BJP के सहयोगी आज उसे शक की नजर से क्‍यों देखते हैं?
बीजेपी को ये अहसास है कि बिना शिवसेना के वो महाराष्ट्र नहीं बचा सकती
बीजेपी को ये अहसास है कि बिना शिवसेना के वो महाराष्ट्र नहीं बचा सकती(फोटो: Lijumol Joseph/The Quint)

BJP के सहयोगी आज उसे शक की नजर से क्‍यों देखते हैं?

बीजेपी का अपने सहयोगी दलों के साथ व्यवहार कैसा है? पुरानी बीजेपी गठबंधन का धर्म निभाने का दावा करती थी. वैसा दिखता भी था, लेकिन नरेंद्र मोदी और अमित शाह की नई बीजेपी में 'टर्म ऑफ इंगेजमेंट' की कसौटी अलग है. साथी दल बीजेपी के विस्तार के काम आने वाले औजार हैं. आहुति का सामान हैं. उससे ज्यादा कुछ नहीं. रिश्ता एकतरफा है.

एक कसौटी है कि अपने को बराबरी का पार्टनर मत समझिए. इसके उदाहरण हैं चंद्रबाबू नायडू. नायडू को उम्मीद थी कि बीजेपी उन्हें अहमियत देगी, नियमित सलाह-मशविरा करेगी. आंध्र के लिए जब उन्होंने पैकेज मांगा और एसर्ट करने की कोशिश की, तो बीजेपी ने उनसे बेरुखी दिखाना शुरू कर दिया. नायडू ने ये समझने में देर कर दी और आखिरकार उन्हें एनडीए छोड़ना पड़ा.

शिवसेना को भी यही भ्रम था कि उसे पहले की तरह बीजेपी सीनियर पार्टनर नहीं, तो कम से कम बराबरी का पार्टनर तो माने. लेकिन नई बीजेपी को ये लगता था कि उसे चप्पा-चप्पा जीतना है. भले ही जिसके सहारे जीते, उसे  बाद में तोड़ना या छोड़ना पड़े.

इस मामले में कोई मुरव्वत नहीं होगी. शिवसेना ने भी खूब पैर पटके, बागी अंदाज दिखाया. बीजेपी नहीं पिघली, लेकिन बीजेपी को ये अहसास है कि बिना शिवसेना के वो महाराष्ट्र नहीं बचा सकती. उसके पक्ष में 2014 वाला माहौल नहीं है.

कांग्रेस-एनसीपी गठबंधन दुरुस्त दिख रहा है, इसलिए नायडू को खोने के बाद शिवसेना को खोने का रिस्क बीजेपी नहीं उठा सकती. हाल के दिनों में ये सिग्नल मिल गए हैं कि बीजेपी इस पार्टनरशिप को बचाने में लगी हुई है. लेकिन ये मानना गलत होगा कि उद्धव ठाकरे मनमुटाव भूलकर बीजेपी पर भरोसा करने लगेंगे.

कांग्रेस-एनसीपी गठबंधन दुरुस्त है
कांग्रेस-एनसीपी गठबंधन दुरुस्त है
(फोटो: PTI)

उद्धव का टारगेट साफ है. लोकसभा चुनाव में दो सीट कम-ज्यादा पर वो मान भी जाएं, लेकिन विधानसभा चुनाव में शर्त होगी कि मुख्यमंत्री शिवसेना का होगा. डीलमेकर या ब्रेकर ये है. उद्धव नई बीजेपी के साथ लगातार पंजा लड़ा रहे हैं, जो जाहिर है कि बीजेपी को पसंद नहीं आ रहा.

महबूबा मुफ्ती के साथ तो बेहद अजीब सलूक हुआ. जम्मू-कश्मीर में बीजेपी ने पीडीपी के साथ एक बेमेल गठजोड़ किया था. लेकिन इस राज्य की चुनौतियों से निपटने के लिए उसके पास कोई ईमानदार प्लान नहीं था. बीजेपी के लिए कश्मीर एक स्थायी पंचिंग बैग है.

आम चुनाव के पहले बीजेपी के लिए ये जरूरी हो गया कि वो इस गठजोड़ से बाहर हो जाए. हिंदुत्व और राष्ट्रवाद का बीजेपी का जो मूल आधार है, उस पर वो अपने कोर वोटर से क्या कहती. इसीलिए कश्मीर के हालात कितने भी क्यों न बिगड़ जाएं, राजधर्म का शीर्षासन क्यों न हो  जाए, 2019 चुनावों के बाद राज करते रहने के लिए महबूबा सरकार की कुर्बानी फायदे का सौदा लगा, तो कुर्बानी हो गई.

बड़ी पार्टियों में अकाली दल ही एक ऐसा सहयोगी है, जिससे बात बिगड़ी नहीं है, लेकिन इस रिश्ते में जोश भी नहीं है. सबूत है अगस्त महीने में अकाली नेता नरेश गुजराल का ये बयान कि बीजेपी को अपने सहयोगी दलों के साथ उचित व्यवहार करना चाहिए और उनके इलाकों में घुसपैठ नहीं करनी चाहिए.

बीजेपी का शुरू से ही इरादा था कि वो बड़ी सहयोगी पार्टियों को कम तवज्जो देगी और उनकी जगह छोटी-छोटी पार्टियों का स्टॉक इकट्ठा कर लेगी. उन्हें मैनेज करना आसान होगा. लेकिन ये भी नहीं हुआ.

बिहार के उपेन्द्र कुशवाहा और उत्तर प्रदेश में ओमप्रकाश राजभर बीजेपी से अपनी नाराजगी लगातार जाहिर करते रहे हैं. आखिरकार कुशवाहा ने 5 राज्‍यों में विधानसभा चुनाव के नतीजे आने से ठीक एक दिन पहले केंद्रीय मंत्रिमंडल से इस्‍तीफा दे दिया. साथ ही उनकी पार्टी ने एनडीए से भी बाहर होने का फैसला कर लिया.

उपेंद्र कुशवाहा ने पीएम मोदी को भेजे अपने इस्तीफे में कहा कि प्रधानमंत्री के नेतृत्व में वे हतोत्‍साह महसूस कर रहे हैं. इससे एक कदम आगे जाकर उन्‍होंने ये भी कह दिया कि उनके साथ ‘धोखा' हुआ है.

मोदी सरकार की नीति पर उंगली उठाते हुए उन्होंने चिट्ठी में लिखा:

‘‘यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि सरकार की प्राथमिकता गरीब और दबे-कुचलों के लिए काम करने की नहीं, बल्कि राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों को किसी भी तरीके से ‘ठीक’ करने की है.’’ 

एनडीए में 40 से ज्‍यादा पार्टियां हैं, लेकिन अकेले बीजेपी के पास बहुमत होने के कारण ये पार्टियां मार्जिन पर पड़ी सजावट का समान ही हैं.

यूपी के बहराइच लोकसभा सीट से BJP सांसद सावित्रीबाई फुले ने पिछले ही सप्‍ताह पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा देने के बाद सीधे-सीधे पीएम मोदी की आलोचना की.

सावित्रीबाई फुले ने कहा:

“चौकीदार की नाक के नीचे गरीबों का पैसा लूटा जा रहा है. बीजेपी और संघ के लोग समाज को बांटने के काम में लगे हैं और बाबासाहेब के संविधान से छेड़छाड़ कर उसे खत्म करने की कोशिश में जुटे हैं.’’ 

अपना प्रहार तेज करते हुए उन्‍होंने कहा:

‘’विकास पर ध्यान न देकर मूर्तियां बनवाई जा रही हैं. अल्पसंख्यक और अनुसूचित वर्ग को धोखा दिया जा रहा है. मैं बीजेपी की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा दे रही हूं, लेकिन सांसद बनी रहूंगी.”

अब जरा तमिलनाडु की ओर देखिए. तमिलनाडु में बीजेपी संघ के लॉन्ग टर्म प्लान पर काम कर रही है. एआईएडीएमके के साथ एक कामचलाऊ रिश्ता है. द्रविड़ पार्टियों के वर्चस्व को तोड़ने का प्लान है. बीजेपी का हथियार वहां रजनीकांत हैं.

बीजेपी का इरादा अभी के लिए ये है कि किसी द्रविड़ पार्टी को 25-30 सीटें मिलने का पुराना सिलसिला टूट जाए, तो वो छोटे दलों से बारगेन करने में मजबूत हालात में रहेगी.
तेलंगाना में आगे के लिए केसीआर पर बीजेपी की नजर है. लेकिन कुछ कद्दावर नेता ऐसे हैं, जिनसे नई बीजेपी शुरू से ही दूर रहने का फैसला कर चुकी थी. वाजपेयी के गठजोड़ में में ममता बनर्जी, नवीन पटनायक  और फारूक अब्दुल्ला शामिल थे, लेकिन अब वो सब बेगाने हैं.

इकलौता नया रिश्ता बना बिहार में नीतीश कुमार से. ये एक पहेली है. दोनों के बीच गर्मजोशी कम और एक-दूसरे से सावधानी ज्‍यादा नजर आती है. ये हुई सहयोगी दलों की बात. एक नजर डालिए उन नेताओं पर, जो बीजेपी में थे या शामिल हुए, उनका क्या हाल हुआ.

ताजा मिसाल महाराष्ट्र के नारायण राणे हैं, जो कई पार्टियों से घूमते-घामते बीजेपी में पहुंच तो गए, लेकिन उन्हें कोई पद नहीं मिला. अब निराश हैं. शरद पवार उनसे बात कर रहे हैं. उड़ीसा में  बीजेडी के दो बड़े प्रादेशिक नेता दिलीप रे और विजय महापात्रा ने बीजेपी में कुछ वक्‍त गुजारने के बाद हाल ही में पार्टी छोड़ दी है.

बीजेपी से निराश हैं नारायण राणे
बीजेपी से निराश हैं नारायण राणे
(फोटोः IANS)

राष्ट्रीय स्तर पर ये  बड़े नाम नहीं, लेकिन राज्य में ये पहली कतार वाले नाम हैं. एक बदलाव ये आया है कि बीजेपी में शामिल होने का वन-वे ट्रैफिक बंद हुआ है. अब उलटा भी हो रहा है. अभी विधानसभा चुनाव में राजस्थान और मध्य प्रदेश में कई मंझले स्तर के नेता कांग्रेस में शामिल हुए हैं. जसवंत सिंह के बेटे मानवेन्द्र सिंह इसके एक ताजा उदाहरण हैं. नवजोत सिंह सिद्धू और उनके पहले कीर्ति आजाद का किस्सा तो याद है ही.

एक तबका और है. वो है यशवंत सिन्हा, अरुण शौरी और शत्रुघ्न सिन्हा जैसे पुराने बीजेपी नेताओं का, जिनको नया नेतृत्व नहीं पचा पाया. तर्क दिया जा सकता है कि आरके सिंह, हारदीप पुरी और सत्यपाल सिंह जैसे कई नए चेहरे हैं, जो बीजेपी में आए और पहले ही राउंड में मंत्री बन गए. इसमें एक फर्क है. ये ज्‍यादातर लोग टेक्नोक्रेट हैं, राजनीतिक नहीं.

समस्या राजनीतिक लोगों से है. दो तरह के राजनीतिक लोग- एक वो, जिनके पास वोट हैं, अपना जनाधार है. दूसरे वैसे राजनीतिक लोग, जो आपसे तर्क कर सकते हैं और मतांतर रख सकते हैं. नई बीजेपी इनको नहीं पचा पाती.

गठबंधन का धर्म हो या मतभेद रखने वाले नेता के साथ निर्वाह, इन दोनों चीजों को साधने के लिए लोकतांत्रिक मन की जरूरत होती है. वो शॉर्ट सप्लाई में है.

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