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CAA, मंदिर और फिल्में: BJP चुनावों में सबसे आगे रहने के लिए ध्रुवीकरण की रणनीति अपना रही

विपक्ष के पास CAA के विरोध के लिए कुछ संवैधानिक सिद्धांत हो सकते हैं, लेकिन सड़कों पर आम नागरिक शायद इसे बेहद सादगी से देखते हैं.

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"लॉ नहीं रूल्स!"

ये नेटफ्लिक्स की नई सीरीज मामला लीगल है की लाइन हैं जो हमारे लिए विवादास्पद नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) की बारीकियों को समझने के लिए सही लगती है. इसके नियमों को इस हफ्ते ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली बीजेपी सरकार ने अधिसूचित किया है.

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यदि यह वेब सीरीज कानूनी सिस्टम पर एक व्यंग्य है जो एक सेशन कोर्ट पर कटाक्ष करती है, तो हम शायद CAA को लेकर एक नए व्यंग्य के बारे में सोच सकते हैं. इसे 'मामला कॉन्स्टिट्यूशनल है' कहें या फिर 'मामला पॉलिटिकल है' कहें? इसी पर इस हफ्ते की सुर्खियां बटोरने वाली खबरों की बारीकियां छिपी हुई हैं.

सीरीज में बार काउंसिल चुनाव को लेकर डायलॉग्स को गढ़ा गया है, लेकिन हमारी काल्पनिक सीरीज ('मामला कॉन्स्टिट्यूशनल है' या  'मामला पॉलिटिकल है') दरअसल कुछ ही हफ्तों में होने वाले राष्ट्रीय चुनावों पर आधारित हो सकती है. 

हिंदू-मुस्लिम विभाजन को तेज करने के लिए एक चुनावी चाल 

अगर तकनीकी तौर से देखें तो CAA संसद द्वारा पारित एक कानून है. CAA अब लंबित विधेयक नहीं रहा जिसकी वजह से कोरोना महामारी से पहले दिल्ली के मुस्लिम बहुल इलाके शाहीन बाग में लोग सड़कों पर उतर आए थे. कोरोना की वजह से नाराज और चिंतित प्रदर्शनकारियों की भीड़ तितर-बितर हो गई. इसमें संवैधानिक बारीकियां शामिल हैं जिन पर स्पष्टता की कमी है. सुप्रीम कोर्ट के पास लंबित मामला है कि क्या CAA कानून भारत के संविधान का उल्लंघन करता है या नहीं. लेकिन नियम तो पहले ही लागू हो चुके हैं, बारीकियों पर किसी का ध्यान नहीं है.

आधिकारिक तौर पर भारत किसी एक धर्म में मानने वाला राष्ट्र नहीं है, जैसा कि 2017 में तत्कालीन अटॉर्नी जनरल मुकुल रोहतगी ने CAA लागू होने से दो साल पहले संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद को बताया था. उन्होंने कहा कि भारत एक धर्मनिरपेक्ष राज्य के रूप में "नागरिकों की जाति, पंथ, रंग या धर्म के बीच कोई भेद नहीं करता है.

CAA नियमों के मुताबिक तथ्य यह है कि सरकार 31 दिसंबर 2014 से पहले भारत आए अफगानिस्तान, बांग्लादेश और पाकिस्तान से उत्पीड़ित अल्पसंख्यकों को भारतीय नागरिकता देने की इच्छुक है, भले ही देश में उनकी एंट्री तकनीकी रूप से अवैध (बिना दस्तावेज) हो, बशर्ते वे अपने प्रवेश का कोई सबूत पेश करें भले ही वो अस्पष्ट सबूत क्यों न हो. 

नागरिकता का यह प्रस्ताव हिंदुओं, बौद्धों, सिखों, जैनियों, पारसियों और ईसाइयों को शामिल करता है, जो मुस्लिम देशों में अल्पसंख्यक हैं. लेकिन अगर इन तीन देशों के कोई मुस्लिम भी सताए गए हो, मान लीजिए मुस्लिम समुदाय से आने वाले उदारवादी, नारीवादी या सांप्रदायिक असंतुष्ट, उन्हें सीएए के तहत शामिल नहीं किया जाएगा. पहले से ही भारत की नागरिकता के लिए जो कानून बने हैं उसी के जरिए उन्हें आवेदन देना होगा.

बीजेपी के कट्टर समर्थकों का कहना है कि CAA भारतीय मुसलमानों को बिल्कुल प्रभावित नहीं करता है क्योंकि वे पहले से ही भारत के नागरिक हैं. संवैधानिक बारीकियां इस बात पर टिकी हुई हैं कि क्या भारतीय मुसलमानों को भारत में जो समानता मिलती हैं वही समानता भारत के बाहर सताए गए मुसलमानों को भी भारत में दी जानी चाहिए.

सुप्रीम कोर्ट ऐसे मामलों पर फैसला देने वाली अंतिम अथॉरिटी है और अदालत को इस मामले में फैसला सुनाने की जल्दबाजी नहीं है. लेकिन राजनेता निश्चित तौर से एक डेडलाइन को देखते हुए काम करते दिख रहे हैं. CAA नियमों को अनुसूचित करने की टाइमिंग पर आलोचक और विपक्षी दल सवाल उठा रहे हैं. इसे वे हिंदू-मुस्लिम विभाजन को तेज करने और धार्मिक ध्रुवीकरण के आधार पर वोट हासिल करने के लिए एक चुनावी चाल के रूप में देख रहे हैं.

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धार्मिक ध्रुवीकरण बीजेपी की मदद करेगा?

विपक्ष के लिए अफसोस की बात है कि बीजेपी हर तरह से जीतती दिख रही है. टीवी और सड़कों पर लोगों की राय इस बात के सबूत देते हैं. 

यह सब इस बात पर निर्भर करता है कि आप सवाल कैसे पूछ रहे हैं. "क्या यह उचित नहीं है कि उत्पीड़ित हिंदुओं को एक हिंदू मातृभूमि में पनाह दिया जाए." ऐसे ही सवालों से दया की भाव रखने वाले लोग आकर्षित हो जाते हैं और बीजेपी भी ठीक यही कर रही है. वोट मिलने की एक वजह ये भी हो सकती है.  

एक टीवी एंकर ने मुझे बताया कि एक बीजेपी नेता ने एक बार व्यंग्य करते हुए मजाक में कहा था, "हमारा लॉगिन विकास है लेकिन हमारा पासवर्ड ध्रुवीकरण है." 

ऐसा लगता है कि धार्मिक ध्रुवीकरण के बाद वोटिंग बटन दबाए जाने पर बीजेपी को बंपर सीटें मिलेंगी. कम से कम असम और पश्चिम बंगाल के अलावा धार्मिक रूप से चार्ज किए गए उत्तरी हिंदी हार्टलैंड राज्यों में तो इसका फायदा मिलेगा तय है. इन इलाकों में बांग्लादेश और म्यांमार से मुसलमानों का अवैध अप्रवास एक भावनात्मक मुद्दा है.

विपक्षी दलों के पास CAA के विरोध के लिए कुछ संवैधानिक सिद्धांत हो सकते हैं, लेकिन सड़कों पर औसत आम नागरिक शायद इसे बेहद सादगी से देखते हैं. वे मानते हैं कि किसी पीड़ित को नागरिकता देने में कोई हर्ज नहीं है. 

आपको इस कानून के बड़े पहलू को समझने के लिए इसे लागू किए जाने का समय, मुख्यधारा और सोशल मीडिया में बीजेपी समर्थकों और प्रवक्ताओं की ओर से किए गए शोर और पृष्ठभूमि में हो रही कई दूसरी चीजों पर नजर रखना होगा. कांग्रेस नेता जयराम रमेश बताते हैं कि कैसे नौ बार टालने के बाद अधिसूचना जारी की गई, ताकि असम और बंगाल में वोटों को ध्यान में रखते हुए इस मामले को लेकर चुनाव से पहले जनता का ध्यान खींच सके.

हालांकि केरल और पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्रियों ने सार्वजनिक तौर से ऐलान किया है कि वे CAA नियमों को लागू नहीं करेंगे (इस तरह वे सुप्रीम कोर्ट में नए सिरे से लड़ाई लड़ने के लिए तैयार हैं), लेकिन बीजेपी के लिए यह कोई मायने नहीं रखता क्योंकि ऐसा लगता है कि यह कार्रवाई अदालत के फैसले के बजाय चुनावी जनादेश की ओर ज्यादा इशारा करती है. इस बात पर गौर करें कि CAA का दर्शन बीजेपी के वैचारिक कर्ताधर्ता, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के अनुरूप है, जो भारत को हिंदू राष्ट्र के रूप में परिभाषित करता है, जिसे भारत कहा जाता है.

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लोकसभा चुनाव की पृष्ठभूमि में बड़ी तस्वीर

पृष्ठभूमि में, हमारे पास पश्चिम बंगाल के संदेशखाली में विपक्षी तृणमूल कांग्रेस के एक मुस्लिम नेता शाहजहां शेख द्वारा महिलाओं के कथित यौन शोषण का मामला है और मुसलमानों के बीच बाल विवाह के खिलाफ असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा की कार्रवाई.

बीजेपी शासित राज्य उत्तराखंड में फरवरी में विवादास्पद समान नागरिक संहिता (यूसीसी) पारित होने से तस्वीर और भी स्पष्ट हो गई है. यूसीसी में लिव-इन रिलेशनशिप के अनिवार्य रजिस्ट्रेशन जैसे विवादास्पद प्रावधान शामिल हैं, लेकिन आप और ज्यादा गौर करके देखें तो यूसीसी का ज्यादा फोकस मुसलमानों के बीच बहुविवाह पर केंद्रित है, जिसे भारत में तकनीकी रूप से अनुमति मिली है.

हालांकि कानून में - गोद लेने, तलाक और विरासत जैसे मुद्दों को शामिल किया गया है, चुनावी चर्चा अक्सर मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत पुरुषों को मिलने वाले विशेषाधिकार के आसपास केंद्रित होती है, हालांकि वास्तव में, बहुविवाह काफी दुर्लभ है और अक्सर कठिन परिस्थितियों के अधीन ही होता है.

मुख्यधारा की मीडिया रिपोर्टों में गृह मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, पड़ोसी देशों के सताए हुए अल्पसंख्यकों के कम से कम 31,000 सदस्यों को सीएए नियमों से फायदा होगा. भले ही यह संख्या अनुमान से तीन गुना अधिक हो, 1.4 अरब लोगों वाले भारत के लिए यह समुद्र में एक बूंद के समान है.

हालांकि, राजनीतिक दृष्टि से, सीएए को लेकर चर्चा को चुनावी बातचीत का केंद्र बनाना कुछ ऐसा है जो बीजेपी-आरएसएस ब्रांड के हिंदू राष्ट्रवाद से मेल खाता है. यदि और साक्ष्य की आवश्यकता है, तो उन फिल्मों को देखें, जो दक्षिणपंथी विचारों का प्रचार करती हैं, जो इस सीजन में सीनेमाघरों में रीलीज हो रही हैं.

बीजेपी नेता गुडुर नारायण रेड्डी ने 1948 के आसपास हैदराबाद में हिंदू-मुस्लिम तनाव पर आधारित रजाकार: साइलेंट जेनोसाइड ऑफ हैदराबाद नाम से फिल्म बनाई है, जो 15 मार्च को रिलीज होने वाली है

हिंदू महासभा के नेता विनायक दामोदर सावरकर पर आधारित फिल्म, स्वतंत्र वीर सावरकर, जिसे बीजेपी कांग्रेस पार्टी के महात्मा गांधी का मुकाबला करने के लिए स्वतंत्रता आंदोलन के प्रतीक के रूप में उठा रही है, ये एक हफ्ते बाद स्क्रीन पर आने वाली है.

दशकों के हिंदू-मुस्लिम झगड़ों के बाद हासिल की गई जगह पर जनवरी में मोदी द्वारा अयोध्या में एक भव्य राम मंदिर के प्राण प्रतिष्ठा की पृष्ठभूमि में हो रही यह सारी बातचीत, आगामी आम चुनावों के आसपास एक गहरी ध्रुवीकरण रणनीति के लिए मंच तैयार करती है.

क्या यह कहने का समय आ गया है कि, मामला इलेक्टोरल है?

(लेखक एक वरिष्ठ पत्रकार और टिप्पणीकार हैं, जो रॉयटर्स, इकोनॉमिक टाइम्स, बिजनेस स्टैंडर्ड और हिंदुस्तान टाइम्स के लिए काम कर चुके हैं. उनसे ट्विटर @madversity पर संपर्क किया जा सकता है. यह एक ओपिनियन आर्टिकल है, यहां व्यक्त किए गए विचार लेखक के अपने हैं. क्विंट हिंदी न तो इसका समर्थन करता है और न ही इसके लिए जिम्मेदार है.)

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