कोरोनावायरस: ना-ना करते हो ही गया लॉकडाउन, करोड़ों को भूली सरकार
लॉकडाउन के बाद 23 मार्च को दिल्ली के इंद्रप्रस्थ बस डिपो में ठिठकीं बसें
लॉकडाउन के बाद 23 मार्च को दिल्ली के इंद्रप्रस्थ बस डिपो में ठिठकीं बसें(फोटो: PTI)

कोरोनावायरस: ना-ना करते हो ही गया लॉकडाउन, करोड़ों को भूली सरकार

22 मार्च को जब शाम के पांच बजे तो हर घर की खिड़की से, बॉलकनी से आवाज आई कि मोदी जी आप आवाज तो दीजिए हम आपके साथ हैं. लेकिन क्या सरकार इस मुश्किल घड़ी में लोगों के साथ है? जनता कर्फ्यू से पहले कहा गया कि कोरोनावायरस के कारण लॉकडाउन नहीं होगा और फिर जनता कर्फ्यू खत्म होते-होते देश के 80 से ज्यादा जिलों में लॉकडाउन हो गया. पंजाब और महाराष्ट्र में तो कर्फ्यू है. ऐसा लग रहा है कि प्लानिंग और पारदर्शिता की कमी के कारण करोड़ों की जिंदगी लॉकडाउन हो गई है.

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साफ बताते, सुविधा होती

लॉकडाउन जरूरी भी है तो इसका ऐलान करते समय लगता है सरकारें उन करोड़ों लोगों को भूल गईं, जो घर से न निकलें तो जिंदगी रुक जाती है. कोरोनावायरस के आर्थिक असर को लेकर भी सरकार की ढिलाई साफ नजर आ रही है.
जब पीएम मोदी जनता कर्फ्यू का ऐलान कर रहे थे तब भी उन्होंने कहा कि सामान जमा करने की जरूरत नहीं है. अब लॉकडाउन है. राशन के लिए बाहर निकल भी सकते हैं तो जोखिम रहेगा क्योंकि जैसे-जैसे दिन बीत रहे हैं कोरोनवायरस से संक्रमण के मामले बढ़ रहे हैं. अगर इस कैटेगरी के लोगों को थोड़ा वक्त मिल जाता तो शायद वो इस लॉकडाउन को बेहतर प्लान कर सकते थे.

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करोड़ों लोग भगवान भरोसे

अब आते हैं दूसरी कैटेगरी के लोगों पर. शहरों की चमक-दमक में बैठे बहुत सारे लोगों को ये अंदाजा भी नहीं कि आज भी देश में ऐसे करोड़ों लोग ऐसे हैं जिन्हें रात की रोटी तब नसीब होती है जब वो दिन भर पसीना बहाते हैं. ये लोग रोज घर से निकलते हैं, काम तलाशते हैं और काम मिलता है तो खाना मिलता है.

पीरियोडिक लेबर फोर्स सर्वे 2017-18 के मुताबिक देश के गांवों की 25 फीसदी आबादी और शहरों की 12 फीसदी आबादी ऐसी है जिसके पास कोई स्थाई नौकरी नहीं. EUS के आंकड़ों (2011-12) के मुताबिक देश में 12 करोड़ दिहाड़ी मजदूर हैं. अक्सर ये किसी सामाजिक सुरक्षा योजना से कवर भी नहीं होते.

वर्ल्ड बैंक ग्लोबल फिंडेक्स डेटाबेस 2017 के मुताबिक भारत के 80% युवाओं के पास बैंक अकाउंट तो था लेकिन पिछले एक साल में सिर्फ 43% ने पैसे निकाले थे. आप कल्पना कीजिए ऐसा क्यों हुआ होगा. जरा सोचिए कि अगर ये लोग काम पर नहीं निकलेंगे तो इनके घर का दाना-पानी कैसे चलेगा? ये भी याद रखिए कि इस वक्त देश में 45 साल में सबसे ज्यादा बेरोजगारी है. एक दो सरकारों को छोड़कर किसी राज्य ने लॉकडाउन का ऐलान करते समय ये नहीं बताया कि इनके यहां चूल्हा कैसे जलेगा?

कहीं-कहीं छिटपुट मदद

  • यूपी सरकार ने दिहाड़ी मजदूरों को 1000 रुपए महीने की मदद देने का ऐलान किया है
  • कर्नाटक सरकार ने राशन कार्ड धारियों को दो महीने का राशन मुफ्त में एक साथ देने का ऐलान किया है
  • तेलंगाना सरकार ने व्हाइट राशन कार्ड धारियों को 12 किलो चावल (प्रति व्यक्ति) मुफ्त और हर परिवार को 1500 रुपए देने का ऐलान किया है
  • दिल्ली सरकार ने कंपनियों से कहा है कि लॉकडाउन के कारण गैरहाजिर होने वाले कर्मचारियों की सैलरी न काटें
  • दिल्ली सरकार ने बजट 2020 में कोरोना क्राइसिस के लिए 90 करोड़ की व्यवस्था की है
  • केरल सरकार ने 2000 करोड़ का कोरोना फंड बनाया है. इससे फ्री राशन, गरीबों को 1000 रुपए महीने और पेंशन भी दी जाएगी.
  • राजस्थान सरकार ने एडवांस राशन और फूड पैकेट देने की बात कही है

2009 में आई तेंदुलकर कमेटी की रिपोर्ट के मुताबिक देश में करीब 22 फीसदी लोग गरीबी रेखा से नीचे रहते हैं. जाहिर है ये आंकड़ा पुराना है और इसपर विवाद है. अब इसके पैमाने को भी देख लीजिए. शहरों में रोज जिनकी कमाई 32 रुपए, और गांवों में 27 रुपए से ज्यादा है, वो गरीब नहीं हैं. अब जो गरीब नहीं हैं, वो ढेर सारी सरकारी मदद वाली योजनाओं से भी बाहर हैं.

18 मार्च को उपभोक्ता और खाद्य मामलों के मंत्री राम विलास पासवान ने ऐलान किया कि पीडीएस (सरकारी राशन दुकान) में लोगों को एक साथ 6 महीने की राशन उठाने की छूट दी जाएगी. लेकिन समस्या ये है कि सबसे गरीब 40% लोगों में से 40% फीसदी के पास राशन कार्ड तक नहीं. तो ऐसे दिहाड़ी मजदूर, ऐसे गरीब लोग लॉकडाउन में कैसे राशन पाएंगे? क्या सरकार ने सोचा?

आखिर जनधन के खाते कब काम आएंगे? क्यों नहीं सरकार इन खातों में कोरोना मदद के नाम पर कुछ रकम डालती? पीएम मोदी ने जनता कर्फ्यू वाली रात कोरोना इकनॉमिक टास्क फोर्स का ऐलान किया. लेकिन असल मदद कब आएगी, अभी तक तो पता नहीं.

किसानों, कारोबारी और इकनॉमी का क्या होगा?

फसलों की सही कीमत नहीं मिलने के कारण किसानों की आत्महत्या इस देश में आम बात है. जरा सोचिए अगर उनकी फसल बिके ही नहीं तो क्या होगा? गेहूं और दलहन की फसल तैयार है. लेकिन सरकारी मंडियां बंद होंगी तो किसान की फसल कौन खरीदेगा. सरकार द्वार तय सही कीमत कौन देगा? तो क्या सरकार ने इनके बारे में सोचा?

पूर्व वित्त मंत्री पी चिदंबरम का सुझाव है - पीएम किसान योजना में सब्सिडी को डबल कीजिए, टैक्स की पेमेंट में मोहलत दीजिए. जीएसटी जैसे टैक्स घटाइए. गरीबी को डीबीटी से हर महीने कुछ आर्थिक मदद दीजिए. जो भी परिवार मुफ्त अनाज लेना चाहे, उसे दस किलो चावल या गेंहूं मुफ्त दीजिए. जो कंपनियां छंटनी नहीं करतीं या पगार नहीं घटाती उनकी मदद कीजिए.

लॉकडाउन के कारण फैक्ट्रियां बंद हो रही हैं. मारुति, होंडा ने काम कम करने का ऐलान किया है. डिमांड अचानक घट जाएगी. कंपनियों को होने वाले नुकसान की भरपाई कौन करेगा?  उन्हें राहत देने के लिए आखिर सरकार कब कदम उठाएगी? मंदी से चरमराई हमारी अर्थव्यवस्था अपूर्व संकट के मुहाने पर खड़ी है. इसके लिए क्या एक्शन प्लान है? उम्मीद थी कि वित्त मंत्री 23 मार्च को लोकसभा में किसी राहत पैकेज का ऐलान करेंगी लेकिन ऐसा हुए बिना ही कार्यवाही स्थगित हो गई. यानी फिलहाल राहत की उम्मीद, उम्मीद ही है.

इकनॉमी में किस कदर डर है इसका अंदाजा आप 23 मार्च को शेयर बाजार की तेज गिरावट से लगा ही सकते हैं. सेंसेक्स करीब 4000 प्वाइंट गिरा. एक ही दिन में निवेशकों को करीब 14 लाख करोड़ डूब गए.

ऐसा लॉकडाउन कितना कारगर?

देश में 600 से ज्यादा जिले हैं. लॉकडाउन है 100 से कम जिलों में. तो बाकी जिलों का क्या? मुंबई का उदाहरण लीजिए. जब वहां लॉकडाउन की सुगबुगाहट हुई तो बड़ी तादाद में लोग अपने गांव लौटने लगे. कौन कहां गया पता नहीं. किसी की जांच नहीं हुई. ठीक वैसे ही जैसे चीन के वूहान से शुरुआती दिनों में करीब 50 लाख लोग दूसरे शहरों में गए और फिर वहां से लोग पूरी दुनिया में. मुंबई में इस भगदड़ के बाद अब कर्फ्यू लगाया गया है. तो लॉकडाउन की मौजूदा रणनीति कितनी कारगर होगी, शक है. आखिर क्यों बिहार से अचानक एक व्यक्ति की मौत हो गई, जबकि वहां संक्रमण की खबर भी नहीं थी. एक्सपर्ट कह भी रहे हैं कि आंशिक लॉकडाउन से काम नहीं चलेगा. WHO का तो कहना है कि सिर्फ लॉकडाउन से काम नहीं चलेगा.

हमें असल में उन पर ध्यान केंद्रित करने की जरूरत है जो बीमार हैं, जिनके पास वायरस है, और उन्हें अलग-थलग करना होगा. इस वक्त जरूरत है कि जो लोग बीमार हैं और इससे पीड़ित हैं उन्हें ढूंढा जाए और निगरानी में रखा जाए. तभी इसको रोका जा सकता है.
WHO के इमरजेंसी एक्सपर्ट माइक रयान

माइक रयान के मुताबिक लॉकडाउन के साथ सबसे बड़ी दिक्कत ये है कि जब ये खत्म होगा तो लोग अचानक बड़ी संख्या में बाहर निकलेंगे और फिर खतरा बढ़ जाएगा. तो बेहतर होता कि सरकार टुकड़ों में लॉकडाउन के बजाय पूरे देश में करती. लोगों को समय रहते लॉकडाउन के बारे में खुलकर बताती. जिन्हें जरूरत है, उनके लिए राहतों का ऐलान करती और स्वास्थ्य का पूरा अमला चुस्त और दुरुस्त करती. जनता कर्फ्यू के दिन दिखा कि जनता सहयोग करने को तैयार है, क्या सरकार तैयार है?

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