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Al-Zawahiri के सफाए में क्या पाकिस्तान का भी हाथ है? सारे संकेत तो यही बताते हैं

Zawahiri को कई मौकों पर मृत घोषित किया गया था; इसके बावजूद भी ऐसे हमलों से बचने के लिए उसके पास शैतानी किस्मत थी.

Al-Zawahiri के सफाए में क्या पाकिस्तान का भी हाथ है? सारे संकेत तो यही बताते हैं
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अल-कायदा के सरगना की मौत हो चुकी है. मिस्र के एक अमीर परिवार से आने वाला अयमान अल-जवाहिरी (al-zawahiri) पहले एक सर्जन रह चुका था. 9/11 घटना के वर्षों पहले ही अल-कायदा द्वारा मचाए गए कोहराम के केंद्र में जवाहिरी था. इसमें कोई शक नहीं कि 9/11 की घटना एक बड़ा और चतुराई से किया गया हमला था, जिसकी वजह से अल-कायदा का नाम घर-घर तक पहुंच गया था. ओसामा बिन लादेन के उत्तराधिकारी को काबुल के एक पॉश इलाके (जहां अधिकांश दूतावास हैं) में एक बालकनी पर आराम करते हुए मार गिराया गया, यह दृश्य किसी साइंस फिक्शन कहानी के हिस्से जैसा प्रतीत होता है.

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न्यूज एंकर इस घटना (जवाहिरी की हत्या को) को अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन का 'बिन लादेन' वाला पल बता रहे हैं. इसके लिए निश्चित तौर पर अमेरिकी इंटेलिजेंस कम्युनिटी विशेष तौर पर बधाई की पात्र है. हालांकि यह पाकिस्तान के लिए 'हार मानने वाला' पल भी हो सकता है. अपने मेजबानों के लिए शर्मिंदगी का विषय बने हुए एक 71 वर्षीय आतंकवादी की हत्या वाकई में इस क्षेत्र के लिए एक संकटग्रस्त राष्ट्रपति की घरेलू चुनाव जीत से कहीं ज्यादा अहम है.

स्नैपशॉट
  • जाहिर तौर पर, अयमान अल-जवाहिरी अपने परिवार से 'मुलाकात' करने गया था, जिसका मतलब है कि जमीनी स्तर पर सटीक इंटेलिजेंस. नहीं, सिर्फ हवाई टोही काफी नहीं है, मुख्य इनपुट हमेशा जमीनी स्तर की खुफिया जानकारी से आता है.

  • जवाहिरी को कई मौकों पर मृत घोषित किया गया था. जाहिर तौर पर इस तरह के हमलों से बचने के लिहाज से उसकी किस्मत अच्छी थी.

  • इस बात को नकारा नहीं जा सकता है कि पिछले कुछ समय से पाकिस्तान पर दबाव बढ़ता जा रहा है. इसके साथ ही यह भी ध्यान रखना होगा कि मौजूदा अमेरिकी राष्ट्रपति ऐसे शख्स हैं जो पाकिस्तान को भली-भांति जानते हैं. ऐसे में रावलपिंडी पर दबाव बनाने में उनका प्रशासन जरा भी नहीं हिचकिचाएगा.

  • हालांकि कई लोग इस बात का तर्क देंगे कि जवाहिरी की मौजूदगी को लेकर तालिबान ने धोखा दिया है. लेकिन चूंकि तालिबान को अंतर्राष्ट्रीय सहायता की सख्त जरूरत है इसलिए यह असंभव सा प्रतीत होता है कि उसने अपने दम पर जवाहिरी को पनाह दी हो.

कई बार जवाहिरी के मरने की खबरें आ चुकी हैं

एक नहीं ऐसे कई मौके आए हैं जब जवाहिरी को मृत घोषित किया जा चुका है; जाहिर है इस तरह के हमलों से बचने के लिए उसके पास शैतानी किस्मत थी. ख्यात पत्रकार जेसन बर्क बताते हैं कि किस तरह एक रेड के दौरान वह बच निकला था, हालांकि इस रेड में उसकी पत्नी और छोटे बच्चे की मौत हो गई थी. वहीं बाद के एक मिसाइल हमले में भी वह बच गया था, जबकि उसमें बाकियों की मौत हो गई थी. उसका कोई निश्चित ठिकाना नहीं था, हालांकि ऐसा संदेह जताया जाता है कि कुछ समय के लिए वह कराची में था.

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मई 2011 में ओसामा बिन लादेन को मारने के लिए रेड डाली गई थी, इसके बाद जवाहिरी पाकिस्तान से बाहर भाग गया. वह शायद पाकिस्तान-अफगानिस्तान सीमा पर कहीं रह रहा था. अमेरिकी इंटेलिजेंस से बचने के लिए वह लगातार अपने ठिकाने बदलता रहता था. अमेरिका के बाहर निकलने के बाद मिले-जुले वीडियो आने लगे थे, लेकिन जिससे उसके जिंदा होने की पुष्टि हुई. वह वीडियो इसी साल 22 फरवरी को आया था. इस वीडियो में जवाहिरी ने कर्नाटक की मुस्कान खान की प्रशंसा की थी, यह वही लड़की है जिसने हिजाब पर प्रतिबंध को चुनौती थी. इसके बाद जब भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) की पूर्व प्रवक्ता नूपुर शर्मा ने हजरत मोहम्मद के लिए अपमानजनक बातें कीं तब भी जवाहिरी का वीडियो आया था जिसमें उसने भारत में हमले की धमकी दी थी.

दूसरे शब्दों में कहें तो जब जवाहिरी 'सुरक्षित' था, तब उसने अमेरिकियों के खिलाफ अनगिनत साजिशें रची थीं. लादेन की तुलना में वह कहीं ज्यादा अमेरिका विरोधी था और वह बाद में भारत के खिलाफ हो गया.

एक तालिबानी कहानी

इन सबके बीच मई 2022 में संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट में सावधानीपूर्वक यह देखा गया कि जब अल-कायदा अफगानिस्तान में पनाह ले रहा था तब वह तालिबान द्वारा लगाए गए कुछ प्रतिबंधों के अधीन था. हालांकि, रिपोर्ट में यह भी चेतावनी दी गई थी कि तालिबान के आतिथ्य का दुरुपयोग न हो इसलिए अल-कायदा अफगानिस्तान के बाहर से हमले शुरू करके खुद को पुनर्जीवित करना चाहता था.

यह स्पष्ट नहीं है कि जवाहिरी काबुल के डिप्लोमैटिक एन्क्लेव के बीचों-बीच उस आलीशान घर में कितने समय से रह रहा था. हालांकि कई लोग इस बात का तर्क देंगे कि जवाहिरी की मौजूदगी को लेकर तालिबान ने धोखा दिया है. लेकिन चूंकि तालिबान को अंतर्राष्ट्रीय सहायता की सख्त जरूरत है इसलिए यह असंभव सा प्रतीत होता है.

जवाहिरी एक ऐसी शख्सियत था, जो अपनी उम्र और कमजोरी के बावजूद पुराने मुजाहिदीन, विशेष तौर पर कंधारी समूह के बीच काफी सम्मानित था. कोई भी जिस पर 25 मिलियन डॉलर के इनाम के लिए धोखा देने का शक हो, वह अंतत: सामने आ ही जाएगा क्योंकि ऐसे सर्कल में सच्चाई सामने आ ही जाती है, भले ही वह शीर्ष स्तर पर ही क्यों न हो.
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यह बात समझ से परे है कि तालिबान के आंतरिक मंत्री सिराजुद्दीन हक्कानी जो अफगान से ज्यादा पाकिस्तानी हैं, उन्हें जवाहिरी की मौजूदगी का पता ही नहीं था. यह लगभग उतना ही असंभव है जैसे कि शीर्ष पाकिस्तानी लीडर विशेष तौर पर लेफ्टिनेंट जनरल फैज हमीद (पाकिस्तान के इंटर-सर्विसेज इंटेलिजेंस (डीजी आईएसआई) के पूर्व महानिदेशक) जो तालिबान द्वारा काबुल के कब्जे के कुछ घंटों बाद काबुल में थे, लेकिन उनको यह नहीं पता था कि जवाहिरी कहां हैं. लेकिन जवाहिरी के ठिकाने के बारे में जमीनी स्तर पर खुफिया जानकारी प्रदान करने के लिए डीजी आईएसआई को हक्कानी को मनाने की जरूरत होगी.

पकिस्तान की ओर जाते हैं सभी रास्ते 

सामान्य परिस्थितियों में भी सभी उंगलियां अनिवार्य रूप से पाकिस्तान की ओर ही जाती हैं, ऐसे में वर्तमान परिस्थितियों में इसकी और भी ज्यादा संभावना है. इस बात पर ध्यान देने की जरूरत है कि वर्तमान में पाकिस्तान दशकों के सबसे गंभीर आर्थिक संकट से गुजर रहा है, चूंकि वह वैश्विक बांड बाजारों से बाहर हो गया है इसलिए उसके पास पूंजी जुटाने के लिए कोई रास्ता नहीं है; ऐसे में पाकिस्तान का एकमात्र सहारा अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) है. उसके सबसे 'मजबूत दोस्त', चीन के पास खुद की अपनी आर्थिक चिंताएं हैं और इस समय वह एक ऐसे मुल्क को बचाने में असमर्थ है जो पूरी तरह से ढहने की कगार पर है.

अब ऐसा लग रहा है कि IMF से फंड 'जल्दी जारी' कराने के लिए पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने आर्मी चीफ को अमेरिकी उप विदेश मंत्री वेंडी शेरमेन से बात करने के लिए अधिकृत किया था. फेडरल फाइनेंस मिनिस्टर मिफ्ताह इस्माइल ने इस्लामाबाद में केवल अमेरिकी दूत के साथ बैठक को प्राथमिकता दी थी. फोन कॉल स्पष्ट रूप से जुलाई के मध्य में हुआ था और कथित तौर पर तत्काल बोर्ड-स्तरीय समझौते के मीटिंग की गई जिससे कि 1.2 बिलियन डॉलर के वितरण को मंजूरी दी जा सके, यह अनिवार्य तौर पर वित्तीय निकाय द्वारा अंतिम चरण था, जिसमें अमेरिका सबसे बड़ा शेयरहोल्डर है. सेना प्रमुख के लिए अनिवार्य रूप से एक वित्तीय मुद्दे में शामिल होना क्यों आवश्यक था? हालांकि उसने संपर्क की पुष्टि की है लेकिन विदेश कार्यालय ने टिप्पणी करने से इनकार कर दिया.

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और भी बहुत कुछ है. अमेरिकी सीनेट बिल के अनुसार, विदेश मंत्री से मांग की गई है कि उनकी निगरानी में रक्षा मंत्री और नेशनल इंटेलिजेंस के डायरेक्टर सब साथ मिलकर एक विस्तृत रिपोर्ट दें जिसमें 'पाकिस्तान सरकार समेत.... उन सभी के समर्थन का आकलन करने की बात कही गई थी, जिसने भी 2001 से 2020 के बीच तालिबान को समर्थन दिया था.' यह एक खतरनाक चीज है.

इसलिए इस बात को नकारा नहीं जा सकता है कि पिछले कुछ समय से पाकिस्तान पर दबाव बढ़ता जा रहा था. इसके साथ ही यह भी ध्यान रखना होगा कि मौजूदा अमेरिकी राष्ट्रपति ऐसे शख्स हैं जो पाकिस्तान को भली-भांति जानते हैं.

बतौर सीनेटर उन्होंने स्टेट ऑफ सेक्रेटरी द्वारा प्रमाणित करने के लिए एक ऐसे विधान (legislation) को आगे बढ़ाया था जिसमें पाकिस्तान को प्रचुर सहायता देने की बात कही गई थी. सहायता के लिए जो शर्त और तर्क थे उसमें कहा गया था कि "पाकिस्तानी सुरक्षा बल द्वारा अल-कायदा और उससे जुड़े आतंकवादी समूहों को पाकिस्तान के क्षेत्र में काम करने से रोकने के लिए ठोस प्रयास किए जा रहे हैं." इसमें एक शर्त यह भी थी कि "केवल पाकिस्तानी सरकार (नागरिक या सैन्य) के बजाय पाकिस्तानी लोगों के प्रति जुड़ाव को फिर से स्थापित करना है." पाकिस्तानी सेना को यह बिल्कुल भी पसंद नहीं आया था. यह प्रशासन रावलपिंडी पर दबाव बनाने में जरा भी नहीं हिचकिचाएगा.

आगे क्या?

यहां पर अब सवाल यह आता है कि आगे क्या? अगला अल-कायदा प्रमुख सैफ-अल-अदेल बनेगा, यह संभव है क्योंकि जवाहिरी के सफाए से पहले भी वह इस समूह का इंचार्ज था. ऐसा संदेह जताया जाता है कि सैफ-अल-अदेल मिस्र का एक पूर्व कमांडो था. वह एक ऐसा शख्स है जिसकी पूरी जिंदगी रहस्यमयी रही है. उसका कोई वीडियो नहीं है और न ही कोई शोरगुल मचाने वाली स्पष्ट पब्लिसिटी है. उसकी कुछ ही तस्वीरें हैं. बहुत कम ही लोग इस बात को जानते हैं कि वह कहां है. हालांकि सामान्यत: लोगों का यह मानना है कि वह ईरान में है. सैफ पूरी तरह से अनुशासित मिलिट्री मैन (जोकि उसके बॉस नहीं थे) है, ऐसे में यह संभव है कि उसके चारों ओर कैडर्स झुंड बना लेंगे. ऐसे में, मनोबल में गिरावट होने के बजाय, उसके एकजुट होने की संभावना अधिक है. सैफ की पृष्ठभूमि को देखते हुए, इस बात की संभावना नहीं है कि वह किसी भी देश का मोहरा बन जाएगा, चाहे वह देश भले ही कितना प्रेरक क्यों न हो. यह पाकिस्तान के लिए खतरनाक है.

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भारत के लिए अच्छी खबर यह है कि जवाहिरी की मौत हो चुकी है. वहीं खतरा इस बात यह है कि भारतीय उपमहाद्वीप में अल-कायदा की गतिविधियों जो कमजोरी आई थी, वह एक बार फिर से पुनर्जीवित हो सकती है. इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि अल-कायदा का कैडर "दाएश" में शामिल हो जाएगा. यह इस बात पर निर्भर करेगा कि किसका पर्स कितना बड़ा है. भारत के लिए दाएश कहीं ज्यादा बड़ा खतरा है, क्योंकि इसके पास दक्षिण भारत से भी कैडरों को खींचने की क्षमता है. दाएश से तालिबान नफरत करता है और इसका सफाया करने के लिए वह कुछ भी करेगा. इसलिए इंटेलिजेंस की खतरनाक और काली दुनिया में काबुल को अपने साथ बनाकर रखने में समझदारी है. आखिरकार, दोनों के कुछ समान हित हो सकते हैं.

प्रमुख खुफिया जानकारी हमेशा जमीनी स्तर से आती है

यह कहना अजीब था, चूंकि जवाहिरी एक आतंकवादी था जो बिन लादेन से भी अधिक हिंसक रूप से अमेरिका का विरोध करता था वहीं कश्मीर पर एक अजीब बयान को छोड़ दें तो जवाहिरी ने भारत पर अपना समय बहुत कम खर्च किया था. यह सच है कि अल-कायदा भारतीय उपमहाद्वीप में सक्रिय है, लेकिन जवाहिरी द्वारा 2014 में इसके गठन की आकस्मिक घोषणा और इसके लीडर के तौर पर पाकिस्तान के आसिम उमर को नामित करने के बाद भी भारत में इसकी गतिविधियां बहुत कम थीं. असीम उमर एक शानदार वक्ता था, जो पहले कराची के एक मदरसे में पढ़ाता था.

ऐसा नहीं है कि जवाहिरी का ढूंढा जाना कोई बड़ी बात नहीं है. एक जिहादी वेबसाइट में जवाहिरी की प्रोफाइल के अनुसार वह एक ऐसा नेता है जो मिस्र में अल-अजहर मस्जिद के इमामों का वंशज है और वह अल-जिहाद का नेता था. यह वही समूह है जिसे राष्ट्रपति अनवर सादात की हत्या का आरोपी माना जाता है. इस अपराध के लिए जवाहिरी को गिरफ्तार किया गया था और इस बात की संभावना नहीं है कि मिस्र के अधिकारियों ने उसके साथ किसी भी तरह से मानव अधिकार के साथ व्यवहार किया होगा. इसके बाद वह पेशावर के एक अस्पताल में मुजाहिदीन का इलाज कराने आया था. यहीं पर जवाहिरी की मुलाकात बिन लादेन से हुई.

हमेशा की तरह आतंकवादी इतिहास पाकिस्तान में बना है, लेकिन यह सब अतीत की बात है.

ऐसा माना जाता है कि मई 2011 में बिन लादेन के मारे जाने के बाद, जवाहिरी को कराची से पाकिस्तान-अफगानिस्तान बॉर्डर पर जाबोल में स्थानांतरित कर दिया गया था, जहां से उसने वीडियो बनाए. वीडियो क्लिप ने यह स्पष्ट कर दिया कि वह जिंदा है और साथ ही उसकी व्यापक लोकेशन के बारे में भी कुछ संकेत मिले. इसके बाद इसकी पुष्टि मानव इंटेलिजेंस द्वारा की जानी थी. यहीं से पाकिस्तान की वापस एंट्री होती है. जाहिर तौर पर जवाहिरी अपने परिवार से 'मुलाकात' करने गया था, जिसका मतलब है कि जमीनी स्तर पर सटीक इंटेलिजेंस.

नहीं, सिर्फ हवाई टोही काफी नहीं है. यह सिर्फ वेरिफिकेशन के लिए ठीक है. मुख्य इनपुट तो हमेशा जमीनी स्तर की खुफिया जानकारी से ही आता है.

(डॉ. तारा कार्था Institute of Peace and Conflict Studies (IPCS) में एक प्रतिष्ठित फेलो हैं. उनका ट्विटर हैंडल @kartha_tara है. ये ओपिनियन आर्टिकल है और इस लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखिका के निजी विचार हैं. क्विंट का उनसे सहमत होना जरूरी नहीं है.)

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टॉपिक:  Al Qaeda   al-zawahiri killed 

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