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अग्नि 5 टेस्ट: बेवजह विवाद खड़ा कर रहा चीन, भारत प्रशांत महासागर क्षेत्र अशांत

परमाणु शक्तियों से घिरे भारत का इस इलाके में क्या स्टैंड होना चाहिए?

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<div class="paragraphs"><p>भारत प्रशांत महासागर क्षेत्र अशांत</p></div>

ऑस्ट्रेलिया-यूके-यूएस (AUKUS) गठबंधन भारत-प्रशांत महासागर क्षेत्र पर मंडराते युद्ध के खतरे की नई चेतावनी है. इस महीने के बीच में हमने देखा कि उत्तर और दक्षिण कोरिया ने एक दूसरे के मुकाबले में मिसाइल टेस्ट किए, ताइवान के एयर डिफेंस आइडेंटिफिकेशन जोन में चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी एयर फोर्स ने बार-बार और जान बूझकर घुसपैठ की, और हाल ही में चीन ने भारत के अग्नि 5 मिसाइल टेस्ट को लेकर अप्रत्यक्ष रूप से चेतावनी दी. चीन अपनी लंबी दूरी की मिसाइलों को रखने के लिए गांसू और मंगोलिया के अंदरुनी इलाके में ठिकाने भी बनाता दिख रहा है.

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अमेरिका और चीन के बीच की दुश्मनी अब बढ़ती ही जा रही है. 9 सितंबर को शी जिनपिंग को टेलीफोन पर अमेरिका ने कहा कि वो एक सीमा बनाए रखते हुए संबंधों को बनाए रखना चाहता है जिससे ये सुनश्चित हो सके कि दोनों देशों के बीच प्रतिस्पर्धा बढ़कर विवाद का रूप न ले ले.

एक हफ्ते के अंदर ही 15 सितंबर को अमेरिका ने एक नए सुरक्षा गठबंधन में शामिल होकर स्थिति को और गंभीर बना दिया. हालांकि चीन का जिक्र नहीं किया गया था लेकिन ये साफ है कि अमेरिका का लक्ष्य चीन की नौसैनिक गतिविधि को चुनौती देना है, खासकर दक्षिणी प्रशांत महासागर के इलाके में.

कई सुरक्षा समझौते

अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, यूके, न्यूजीलैंड और कनाडा के बीच लंबे समय से चला आ रहा और गहरा गुप्त गठबंधन है, जिसे UKUSA समझौता कहा जाता है. एक पुराना और गैर बाध्यकारी और आंशिक रूप से क्रियाशील ऑस्ट्रेलिया-न्यूजीलैंड-यूएस सुरक्षा समझौता (ANZUS) और इसके अलावा एक और कमजोर फाइव पावर डिफेंस अरेंजमेंट्स (FPDA) भी है जो ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, यूके को मलेशिया और सिंगापुर से जोड़ता है.

हालांकि अपने न्यूक्लियर प्रोपेल्ड सबमरीन (बूमर) पर फैसले के कारण ये सुर्खियों में आ चुका है, लेकिन नया समझौता AUKUS सीधे-सीधे हथियार बेचने का एक समझौता नहीं है, बल्कि एक सैन्य समझौता है जिसकी पूरी जानकारी अभी बताई नहीं गई है और जिसके लंबे समय में होने वाले असर अभी तक स्पष्ट नहीं हैं.

अमेरिका हमेशा से अपनी पनडुब्बी की तकनीक दूसरे देशों के साथ साझा करने से बचने की कोशिश करता रहा है. हालांकि इसने यूके के लिए इसमें कुछ छूट दी है. और अब इन दोनों ने अपने साथ ऑस्ट्रेलिया को शामिल कर लिया है. यूके ने ऑस्ट्रेलिया में 12 परमाणु हथियारों का परीक्षण किया लेकिन उसने ऑस्ट्रेलिया को सभी परमाणु मुद्दों से अलग रखा और ऑस्ट्रेलिया एक गैर परमाणु हथियार वाले देश के तौर पर अप्रसार संधि (NPT) का एक हिस्सा है.
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अपनी घोषणा में ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री स्कॉट मॉरिसन ने कहा कि ऑस्ट्रेलिया की “परमाणु हथियार हासिल करने की कोई योजना नहीं है” लेकिन जैसा कि “बूमर” पाने के अचानक फैसले से स्पष्ट है कि ऐसी प्रतिबद्धताओं पर पूरी तरह से भरोसा नहीं किया जा सकता.


तकनीकी रूप से NPT न्यूक्लियर प्रॉपल्शन तकनीक के निर्यात पर रोक नहीं लगाती है, लेकिन देशों ने इससे निपटने में सावधानी बरती है. उदाहरण के तौर पर भारत के आईएनएस अरिहंत के मामले में रूस ने कल्पक्कम एटोमिक पावर स्टेशन में एक रिसर्च सेंटर तैयार किया, भारत का काम था इसको अरिहंत के लिए सफलतापूर्वक कॉपी करना.

अप्रसार प्रतिबद्धताएं

अमेरिकी और ब्रिटिश इस मामले में ईमानदार होने का दिखावा नहीं करने जा रहे हैं. लेकिन चिंता का एक मुद्दा है. अरिहंत के लिए वीएम 4 रिएक्टर के विपरीत, जो लगभग 20 प्रतिशत से 30 प्रतिशत तक समृद्ध यूरेनियम का इस्तेमाल करता है आधुनिक यूएस-यूके रिएक्टरों में लगभग 95 फीसदी पर अत्यधिक समृद्ध यूरेनियम का इस्तेमाल किया जाता है जो परमाणु हथियार बनाने के लिए भी आदर्श है. यह देखा जाना बाकी है कि यूएस-यूके अपनी अप्रसार प्रतिबद्धताओं को पूरा करने के लिए ऑस्ट्रेलियाई समझौते पर कैसे काम करते हैं.


अब कुछ ऐसी बातें भी सामने आ रही हैं जिनमें कहा जा रहा है कि चीन ऑस्ट्रेलिया को अपने परमाणु कार्यक्रम के लिए लुभाने की कोशिश कर रहा है. लेकिन ये बात कुछ हद तक बढ़ा-चढ़ा कर कही जा रही हैं. अमेरिका और यूके के विपरीत चीन परमाणु हथियारों के मामले में “नो फर्स्ट यूज” यानी “पहले इस्तेमाल नहीं” का संकल्प रखता है. दूसरी बात ये है कि चीन के पास इतने हथियार हैं कि ये अमेरिका को भी जवाब देने की क्षमता रखता है, जिसके परमाणु हथियार सैद्धांतिक तौर पर पहले इस्तेमाल किए जा सकते हैं.

पूरे भारत-प्रशांत महासागर क्षेत्र में खासकर उत्तर पूर्व में तनाव अपने चरम पर है. यहां एक औपचारिक तौर पर मान्यता प्राप्त परमाणु हथियार की शक्ति वाला देश चीन है, साथ ही एक अनौपचारिक तौर पर परमाणु शक्ति वाला देश उत्तर कोरिया है, जो अपने पड़ोसी देश दक्षिण कोरिया और जापान को अपने परमाणु हथियारों और मिसाइल से डराने की कोशिश करता रहता है. चीन का दक्षिण कोरिया के साथ समुद्री सीमा को लेकर छोटा सा विवाद है और सेनकाकू (दियाओयु) द्वीप को लेकर जापाना के साथ बड़ा विवाद है.

ताइवान को लेकर तनाव

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सितंबर के मध्य में उत्तर कोरिया ने कहा कि उसने एक स्ट्रेटेजिक क्रूज मिसाइल का परीक्षण किया है जो दक्षिण कोरिया, जापान और अमेरिका की ओर से स्थापित बैलेस्टिक मिसाइल के डिफेंस सिस्टम को चकमा दे सकता है.


दक्षिण कोरिया ने भी पनडुब्बी से दागी जा सकने वाली बैलेस्टिक मिसाइल का सफल परीक्षण कर उत्तर कोरिया को संदेश दिया. दक्षिण कोरिया के पास कोई परमाणु हथियार नहीं है लेकिन अंदेशा ये है कि उत्तर कोरिया के साथ लंबे समय तक तनाव संभवत: दक्षिण कोरिया और जापान को भी परमाणु हथियारों की ओर बढ़ने को मजबूर कर सकता है. ट्रंप के शासन काल के अनुभव ने दोनों देशों को झकझोर दिया है और परमाणु प्रसार भविष्य में इसका परिणाम हो सकता है.

तनाव का एक और बड़ा बिंदू ताइवान है. चीन ताइवान पर प्रभुत्व का दावा करता है और उसे अपने साथ मिलाने के लिए सेना के इस्तेमाल से भी इनकार नहीं किया है. अपने एयर डिफेंस स्पेस में लड़ाकू विमानों को उड़ाने सहित आक्रामक चीनी कार्रवाई , बीजिंग की सख्त रणनीति का हिस्सा है.

दूसरे कारणों से भी स्पष्ट तौर पर हालात बिगड़ रहे हैं. हाल के महीनों में जापान ने संकेत दिया है कि वो ताइवान की रक्षा में भूमिका निभा सकता है. पिछले महीने राष्ट्रपति जो बाइडेन ने भी कहा था कि अगर ताइवान पर हमला होता है तो वो इसकी रक्षा करेंगे लेकिन बाद में अमेरिका इससे पीछे हट गया था. ताइवान की रक्षा को लेकर जापान और अमेरिका की आधिकारिक नीति स्पष्ट नहीं है और इन बयानों ने चीन को और आक्रोशित किया है.

खतरनाक होते पुराने झगड़े

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इससे काफी दूर भारत-प्रशांत महासागर क्षेत्र के हिस्से में भारत के अग्नि 5 मिसाइल, जिसका परीक्षण 23 सितंबर को किया जा सकता है, के पहले इस्तेमाल परीक्षण को लेकर जान बूझकर विवाद खड़ा किया जा रहा है. करीब 5,000 किलोमीटर की दूरी वाले इस मिसाइल का कई बार पहले भी परीक्षण किया जा चुका है.

इस बार चीन ने भारत के 1998 के परमाणु हथियारों के परीक्षण के बाद जारी संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव 1172 का हवाला देते हुए अग्नि 5 को लेकर प्रतिक्रिया दी है. चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता और “वोल्फ वारियर” झाओ लिजियान ने कहा कि 1998 के प्रस्ताव, जो अभी भी दस्तावेज़ों के मुताबिक कार्यशील है, में भारत और पाकिस्तान को “अपने परमाणु हथियार विकास कार्यक्रमों को रोकने, हथियारों की होड़ से बचने.. परमाणु हथियारों को ले जा सकने में सक्षम बैलेस्टिक मिसाइलों के विकास को रोकने के लिए कहा था.”

इसमें कोई शक नहीं है कि ये बयान रिकॉर्ड के लिए था. 1980 के दशक में पाकिस्तान को परमाणु हथियार बनाने में मदद करने वाले चीन ने 1990 में अपने शिनजियांग रेंज में पाकिस्तान के पहले परमाणु हथियार का परीक्षण किया था और तब से पाकिस्तान के परमाणु हथियार और बैलेस्टिक मिसाइल कार्यक्रम को आगे बढ़ाने में मदद की है। ऐसे में चीन को भारतीय गतिविधियों के लिए शायद ही गंभीर आलोचकों के रूप में देखा जा सकता है.

AUKUS से संबंधित भारत का अपना न्यूक्लियर प्रोपेल्ड सबमरीन प्रोग्राम (परमाणु चालित पनडुब्बी कार्यक्रम) है. भारत के पास दो बैलेस्टिक मिसाइल पनडुब्बियां (SSBN) अरिहंत और आईएनएस अरिघाट है. इसके अलावा भारत ऐसी कई और पनडुब्बियों का निर्माण कर रहा है. इसके अलावा भारत छह न्यूक्लियर प्रोपेल्ड अटैक सबमरीन (SSN) बनाने की योजना बना रहा है.


भारत ने अभी तक अपने न्यूक्लियर प्रोपेल्ड अटैक सबमरीन के डिजाइन को अंतिम रूप नहीं दिया है. ये अरिहंत जैसा ही हो सकता है और अपने रिएक्टर को अपग्रेड कर सकता है. दूसरी तरफ भारत एक नए सिंगल हल डिजाइन की पनडुब्बी भी बना सकता है या मदद के लिए फ्रांस से कह सकता है. एक बात तो तय है- ज्यादा देशों के न्यूक्लियर प्रोपेल्ड और पारंपरिक पनडुब्बियों और नई मिसाइलों के साथ आने के कारण भारत-प्रशांत महासागर इलाका एक काफी खतरों से भरा स्थान बनता जा रहा है.

पुराने झगड़ों का दौर गहराता जा रहा है. ऐसे संकेत कम ही हैं कि कोई भी पक्ष-अमेरिका, चीन, उत्तर और दक्षिण कोरिया, भारत, ऑस्ट्रेलिया और जापान- पीछे हटने को तैयार होगा. केवल इतना ही कहा जा सकता है कि दो आधिकारिक परमाणु शक्तियों और दो अनौपचारिक शक्तियों के साथ किसी भी संघर्ष के परिणाम इतने विनाशकारी हो सकते हैं कि वे दुनिया के भविष्य को बदल देंगे.

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(लेखक ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन, नई दिल्ली के एक ख्यात फेलो हैं. यह एक विचारात्मक लेख है. इसमें व्यक्त किए गए विचार लेखक के अपने हैं. क्विंट न तो इसका समर्थन करता है और न ही इसके लिए जिम्मेदार है.)

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