमाल सोसायटी ऑफ मेन्स्ट्रुअल डिसऑर्डर्स एंड हाइजीन मैनेजमेंट के साथ जुड़ी हैं. यह गायनाकोलॉजिस्ट्स की एक इंडिपेंडेंट बॉडी है और डॉ. शहला अपनी टीम के साथ उसके लिए सर्वे कर रही हैं. वह कहती हैं, “इन समस्याओं की कोई वजह हमें नहीं पता और यह जरूरी है कि इस पर अध्ययन करने के लिए हम अपने संसाधनों का इस्तेमाल करें.”

इस सर्वे में कम से कम 21 प्रतिशत महिलाओं ने कहा कि कोविड-19 के बाद उनका मैन्स्ट्रुअल साइकिल हेवी (22 प्रतिशत) या दर्द भरा है (34 प्रतिशत).
“फिलहाल हम इसकी कोई ठोस वजह नहीं बता पा रहे, लेकिन ज्यादातर मामलों में स्ट्रेस, एन्जाइटी, कुपोषण और जीवन शैली में बदलाव इसकी वजह हो सकता है. लेकिन हम ऐसा कैसे कह सकते हैं, अगर कोई स्टडी हुई ही न हो तो? हम शिकायत कर सकते हैं, या इस पर काम कर सकते हैं. हमारे देश में प्रशिक्षित प्रोफेशनल्स हैं जो ऐसी स्टडी कर सकते हैं.”
डॉ. शहला जमाल

एशिया सेफ एबॉर्शन पार्टनरशिप (एएसएपी) की डॉ. सुचित्रा दलवी कहती हैं कि आधुनिक मेडिसिन और पेट्रिआकी ने औरतों को सिर्फ उस साधन के रूप में देखा जो संतति यानी आगे आने वाली पीढ़ी को जन्म देती है. वह कहती हैं,

“जैसे अगर आप गंभीर रूप से बीमार हों या स्ट्रेस का शिकार हों, आपका एग्जाम या नौकरी का इंटरव्यू होने वाला हो, या आप दूसरे शहर जा रही हों तो आपका शरीर तनावपूर्ण स्थिति में होता है. ऐसे हालात में यह सुरक्षित नहीं होता कि आप प्रेग्नेंट हो जाएं. आम तौर पर आपका शरीर एक या दो साइकिल को रोक देता है, या इस दौरान पीरियड्स रेगुलर नहीं होते. गंभीर बीमारियों जैसे ट्यूबरक्लोसिस वाली महिलाओं के भी पीरियड्स अनियमित हो जाते हैं.”
"तो, अब यह समझा जा रहा है कि कोविड वायरस मैन्स्ट्रुअल साइकिल में रुकावट नहीं पैदा करता. हां महामारी का असर यह हुआ है कि इसके साइकिल पर असर हो रहा है. महिलाओं ने कभी यह अनुभव नहीं किया था. पिछले 100 सालों में हम कभी इतने प्रभावित नहीं हुए थे. लेकिन आधुनिक मेडिसिन की पितृ सोच की वजह से बड़े पैमाने पर कोई स्टडी नहीं हुई, कोई डेटा जमा नहीं किया गया है."
डॉ. सुचित्रा दलवी
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डॉ. दलवी जिका वायरस महामारी का जिक्र करती हैं. वह कहती हैं कि जब बच्चे विकृतियों के साथ पैदा होने लगे, तब सबने इस बारे में दिलचस्पी दिखाई कि इस वायरस का गर्भवती महिलाओं पर क्या असर होता है. वह कहती हैं,

“अब भी मेडिसिन में डीफॉल्ट शरीर एक पुरुष का शरीर होता है. अगर मैं किसी नॉन मेडिकल व्यक्ति से पूछूंगी कि आप हार्ट अटैक के बारे में क्या जानते हैं तो वह कहेगा कि इसमें छाती में दर्द होता है, पसीना आता है, बाएं हाथ में दर्द होता है. लेकिन अगर औरतों को हार्ट अटैक होता है तो इनमें से शायद कोई लक्षण दिखाई दें. उनका जी मिचलाता है और पसीना आता है. लेकिन हम इन लक्षणों पर ध्यान नहीं देते क्योंकि हमने इस पर स्टडी की ही नहीं है. औरतें अध्ययनों का हिस्सा कभी रही ही नहीं. उन्हें हमेशा दरकिनार किया गया है, खेल से बाहर रखा गया है.”

29 साल की गायनाकोलॉजिस्ट डॉ. अनीषा शेट्टी कहती हैं, “फिलहाल हम गेम ऑफ थोर्न्स के कैरेक्टर जोन स्नो की तरह हैं. हमें कुछ नहीं पता.” डॉ. शेट्टी ने अभी मेडिकल स्कूल की पढ़ाई पूरी की है.वह कहती हैं,

डॉ. शेट्टी ने कहा, “हम भले ही उस पर ध्यान न दें, लेकिन हमारा मैन्स्ट्रुअल साइकिल हमारी रोजमर्रा की जिंदगी को प्रभावित करता है. अगर मैन्स्ट्र्अल साइकिल कोविड-19 की वजह से प्रभावित हुआ है तो औरतों को इसके बारे में पता होना चाहिए. हमें पता होना चाहिए कि इससे कैसे निपटा जा सकता है. इसके लिए हमें अध्ययनों का हिस्सा बनाया जाना चाहिए. कोरोनावायरस एक नया वायरस है और इस पर अध्ययन में कम से कम 10 साल तो लगेंगे ही. इसके बाद ही कोई साफ बात कही जा सकती है. अब सभी औरतों रिसर्च की मांग कर रही हैं. कम से कम इतना तो किया जा सकता है.”

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