चीन की करेंसी युआन गिरी तो भारत की टेंशन क्यों बढ़नी चाहिए?
चीन की करेंसी युआन का ऐसे गिरना हमें काफी गमगीन कर सकता है...
चीन की करेंसी युआन का ऐसे गिरना हमें काफी गमगीन कर सकता है...(फाइल फोटो: Reuters)

चीन की करेंसी युआन गिरी तो भारत की टेंशन क्यों बढ़नी चाहिए?

कश्मीर पर जोरदार बहस के दौरान एक दोस्त ने कहा, “और भी गम हैं दुनिया में कश्मीर के सिवा. चीन की करेंसी युआन का तेजी से गिरना क्या कम मुसीबत वाली खबर है.”

मैं ठीक से समझ नहीं पाया और पूछा विस्तार से बताइए. जबाव आया- आपने अमेरिकी शेयर बाजार को एक दिन में 3 से 3.5% गिरते देखा है. सोमवार को ऐसा ही हुआ था. इसकी सबसे बड़ी वजह थी युआन की कीमत में एक दिन में 1.5% से ज्यादा की गिरावट.

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मैं जल्दी से मानने वाला नहीं था. मैंने कहा ये तो अमेरिका और चीन के बीच जो ट्रेड वॉर चल रहा है उसकी ही अगली कड़ी थी. अमेरिका ने चीन के सामानों पर टैरिफ बढ़ाया तो बदले में चीन ने युआन की वैल्यू कम करके विदेशों में बिकने वाले चाइनीज सामानों को सस्ता कर दिया. ताकि टैरिफ की मार के असर को कम किया जा सके. ऑल फेयर इन ट्रेड वॉर.

लेकिन इससे हमें क्यों घबराना चाहिए...

बात बड़ी सिंपल है, मेरे दोस्त ने कहा-

दुनिया की सबसे बड़ी इकनॉमी और दूसरी सबसे बड़ी इकनॉमी कारोबार पर इतना लड़ेंगे तो पूरी दुनिया में मंदी का खतरा बढ़ेगा. दुनिया में मंदी का मतलब हुआ हमारे एक्सपोर्ट्स के लिए कम खरीदार मिलेंगे. मतलब हमारा एक्सपोर्ट्स और कम होगा. एक्सपोर्ट्स में तेजी के बगैर आप अर्थव्यवस्था में तेजी कैसे हासिल कर सकते हैं.

मैंने बीच में टोका- यहां आप इनडायरेक्ट असर की बात कर रहे हैं. वो तो स्वाभाविक है. ग्लोबल ग्रोथ की कमी का असर तो पूरी दुनिया पर पड़ेगा. उससे हमें उतना घबराना चाहिए क्या?

मेरे दोस्त का जवाब था, याद कीजिए कि चीन के साथ हमारा व्यापार घाटा 53 अरब डॉलर का है. हम चीन को 17 अरब डॉलर का एक्सपोर्ट करते हैं और चीन से हमारे यहां 70 अरब डॉलर का इंपोर्ट होता है.

ऐसे में चीन की करेंसी में और भी गिरावट होती है तो इसका मतलब चीन का हमारे देश में एक्सपोर्ट और भी सस्ता हो जाएगा और तब तो अपने देश की बाकी बची मैन्यूफेक्चरिंग यूनिट्स पर भी ताले लग जाएंगे. साथ ही चीन के साथ व्यापार घाटा और भी बढ़ जाएगा. फिर नई नौकरियों का क्या होगा. क्या हम इसके लिए तैयार हैं?

मेरी आंखे खुलने लगी. मायूसी बढ़ने लगी....

मायूसी बढ़ी तो याद आया कि 2015 में चीनी युआन में भारी गिरावट आई थी. उसका असर ये हुआ कि 2015 से लेकर अब तक हमारा एक्सपोर्ट कभी भी संभल नहीं पाया. ऐसे में चीन की करेंसी में फिर से तेज गिरावट हुई है. मतलब अपने देश से होने वाले एक्सपोर्ट्स को संभालने में और कई साल लग सकते हैं. टू बैड.

कुछ सेक्टर्स ऐसे हैं, जहां दुनिया के एक्सपोर्ट मार्केट में हमारा सीधा मुकाबला चीन से है. टेक्सटाइल एक ऐसा ही सेक्टर है. ये सेक्टर काफी रोजगार देने वाला भी है. पिछले दो साल से इस सेक्टर से होने वाला एक्सपोर्ट ठहर सा गया है. ऐपेरल एक्सपोर्ट तो दो साल से गिर रहा है. ऐसे में युआन में हुई गिरावट का असर टेक्सटाइल एक्सपोर्ट पर सीधा होगा. मतलब यह कि एक ऐसा सेक्टर, जिसमें लाखों लोग काम करते हैं, उसमें मंदी से संकट के बादल और भी गहरा सकते हैं.

अब मुझे युआन में आयी गिरावट, क्यों बहुत बुरी खबर है इसका मतलब समझ में आने लगा था. मेरी मायूसी तब और बढ़ गई जब मेरी नजर इकनॉमिक टाइम्स की 7 अगस्त की एक रिपोर्ट पर पड़ी. रिपोर्ट का सार ये है कि एफएमसीजी सेक्टर में ग्रोथ में पिछले एक साल में भारी गिरावट आई है. वैल्यू टर्म जो ग्रोथ रेट जुलाई-सितंबर 2018 में 16.5% था, वो अब 10 परसेंट रह गई है. और वॉल्यूम टर्म में इस अवधि में गिरावट 13.4% से 6.2% रह गई.

रिपोर्ट में कहा गया है कि शहरों में लोग सस्ते सामानों से काम चला रहे हैं और गांवों में तो मांग जैसे गायब ही हो गई है.

तेल, साबुन और पेस्ट जैसे FMCG प्रोडक्ट्स की बिक्री का यह हाल है तो बाकी सेक्टर्स में मांग में कितनी कमी आई होगी, इसका अंदाजा आप खुद ही लगा सकते हैं. ऐसे में युआन की वजह से एक्सपोर्ट फिर से लुढ़क जाता है तो अंदाजा लगाइए कि इकनॉमी के काफी बुरे दिन आने वाले हैं. शेयर बाजार में लगातार गिरावट और विदेशी निवेशकों का रोज अपने बाजार से करीब 2,000 करोड़ रुपये निकालना इसी का तो संकेत है. इसको हम कब तक इग्नोर करेंगे.

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