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‘सबका साथ’ नामक भ्रम के मैसेंजर बन रहे कुछ विशेषाधिकार प्राप्त मुसलमान

जाने-अनजाने मुसलमानों का एक उच्च वर्ग उसी विचारधारा का दूत बन जाता है जो मुस्लिम समाज को नष्ट करना चाहती है.

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‘सबका साथ’ नामक भ्रम के मैसेंजर बन रहे कुछ विशेषाधिकार प्राप्त मुसलमान
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सांप्रदायिक मुद्दों पर टीवी न्यूज चैनल की बहस में भाग लेने के लिए मुझे अक्सर यह कहकर आमंत्रित किया जाता है कि, "हमें आपके जैसे उदार मुस्लिम की जरूरत है". ऐसा कहते हुए उन्हें जरा भी शर्म नहीं आती कि यह एक तरह से अपमानजनक है. मुझे एक अपवाद के रूप में मानकर, वे पूरे मुस्लिम समुदाय की स्वीकृति के लिए शर्तें थोपते हैं और वे ऐसा बिना हिचक के करते हैं.

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इसलिए, मुझे जरा भी हैरत नहीं हुई जब उदारवादियों सहित भारत में कई लोगों ने हाल ही में जावेद अख्तर के लाहौर में दिए बयानों की सराहना की, जिसमें उन्होंने आतंकवादियों को पाकिस्तान में शरण दिए जाने के खिलाफ पाकिस्तानियों को नसीहतें दी थी. जावेद अख्तर की इस नसीहत ने बहुत सारे मुस्लिमों को उन जैसे मुसलमानों से अलग कर दिया है.  

वो पूछते हैं कि "पाकिस्तान की आलोचना से आपको क्या दिक्कत है?"  उनका ये पूछना मुझे परेशान करता है क्योंकि न्यूज चैनल हैशटैग #AkhtarVsPakPremis चलाते हैं, जिसका अर्थ है कि जब तक भारतीय मुसलमान धार्मिक कट्टर और पुरानी मानसिकता रखते हैं, तब तक वो हमेशा संदिग्ध और राष्ट्र-विरोधी के रूप में देखे जाएंगे.
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मोदी के भारत में अच्छा बनाम खराब मुसलमान

2016 में, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सूफियों की प्रशंसा करते हुए खुद समझा दिया था कि अच्छा मुसलमान कौन है. जिस समाज में लोगों को पीटा जाता है और "जय श्री राम" के नारे लगाने के लिए मजबूर किया जाता है, वहां कुछ विशेषाधिकार प्राप्त मुसलमान सत्ता की लाइन पर चलकर इसका मजाक उड़ाते हैं.

जावेद अख्तर और सूफियों ने संसद और सूफी मंच पर गैरजरूरी 'भारत माता की जय' के नारे के माध्यम से न केवल 'बुरे मुसलमानों' से, बल्कि उन लाखों हिंदुओं से भी दूरी बना ली है, जो सिर्फ इस नारे को ही देशप्रेम और वफादारी का टेस्ट मानने के हिंदू राष्ट्रवादियों के दावे का समर्थन नहीं करते हैं.

6 दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद जो दंगा और रक्तपात हुआ उसके बाद, शाही इमाम ने गणतंत्र दिवस समारोह का बहिष्कार करने के लिए एक फतवा जारी किया. फिर एक टीवी शो में एक सेलिब्रिटी ने आ कर दावा किया कि उसने बहरामपाड़ा में 9000 मुसलमानों से हस्ताक्षर लिए हैं जो साबित करता है कि वो सबके सब इमाम के साथ नहीं हैं. 

मुंबई में बुरी तरह प्रभावित झुग्गी बस्तियों में आखिर कोई क्यों जाना चाहेगा जहां खून के धब्बे अभी भी गलियारों में दिख जाते हैं .. केवल उन विधवाओं और पुरुष जिनके पास कोई आजीविका नहीं है उन्हें झंडा फहराने के लिए कहा जा सकता है और फिर उन्हें ही उदारवादी मुस्लिम कह दिया जाएगा .. ?  वैसे तो इसे किसी भी समय असंवेदनशील माना जाएगा, लेकिन विशेष रूप से तब जब समुदाय को क्रूरता से निशाना बनाया गया हो तब यह अति अंसवेदनशील हो जाता है.

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अभिजात्य वर्ग के लिए या मौलवियों के लिए, वे जिस भी समूह का प्रतिनिधित्व करने का दावा करते हैं, वह सिर्फ एक संभावित निर्वाचन क्षेत्र (वोट) ही है. जाने-अनजाने वे भी उसी विचारधारा के मैसेंजर बन जाते हैं जो समुदाय को नष्ट करना चाहती है. 

उनमें से एक समूह ने मोहन भागवत और आरएसएस के अन्य वरिष्ठ सदस्यों से उस समय मुलाकात की जब इससे जुड़े दूसरे कट्टरपंथी संगठन "मुस्लिमों के खतरे" से निपटने के लिए हथियारों का प्रशिक्षण दे रहे थे; हालांकि इन हिंदुत्व के नेताओं ने उपदेश दिए और लिंचिंग को गलत बताया लेकिन साथ में यह भी कहा कि, "हिंदू भावनाएं गाय के साथ जुड़ी हुई हैं". इस तरह की बातचीत से उन पशु व्यापारियों का क्या होगा जो न केवल बेरोजगार हो जाते हैं बल्कि अपने जीवन यापन के लिए भी जोखिम का सामना करते हैं?

इनमें से कुछ मशहूर हस्तियां अपनी अच्छाई दिखाते हुए ये कहते हैं कि, "मैं गोमांस नहीं खाता. यह हमारे घरों में नहीं बनता है." अब इस तरह की बातें 'हिंदू राष्ट्र' का सपना देखने वाले मध्यवर्गीय ब्राह्मणों के वर्चस्व पर मुहर लगाती हैं. 
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भारत में मुसलमानों के बारे में क्या बातें की जा सकती हैं?

पिछले आम चुनाव से पहले राहुल गांधी ने कुछ मुस्लिम बुद्धिजीवियों को चर्चा के लिए न्योता दिया था. चौंकाने वाली बात ये थी कि उन्होंने राहुल गांधी को सलाह दी आप मुस्लिमों के पक्ष में ज्यादा न बोले वरना दूसरी पार्टी आपको मुस्लिम नेता का दर्जा देकर ध्रुवीकरण करेगी. यह तब हो रहा है जब सभी सियासी दल सॉफ्ट हिंदुत्व का कार्ड खेल रही है.

भारतीय धर्मनिरपेक्षता एक तरह के धार्मिक विश्वास के दायरे में कैद हो गई है. यहां तक कि एक मुस्लिम अभिनेता की सफलता का श्रेय उन लोगों को दिया जाता है जो बहुमत में हैं और उनका दिल बड़ा है इसलिए उन्होंने मुस्लिम अभिनेता की फिल्म देखी. हमें भी धर्मनिरपेक्ष माना जाता है यदि हम भगवद गीता की बातों या मूर्तियों को प्रदर्शित करने जैसी धार्मिक चीजें करें.

एक ऐसा व्यक्ति जो बौद्धिक बहुलवाद की सराहना करता है, उसमें कोई परेशानी नहीं है. लेकिन अभिजात्य वर्ग के लिए, जो काफी पॉश इलाकों में रहते हैं.. दूसरे धर्म के कार्यक्रमों शामिल होते हैं उनके लिए यह सब मायने रखता है. ऐसे विभाजनकारी समय में इस तरह की बातों को मान्यता देना या मंजूरी देना एक तरह से ये अभिजात्यवर्गों का मौकापरस्ती बन जाती है.  

ऐसे लोगों को सत्ता के साथ रहने वाला वर्ग समुदाय का प्रवक्ता बना देता है. ताकि समुदाय को इनके द्वारा लुभाया जा सके. विडंबना यह है कि आज की राजनीति उस दिशा में जा रही है जहां देश का इतिहास दोबारा लिखा जा रहा है वो भी उन सब हकीकतों को नजरअंदाज करके, ताकि खुद का फायदा हो सके.

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उदारवाद की आड़ में कुछ भारतीय मुसलमान हिंदुत्व को बढ़ावा दे रहे हैं  

मुस्लिम समुदाय में सुधार के लिए कहने वाले हिंदुत्ववाद का समर्थन करने वाले लोग हैं या फिर वैसे विशेषाधिकार प्राप्त मुसलमान हैं जो अपनी सुविधा के अनुसार कहीं भी झुक जाते हैं. देश के बाहर इस्लामी ताकतें जो कुछ भी करते हैं, उसके खिलाफ रैली करने के लिए वे बड़ी तादाद में बाहर आते हैं. वो #NotInMyName के साथ खुद को दूर रखते हैं.

वे भारत में मुस्लिम नेतृत्व से इस्लाम के बारे में गलतफहमियां दूर करने का आग्रह करते हैं. लेकिन उनकी नाक के नीचे हो रही हिंदुत्व-प्रायोजित हिंसा के बारे में वो सीधे तौर पर हिंदू नेताओं को चुनौती नहीं देंगे. यह उनके पद्म पुरस्कारों, राज्यसभा सीटों और सेमिनार रूम के फायदों को सुरक्षित रखने के लिए होता है.   

मुस्लिम लिबरल स्कीम 'निष्पक्ष' और 'संतुलित' होने के बारे में है और इसलिए, गंभीर रूप से त्रुटिपूर्ण है. इसमें कुछ लोगों की चिंताओं के साथ खड़े होकर विरोध करने का साहस नहीं है जो बहुतों के लिए मायने रखता है. यहां भी चौंकाने वाली बातें हैं. 

वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के पूर्ण अधिवेशन पोस्टर में मौलाना आजाद की तस्वीर शामिल नहीं किए जाने जैसे मुद्दों पर पहले आपत्ति जताएंगे. इसके बाद उन मशहूर हस्तियों के लिए जिन्हें फ्लैट नहीं मिलता उनके लिए बातें करते हैं – जो कि एक वास्तविक परेशानी है, और कई लोगों को प्रभावित करती है.  लेकिन यह सवाल उन सेलेब्रिटी के लिए बहुत ड्रामेटिक क्षण बन जाते हैं.

लेकिन वे सुनियोजित दंगों के दौरान बेघर हुए लोगों पर चुप रहते हैं, और अगर वे अपनी आवाज उठाते हैं तो यह दोषियों की ओर इशारा किए बिना इसे 'लोकतंत्र के लिए खतरा' बता देते हैं. 
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आगे जिन लोगों को वो समर्थन देते हैं उस लिस्ट में कलाकार हैं और सिर्फ मशहूर लोग हैं. अज्ञात कार्यकर्ताओं और क्षेत्रीय पत्रकारों पर बहुत कम ध्यान दिया जाता है. और कश्मीरियों की तो बात ही छोड़िये. जैसा कि एक विशेषाधिकार प्राप्त व्यक्ति ने भारत के खिलाफ पाकिस्तान की जीत का जश्न मनाने के आरोपी 67 कश्मीरी छात्रों के निलंबन को रद्द करने के बाद कहा था, "उन्हें निष्कासित कर दिया जाना चाहिए और कश्मीर वापस भेज दिया जाना चाहिए."

"कश्मीर हमारा है" का दावा करने वालों के मन में एक ऐसे राज्य के लिए शून्य सहानुभूति है, जिसका दुनिया में सबसे खराब मानवाधिकार रिकॉर्ड है. जहां आतंकवादियों से ज्यादा नागरिक मारे गए हैं.

धार्मिक खुलेपन को आर्थिक और सांस्कृतिक दृष्टि से मापा जाता है. जिस वर्ग की रक्षा की जानी है, वह सबसे अधिक खतरे में है, लेकिन अभिजात वर्ग पर्यवेक्षक के रूप में भी सच से बहुत दूर रहता है.

वे एक मजबूत समझदार मुस्लिम नेतृत्व की मांग करेंगे लेकिन इस तरह के कदम को विफल कर देंगे क्योंकि यह 'समझदार मुसलमान' के तौर पर उनके प्रोफाइल के मुताबिक नहीं होता है. सच कहें तो उनके नाम और अतीत के कारण उन्हें भी ट्रोल किया जाता है और 'जिहादी' करार दिया जाता है. इससे उन्हें और अधिक सहानुभूतिपूर्ण होना चाहिए लेकिन इसके बजाय वो खुद को जमीनी हकीकतों से दूर रखते हैं. वो खुद को एक ऐसे भारतीय मुसलमान के तौर पर दिखाने की कोशिश करते हैं जो सबको मंजूर हो. ‘सबका साथ’ का जो एक भ्रम खड़ा किया गया है उसका मैसेंजर बनने की कोशिश करते हैं.

(फरजाना वर्से मुंबई बेस्ड लेखिका हैं. उनका ट्विटर हैंडल @farzana_versey है. यह एक ओपिनियन पीस है और व्यक्त किए गए विचार लेखक के अपने हैं. क्विंट हिंदी न तो इसका समर्थन करता है और न ही इसके लिए जिम्मेदार है.)

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