बेचैन है कश्मीर, लोकतंत्र पर सवाल, उत्तर-पश्चिम में भी हलचल तेज
कश्मीर के पुनर्गठन और आर्टिकल 379 को हटाए जाने पर क्या है बुद्धिजीवियों की राय
कश्मीर के पुनर्गठन और आर्टिकल 379 को हटाए जाने पर क्या है बुद्धिजीवियों की राय(फोटो: इरम गौर/  द क्विंट)

बेचैन है कश्मीर, लोकतंत्र पर सवाल, उत्तर-पश्चिम में भी हलचल तेज

विश्वासघाती हुआ भारतीय लोकतंत्र

भानु प्रताप मेहता ने इंडियन एक्सप्रेस में लिखा है कि भारतीय लोकतंत्र विश्वासघात और खून में सराबोर हो गया है. वे लिखते हैं कि बीजेपी सरकार ने जम्मू-कश्मीर को प्राप्त विशेष दर्जा खत्म करते हुए इसे दो संघ शासित प्रदेशों में बांटकर वास्तव में अपने चरित्र का खुलासा कर दिया है. एक ऐसा देश, जहां केवल ताकत का जोर है, कहीं कोई कानून, स्वतंत्रता और नैतिकता नहीं है. लोकतंत्र दिखावा होकर रह गया है. एक ऐसा देश, जहां आम लोग अंधराष्ट्रवाद का चारा बनने को विवश हैं.

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भानु प्रताप आगे लिखते हैं कि अनुच्छेद 370 और 35 ए को हटाने के कई तर्क हो सकते हैं. यथास्थिति खतरनाक हो चली थी. मगर, जो चीजें हुई हैं उससे कश्मीर और शेष देश के बीच खाई बढ़ेगी. भारत ने अपने ही संविधान के साथ धोखा किया है. कश्मीर के अलावा देश के कई प्रदेशों के सामने भी अब ये सवाल उठ खड़ा हुआ है कि कहीं उनके साथ भी यही सलूक न हो. वास्तव में देश केंद्र शासित प्रदेशों का संघ बन गया है जहां जिसे मर्जी होगी, उसे राज्य का दर्जा दिया जाएगा.

भानु प्रताप मेहता मानते हैं कि भारतीय लोकतंत्र का बहुसंख्यकवाद में पतन हो रहा है. विपक्ष का निरुद्देश्य विरोध बहुसंख्यकवाद को ही मजबूत करेगा. सुप्रीम कोर्ट की ओर नजर जरूर है मगर उसका ट्रैक रिकॉर्ड देखकर ऐसा नहीं लगता कि कुछ होने वाला है.

UAPA, NRC, सांप्रदायिकरण, अयोध्या जैसे सभी मुद्दों को जोड़ने से कश्मीर का मतलब समझ में आता है. देश में कोई मुस्लिम बहुल प्रदेश कैसे हो सकता है. इस सोच को आगे बढ़ाने में मीडिया मशीनरी का इस्तेमाल हो रहा है. बीजेपी सोचती है कि वह कश्मीर का भारतीयकरण कर रही है मगर वास्तव में भारत का कश्मीरीकरण होता दिख रहा है.

ऐतिहासिक गलती सुधारी गई

बीजेपी नेता राम माधव ने इंडियन एक्सप्रेस में लिखा है कि ऐतिहासिक गलती को सुधारने की कोशिश की गई है. अनुच्छेद 370 और 35ए को खत्म किया जाना बहुप्रतीक्षित था. अब जम्मू और कश्मीर के लोगों का भारतीय संघ के साथ आत्मीयरूप से एकीकरण हो गया है. वे लिखते हैं कि 17 अक्टूबर 1949 को एक गलती हुई थी जिसे ठीक कर लिया गया है.

लेखक ने याद दिलाया है कि एन गोपालस्वामी आयंगर ने आर्टिकल 306ए के तहत जिसे संविधानसभा के ड्राफ्ट में शामिल किया था उसमें उन्होंने कश्मीर स्टेट की बात कही थी जिसके पास खुद अपने लिए कानून बनाने का अधिकार होता. इस पर मौलाना हसरत मोहानी ने कड़ी आपत्ति जताई थी.

लेखक ने एक और वाकये की याद दिलाई है जब 27 मई 1949 को जम्मू-कश्मीर की कन्स्टीच्यूएंट असेम्बली के लिए सदस्यों के नामांकन की बात उठी तो यहां सभी 4 सदस्यों को मनोनीत करने का अधिकार महाराजा हरि सिंह को दे दिया गया. जम्मू कश्मीर प्रजा सभा का हक छीन लिया गया. इसके लिए लेखक ने पंडित जवाहरलाल नेहरू को जिम्मेदार ठहराया है. उन्होंने लिखा है कि शेख अब्दुल्ला की पार्टी ने 1946 में अलग कश्मीर के लिए महाराजा हरि सिंह से बगावत की थी, फिर भी उस पार्टी से मनोनयन हुआ.

राम माधव लिखते हैं कि इस पृष्ठ भूमि में अनुच्छेद 370 के बाद 35ए को भी असंवैधानिक तरीके से संविधान का हिस्सा बनाया गया. वे बी.आर. अम्बेडकर को इस बात का श्रेय देते हैं कि उन्होंने अनुच्छेद 370 को संविधान के 21वें अध्याय में रखा, जहां इसे अस्थायी, बदलाव योग्य और विशेष बताया गया. लेखक लिखते हैं कि ये दोनों अनुच्छेद अलगाववादियों की ताकत बन गए थे, जिसके आधार पर वे कश्मीर को भारत से अलग बताने की कोशिशें किया करते थे. लेखक ने जम्मू-कश्मीर को दो हिस्सों में बांटने का भी स्वागत किया है.

10 साल का रोडमैप जरूरी, तब बनेगा ‘नया कश्मीर’

लेखक मनीष सभरवाल ने इंडियन एक्सप्रेस में ‘नया कश्मीर’ की याद दिलाई है. राजतंत्र से संवैधानिक गणतंत्र की ओर कदम बढ़ाते हुए महाराजा हरि सिंह ‘नया कश्मीर’ का नारा दिया था. अर्थशास्त्री अल्बर्ड हिर्शमैन की किताब ‘पैशन एंड इंटरेस्ट’ का जिक्र करते हुए वे जम्मू-कश्मीर के लोगों के लिए रोजगार, कौशल, एंटरप्राइज, संपत्ति, आय, विकास की सम्भावनाएं तलाशते हैं. वे कहते हैं इस प्रदेश के युवाओं का अनुभव अच्छा नहीं रहा है शिक्षा से लेकर नौकरी तक के मामले में.

लेखक प्रोफेसर रिकार्डो हाऊसमैन के हवाले से भी लिखते हैं कि आर्थिक सफलता आर्थिक जटिलता में ही छिपी होती है और विकास भी इसी माहौल में होता है. वे व्याकरण की भाषा में बताते हैं कि स्वर का इस्तेमाल सरकार करती है मगर अक्षर और स्वरों का इस्तेमाल हमें खुद करना होता है ताकि बेहतर अभिव्यक्ति कर सकें.

प्रोफेसर जेम्स रॉबिन्सन के हवाले से लेखक लिखते हैं कि समावेशिक आर्थिक व्यवस्था को समावेशी राजनीतिक व्यवस्था से ही स्वर प्राप्त होते हैं. जम्मू कश्मीर की दयनीय आर्थिक व्यवस्था का जिक्र लेखक तथ्यों के साथ करते हैं. कारपेट बुनने वाला 150 रुपया प्रतिदिन पाता है जबकि निर्माण मजदूर भी एक दिन में 600 रुपये मजदूरी पाता है. जम्मू-कश्मीर की जीडीपी 0.7 फीसदी मात्र है. लेखक का मानना है कि रास्ता आसान नहीं है लेकिन कम से कम 10 साल की रणनीति बनाकर शिक्षा और रोजगार से लेकर भारतीय अर्थव्यवस्था की जटिलताओं से सामना किया जा सकता है.

जम्मू-कश्मीर के बाद उत्तर-पश्चिम में भी बदलाव की बयार

सी. राजा मोहन ने इंडियन एक्सप्रेस में लिखा है कि जम्मू-कश्मीर की स्थिति में बदलाव के बीच उत्तर पश्चिम की स्थिति में भी बदलाव के आसार दिख रहे हैं. तेजी से घटनाक्रम बढ़ रहा है. अफगानिस्तान से अमेरिकी सेना की वापसी, तालिबान के साथ बातचीत, अफगानिस्तान सरकार और तालिबान में बातचीत और इन सबके बीच पाकिस्तान की भूमिका तेजी से बढ़ी है. भारत-पाक सीमा पर तनाव बढ़ाकर पाकिस्तान अमेरिका के साथ सौदेबाजी करने की कोशिश में जुटा है.

अमेरिका और पाकिस्तान के बीच आम सहमति है कि अमेरिका को अफगानिस्तान में पाकिस्तान मदद करेगा. इमरान खान और कमर जावेद बाजवा की अमेरिका यात्रा इसी पर केंद्रित रहा था. बाजवा की मध्यस्थता में अमेरिका और तालिबान के बीच 8 चक्र की बातचीत हो चुकी है. अफगानिस्तान में अमेरिका के विशेष राजदूत जालमे खालिजाद दोहा की यात्रा के दौरान काबुल और इस्लामाबाद आ चुके हैं. आशा की जा रही है कि जल्द ही ये सारी गतिविधियां अपने अंजाम को पहुंचेंगी. अमेरिकी सेना अफगानिस्तान से क्रमवार हटेंगी और तालिबान की वार्ता अफगान सरकार से होगी. डोनाल्ड ट्रम्प की अफगान यात्रा की तैयारी भी चरम पर है.

लेखक का मानना है कि इस पृष्ठभूमि में भारत को जम्मू-कश्मीर को लेकर भारत के भीतर और बाहर प्रतिक्रियाओं के लिए तैयार रहना होगा.

कश्मीरी फिर वहीं पहुंच गए

बिहार में सक्रिय कश्मीर से जुड़े इमाद उल रियाज ने इंडियन एक्सप्रेस में लिखा है कि बीते 24 घंटे में वह अपने परिवार से कटे हुए हैं और उनकी सुरक्षा को लेकर चिंतित हैं क्योंकि जम्मू-कश्मीर में मोबाइल, इंटरनेट सब ठप पड़े हैं. अपनी छवि की चर्चा करते हुए लेखक का मानना है कि वे राजनीतिक रूप से सही, भारत समर्थक हैं. फिर भी जम्मू-कश्मीर के उन्मादी माहौल में वे सुरक्षित नहीं हैं क्योंकि वहां तीन तरह के लोग हैं भारत समर्थक, कश्मीर समर्थक और पाकिस्तान समर्थक. लेखक ने लिखा है कि वह अपने साथ आईडी कार्ड, पासपोर्ट और मोबाइल रखना नहीं भूलते क्योंकि आशंका है कि कहीं उनसे पूछताछ या उनकी गिरफ्तारी न हो जाए.

लेखक भारत को राज्यों का संघ बताते हैं जहां विभिन्न भाषा, संस्कृति और धर्म के लोग रहते हैं. वे इस बात पर जोर देते हैं कि मुख्य धारा की राजनीति करने वाले लोग इस सच को स्वीकार करते हैं. वे लिखते हैं कि वर्तमान समय में जो हो रहा है उसे देखते हुए बाबा साहेब अम्बेडकर की बात याद आती है जिन्होंने चेताया था कि केवल राजनीतिक स्वतंत्रता ही काफी नहीं है. वे लिखते हैं कि अनुच्छेद 370 को निष्प्रभावी बनाना ही सिर्फ मसला नहीं है. असल मसला है कि असंवैधानिक तरीके से ऐसा किया गया है. राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय कानूनों को तोड़ा गया है. वे लिखते हैं कि लोकतत्र और भारत की सोच का मजाक उड़ाया गया है.

इंडियन एक्सप्रेस ने अपने संपादकीय में लिखा है कि जम्मू और कश्मीर को दिया गया विशेष राज्य का दर्जा भारतीय गणतंत्र के निर्माताओं ने दिया था. यह किसी का व्यक्तिगत फैसला नहीं था. इसका आधार राष्ट्र का निर्माण था. यह एक मुस्लिम बहुल प्रदेश की मान्यता और उसकी डेमोग्राफी को बचाए रखने के लिए संविधान की ओर से रक्षा का वादा था.

5 अगस्त 2019 को जो घटना घटी है वह इतिहास को दोबारा लिखने और उस डेमोग्राफी को बदलने की कोशिश के साथ-साथ नये भारत का विचार लिए हुए है. इस पर नरेंद्र मोदी की मजबूत मुहर है. यह बदलाव ऐतिहासक है जो नेहरू के दौर के भारत के आगे लाल लकीर खींच देता है.

संपादकीय में यह चिंता जताई गई है कि आने वाले समय में यह नया भारत कौन सी शक्ल लेने वाला है. जम्मू-कश्मीर की स्थिति में जिस तरीके से बदलाव हुआ है उसके लिए जो अहतियात और रहस्यमय माहौल बनाया गया है उसका स्वतंत्र भारत में कोई दूसरा उदाहरण नहीं है. यह खासकर इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि राजनीतिक और सामुदायिक रूप से यह विवादास्पद विषय था और संसद का सत्र जारी था. शायद यही बीजेपी का तरीका हो, लेकिन यह लोकतांत्रिक नजरिए से पूरी तरह गलत है.

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