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मीराबाई चानू का ओलंपिक मेडल जीतना असली फेमिनिज्म: इस दलील में दिक्कत है

एक तरफ लड़कियां आसमान छू रही हैं, और दूसरी तरफ लड़कियां अपने पसंद के कपड़े तक नहीं पहन सकती हैं.

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<div class="paragraphs"><p>टोक्यो ओलंपिक्स में मीराबाई चानू ने सिल्वर मेडल जीता</p></div>
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जब महिलाओं को लेकर छोटी-छोटी आजादी की बात की जाती है तो कुछ लोगों का कहना होता है कि महिलाएं तो स्पेस (अंतरिक्ष) में जा रही है, ये कपड़ों पर अटकी है. अंतरिक्ष की बातें करके वे भुला देना चाहते है कि उसी समय किसी गांव घर में लड़की को सिर्फ इसलिए पिटाई कर करके मार दिया जाता है, क्योंकि उसने जीन्स टॉप पहन लिया, जबकि परिवार के हिसाब से उसको सूट सलवार पहनकर, दुपट्टे से सीने को ढकना था.

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22 जुलाई 2021 को खबर छपती है कि यूपी के देवरिया में, 17 साल की, नेहा पासवान (Neha Paswaan) को उसके चाचा और दादा ने मार दिया, सिर्फ इसलिए कि दादा और चाचा को लड़की का जीन्स पहनना पसंद नहीं था. इस संदर्भ में उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत का बयान याद करिए. जिसमें वे कहते हैं कि रिप्ड जीन्स पहनने वाली महिलाएं बच्चों को क्या ही संस्कार दे सकती हैं! उनका कहना है कि वो मां अच्छी नहीं होती है जो ऐसी जीन्स पहनती है.

नेताओं मंत्रियों के ऐसे बयान उन लोगों के लिए बहुत महत्व रखते हैं, जो उनको आदर्श मानते हैं. अगर, आदर्शों के मुंह से जीन्स की बुराई सुनकर, घर वाले जीन्स पहनने वाली लड़की को पीटे तो क्या ही ताज्जुब होगा!

एक तरफ लड़कियां आसमान छू रही हैं, और दूसरी तरफ लड़कियां अपने पसंद के कपड़े तक नहीं पहन सकती हैं. लेकिन ये आसमान छूने वाली लड़कियां हैं कौन? इनकी घरेलू परवरिश, स्कूल, कॉलेज, समाज और संस्थान वैसे ही हैं, जैसे उन लड़कियों के जिनको अभी पसंद के कपड़ों की आजादी भी नहीं मिली है? यूपी के देवरिया के गांव या कस्बे के उसी माहौल की लड़की क्या अंतरिक्ष में जाने की कल्पना सहजता से कर सकती है और क्या इस कल्पना को वास्तविक पंख लग सकते हैं. साफ तौर पर इसका जवाब है - ना.

हालांकि ऐसा भी नहीं है कि अमेरिका के पश्चिम में ही महिलाओं के लिए सब कुछ ठीक चल रहा है. ऐसा भी नहीं है कि अंतरिक्ष से जुड़ी औरतों को पुरुष वर्चस्व से जूझना नहीं पड़ रहा है. अमेरिकी अंतरिक्ष संस्थान, नासा (नेशनल एरोनॉटिक्स एंड स्पेस एडमिनिस्ट्रेशन) की बार-बार आलोचना होने के बाद नासा ने 2019 में 'पहला ऑल वीमेन स्पेस वॉक' लांच किया, जिसमें जेसिका मेयर और क्रिस्टीना कोच ने अपनी टीम के साथ, अंतरिक्ष की यात्रा पूरी की. अमेरिकी अंतरिक्ष मिशन में अब डायवर्सिटी पर काफी जोर है, इसलिए अंतरिक्ष में जाने वाली टीम में विभिन्न नस्ल जैसे ब्लैक, एशियन के लोग होते हैं और जेंडर विविधता का भी ध्यान रखा जाता है. कल्पना चावला के अंतरिक्ष यात्रा में जाने को इस संदर्भ के साथ देखा जाना चाहिए.

इतना ही नहीं, जेंडर भेदभाव को कम करने के लिए नासा ने एक कदम और उठाया. नासा ने अपने मिशन मून की घोषणा करते हुए बताया कि वे एक नए प्रोजेक्ट 'आर्टेमिस' पर काम कर रहे हैं, जिसमें महिला एस्ट्रोनॉट को चांद पर भेजा जाएगा. चांद की पहली यात्रा नील आर्मस्ट्रांग और टीम ने अपोलो 11 मिशन के तहत 1969 में की थी. उस तीन सदस्यीय टीम में कोई महिला नहीं थी. यानी ये नहीं कहा जा सकता कि अंतरिक्ष मिशन और उस पर काम कर रहे संस्थान में पेट्रिआर्कि/पुरुष वर्चस्व नहीं है. स्पेस जाने वाली पहली महिला वैलेंटीना टेरेशकोवा थी जो रूसी थी. वे 1963 में अंतरिक्ष यात्रा पर गई थी.

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दूसरी तरफ, स्पेस प्रोजेक्ट्स में जितने भी प्राइवेट इन्वेस्टर्स है, उनमें एक भी बड़ा नाम किसी महिला का नहीं है.

भारत में ये कहकर कि महिलाओं की स्थिति इतनी अच्छी है कि वे अंतरिक्ष में जा रही है, ये बताने की कोशिश होती है कि स्त्री-पुरुष भेद तो पुराने दौर की बात है. अब तो औरतें जो चाहें कर सकती हैं और जो वे नहीं कर रही हैं, उसके लिए वे खुद जिम्मेदार हैं. इस तरह की दुहाई देकर लोग भारतीय वास्तविकता की अनदेखी करना चाहते हैं, जहां स्त्रियों को बराबरी तो दूर की बात सामान्य मानवाधिकारों के लिए भी जूझना पड़ रहा है. यहां यौन हिंसा अभी भी बहुत बड़ी समस्या है और गैरबराबरी इतनी कि लड़कियों को जन्म लेने के लिए भी संघर्ष करना पड़ रहा

महिलाओं के प्रति हो रहे भेदभाव को छिपाने के लिए उन्हें लिबरेटेड और एंपावर्ड बताने को ब्रिटिश जर्नलिस्ट और लेखक हेलेन लेविस ने अपनी किताब 'डिफिकल्ट वुमन' में 'फील गुड इंस्पिरेशन पॉर्न' कहा है. जिसका मतलब है कि महिलाओं के अचीवमेंट दिखाकर उनके साथ हो रहे भेदभाव को ढकने की कोशिश करना. इस तरह से जो नैरेटिव या विमर्श स्थापित करने की कोशिश होती है, उसके पीछे मंशा ये होती है कि महिलाओं की समस्याओं को उनकी निजी समस्या के तौर पर दिखाया जाए ताकि उन्हें पेश आने वाली समस्याओं के लिए उन्हें ही जिम्मेदार ठहरा दिया जाए.

इसी तरह का माहौल मीराबाई साईखोम चानू की ओलंपिक जीत के बाद बनने लगा. खास तरह के लोग लिखने पढ़ने वाली लड़कियों को टारगेट करने लगे कि असल फेमिनिज्म तो खिलाड़ी कर रही हैं. पढ़ने-लिखने वाली या शहरी कामकाजी महिलाएं तो बस यूं ही बेकार हैं. ये दरअसल दो तरीके से खतरनाक है. ऐसा करने वाले चानू के संघर्ष को महिमामंडित यानी ग्लोरिफाई करके उन परिस्थितियों को वैधता दे रहे हैं, जो दरअसल एक सभ्य या विकसित समाज में होनी ही नहीं चाहिए. मीराबाई चानू को अगर बुनियादी किस्म के संघर्ष करने पड़े तो सवाल ये भी पूछा जाना चाहिए कि उन्हें ये समस्याएं आई ही क्यों और ऐसा क्या किया जाना चाहिए कि एक महिला खिलाड़ी को ऐसी समस्याओं से न जूझना पड़े.

रोल मॉडल होना अच्छी बात है, लेकिन रोल मॉडल की कामयाबी देखना और उस तक पहुंचने वाले संघर्ष को नकार देना, ये किसी भी तरीके से सही नहीं हो सकता. नारीवाद का असल मकसद इसी रास्ते के संघर्ष को रेखांकित करना और इस रास्ते को सुगम बनाने की कोशिश करना है.

हर क्षेत्र और देश में, महिलाओं की लड़ाई अलग-अलग स्तर पर है, इसलिए इसके किसी भी एक स्तर को हाईलाइट करके, दूसरे स्तर को नकारा नहीं जा सकता. ये कहना न सिर्फ निरर्थक बल्कि एक रणनीति के तहत भी है कि लड़कियां तो अंतरिक्ष में जा रही हैं और भारत की लड़कियां अभी भी कपड़े पहनने की आजादी के लिए ही जूझ रही हैं.

अगर इस समय उसका संघर्ष जींस पहनने का या मोबाइल फोन रखने का या दोस्त बनाने की आजादी का है, तो इसे इसलिए नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि नासा ने एक और लड़की को अंतरिक्ष में भेजने की तैयारी कर ली है.

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