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बैड बॉय बिलेनियर्स: वेब सीरीज में कई मुद्दों पर चर्चा ही नहीं हुई

3 अरबपतियों से कहानी से साफ है कि क्रोनी कैपिटलिज्म, जहां शासन तंत्र कुछ चुनिंदा बिजनेस समूह को फायदा पहुंचाता है.

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बैड बॉय बिलेनियर्स: वेब सीरीज में कई मुद्दों पर चर्चा ही नहीं हुई

मेरे खयाल से नेटफ्लिक्स की इस सीरीज को बनाने वालों ने सेफ खेला है. जिन तीन अरबपतियों – विजय माल्या, नीरव मोदी और सुब्रत राय- की कहानी यहां कही गई है, उनकी कहानी उनके राजनीतिक कनेक्शन के बिना कैसे कही जा सकती है?

इन तीनों, और शायद कई और, ने लचर रेगुलेशन का खूब फायदा उठाया, कानून के स्पिरिट को ठेंगा दिखाया और अफसरों को अपने साथ मिलाकर काम निकाला. लेकिन क्या उनके गहरे राजनीतिक रिश्तों के बगैर ये सब संभव थे? विजय माल्या तो सालों तक खुद सक्रिय राजनीति में भी रहे.

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कह सकते हैं कि ये सारे क्रोनी कैपिटलिज्म के प्रोडक्ट रहे हैं. लेकिन इस नेटफ्लिक्स सीरीज में इसकी चर्चा ही नहीं हुई है. तीन एपिसोड वाली इस सीरीज में एक और कमी मुझे दिखी. और वो ये है कि इन तीनों के बिजनेस से जुड़े फैसलों पर उस समय के माहौल का क्या असर हुआ, इसका खास जिक्र नहीं है.

विजय माल्या की गलती थी कि उसने कोर्स करेक्शन नहीं किया

विजय माल्या के किंगफिशर एयरलाइंस की शुरुआत 2005 में हुई. पहले ही साल में देश के एविएशन सेक्टर का बड़ा हिस्सा इसने हथिया लिया. ऐसे में किसी का भी स्वाभाविक फैसला तेजी से विस्तार का ही होता.

लेकिन विस्तार ऐसे समय में हो रहा था, जब एविएशन टर्बाइन फ्यूएल यानी हवाई जहाज के ईंधन की कीमत तेजी से बढ़ रही थी. देश का एविएशन इंफ्रास्ट्रक्चर काफी लचर था, जिसकी वजह से कंपनियों को नुकसान हो रहे थे और 2008 में बड़ी वैश्विक मंदी आई, जिसके बाद से कई कंपनियों के प्लांस धरे के धरे ही रह गए.

क्या थी विजय माल्या की गलती

विजय माल्या की गलती थी कि उसने कोर्स करेक्शन नहीं किया और शायद उसे जरूरत से ज्यादा इस बात पर भरोसा था कि देसी जुगाड़ और अपने कनेक्शन के बल पर वो सारी मुसीबतों को दूर कर ही लेगा.

सुब्रत राय ने रियल एस्टेट पर बड़ा दांव लगाया

उसी तरह सुब्रत राय ने रियल एस्टेट पर बड़ा दांव लगाया था और नीरव मोदी एक एस्पिरेशनल लक्जरी ब्रांड बनाना चाहता था. ये सही बिजनेस के फैसले हो सकते थे. लेकिन अपने कनेक्शन का इनको इतना गुमान था कि इन लोगों ने शॉर्ट कट को ही सही रास्ता मान लिया. लंबी अवधि में शॉर्ट कट नहीं चलता है, ये मानने को शायद तैयार नहीं हुए.

इस सीरीज की खासियत है कि इन तीनों अरबपतियों का चरित्र चित्रण एकतरफा नहीं किया गया है. इसे देखने के बाद आपको लगेगा कि इन्होंने कुछ अच्छा किया, कुछ गलतियां की और कई जुगाड़ किए. जुगाड़ जब चलने बंद हो गए तो परतें खुलने लगी और ब्लैक, व्हाइट और ग्रे शेड्स बाहर आने लगे.

इन तीन अरबपतियों में एक चीज कॉमन रहा है- ये सारे लक्जरी पर खूब खर्चते रहे हैं और इसको बढ़ा-चढ़ाकर दिखाने से भी कभी परहेज नहीं किया. सुब्रत राय के बेटों की शादी में बेहिसाब पैसा बहाया गया. विजय माल्या ने अपने 60 वीं जन्मदिन को मनाने में विलासिता की सारी हदें पार कर दीं और वो भी ऐसे समय में जब किंगफिशर एयरलाइंस के कर्मचारियों को महीनों से सैलरी नहीं मिल रही थी.

तीनों के बीच एक और कॉमन बात थी. तीनों को नकदी के टैप से लगातार रुपए मिलते रहे. जहां सुब्रत राय की कंपनियों का लोगों से डिपोजिट लेना जारी रहा, वहीं नीरव मोदी को पंजाब नेशनल बैंक से बिना किसी कोलेटरल के उधारी मिलते रहे और विजय माल्या की कंपनी को बड़े प्रोजेक्शन के आधार पर ही लोन सेक्शन होते रहे. नकदी की लगातार बारिश की वजह से शायद इन लोगों को कोर्स करेक्शन की जरूरत ही महसूस नहीं हुई.
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ड ब्वाय बिलियेनर्स से एक गुड सबक यही तो है

इन एपिसोड्स को देखते हुए आपने मन में बार-बार यही सवाल आएगा- हमारे रेगुलेटर्स कहां सोते रहते हैं. सबकी नींद तभी क्यों खुलती है जब सारा खेल खत्म हो जाता है और खजाने को करोड़ों का नुकसान हो जाता है? नीरव मोदी की कंपनी को 6 साल से बिना किसी कोलेटरल के एलओयू कैसे मिलते रहे? अगर पीएनबी का एक कर्मचारी रिटायर ना होता तो यह खेल शायद चलता ही रहता. उसी तरह सहारा से करोड़ों निवेशक जुड़ते रहे और किसी को रेगुलेटरी गैप्स को भरने की जरूरत ही महसूस नहीं हुई?

इन एपिसोड्स में आपको नए इनसाइट्स शायद नहीं मिलेंगे. लेकिन इस बात का जवाब शायद मिल जाएगा कि विजय माल्या को रफ्तार क्यों पसंद था. 1980 के दशक के शुरुआती सालों में ही उसने रेशिंग चैंपियनशिप जीती थी. साथ ही इस बात की भी जानकारी मिलेगी कि किंगफिशर को बड़ा ब्रांड बनाने के लिए उसने कैसे कैसे प्रयोग किए.

सहारा की पहुंच करोड़ों निवेशकों तक कैसे हुई इसके बारे में भी इन एपिसोड्स में आपको जानकारी मिलेगी.

इन तीन अरबपतियों से कहानी से एक बात साफ है कि क्रोनी कैपिटलिज्म, जहां शासन तंत्र कुछ चुनिंदा बिजनेस समूह को फायदा पहुंचाता है, से किसी का भला नहीं होता है. क्या इससे सबक लेकर हम शासन तंत्र पर दवाब डालें कि इस तरह के माहौल फिर से ना वापस आ पाएं. बैड ब्वाय बिलियेनर्स से एक गुड सबक यही तो है.

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