JNU से जामिया तक, देश के छात्रों को चुप कराने की रची जा रही साजिश

कई यूनिवर्सिटीज को अपराधियों का अड्डा बताया जा रहा है

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JNU में 5 जनवरी को हुई हिंसा के खिलाफ प्रदर्शन करते छात्र
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हम फिर चले. एक नई बहस में जूझने. सवाल पुराना है- क्या छात्र झगड़ा करने यूनिवर्सिटीज में आते हैं?

जेएनयू हिंसा का एक अलग ही नेरेटिव गढ़ा गया है- ''टैक्स पर पलने वाले लड़के-लड़कियों की लड़ाई देखिए कहां तक पहुंच चुकी है. किसी ने किसी का हाथ तोड़ा, किसी ने सिर फोड़ा. दो दिन से चलने वाली लड़ाई यहां तक जा पहुंची कि लट्ठ बज गए. गुंडागर्दी की हद है...सब एक से बढ़कर एक हैं. सब एक जैसे हैं.''

इसी के इर्द-गिर्द किस्से और वाकये गढ़े गए हैं. मीडिया का भी एक बड़ा धड़ा इसी तर्ज पर काम कर रहा है. इसीलिए कुछ दिनों बाद आप इसे भूल जाएंगे. भूल जाएंगे कि यह लड़ाई दो गुटों की नहीं, दो विचारधाराओं की भी नहीं, सही और गलत की है.

सवाल फिर खड़ा होता है- हिंसा का जिम्मा क्या सिर्फ एक पक्ष का होता है? यह तो दो पक्षों की लड़ाई है, वर्चस्व की लड़ाई.

बिल्कुल, हिंसा में दो पक्ष होते ही हैं, पर कई बार दोनों के बीच कोई बराबरी नहीं होती. इस बार भी ऐसा ही है. एक पक्ष हमलावर का है, दूसरा हमला सहने वाले का है. ऐसे ही दो पक्ष जामिया मिल्लिया में भी थे, जेएनयू में भी हैं.

क्या यूनिवर्सिटीज अपराधियों का अड्डा हैं?

यूनिवर्सिटीज और कॉलेजों में ऐसे विवाद लगातार पैदा किए जा रहे हैं. उन्हें अपराधियों का अड्डा बताया जा रहा है. हैदराबाद यूनिवर्सिटी, पुणे का एफटीआईआई, कोलकाता की जादवपुर यूनिवर्सिटी, वडोदरा की महाराजा सयाजीराव यूनिवर्सिटी, दिल्ली का जेएनयू... और भी बहुत से संस्थान. इन सभी को ऐसे देखा जा रहा है कि मानो यहां राष्ट्रद्रोह की तालीम दी जाती है.

JNU में 5 जनवरी को हुई हिंसा के खिलाफ प्रदर्शन करते छात्र
JNU में 5 जनवरी को हुई हिंसा के खिलाफ प्रदर्शन करते छात्र
(फोटो: PTI) 
आजादी के सत्तर साल बाद भी जो लोग राष्ट्रवादी रक्तकणों की तलाश में हैं, उन्हें इन शिक्षण संस्थानों में देश के विखंडन के बीज उगते दिख रहे हैं. लेकिन क्या सचमुच ऐसा है? सच बात तो यह है कि इन संस्थानों में सिलेबस सिर्फ किताबों में मौजूद नहीं, उससे बाहर भी है.

यह सिलेबस छात्रों को सामाजिक रूप से संवेदनशील बनाता है. केंद्र में बैठे हुक्मरान यह नहीं चाहते.

हुक्मरान चाहते हैं कि यूनिवर्सिटी कैंपस को अराजनीतिक बनाया जाए. छात्र स्किल के बाजार के लिए तैयार किए जाएं. इसीलिए जेएनयू जैसे संस्थान में नए विभाग बनाए जाते हैं, जोकि सोशल साइंसेज के महत्व को कम करते हैं. दाखिले की नीति में बदलाव किए जाते हैं, जिससे हाशिए पर पड़े वर्गों के लिए शिक्षा हासिल करना मुश्किल होता है.

नई नीति के अंतर्गत दाखिले की प्रक्रिया को साक्षात्कार-केंद्रित बना दिया गया है. लिखित परीक्षा में अच्छे मार्क्स, केवल उम्मीदवार को इंटरव्यू में हिस्सा लेने के लिए आगे बढ़ाते हैं और फाइनल सलेक्शन से उनका कोई लेना-देना नहीं होता. हर स्टूडेंट, उसकी सामाजिक पृष्ठभूमि और रहने की जगह कोई भी हो, उसे इंटरव्यू में बुलाए जाने के लिए लिखित परीक्षा में कम से कम 50 फीसदी स्कोर जरूरी है. इसके अलावा जेएनयू में फीस भी बढ़ाई जा रही है. छात्रों के प्रदर्शन पर रोक लगाई गई है. स्टूडेंट यूनियन को मान्यता नहीं दी गई है. यह जेएनयू के इतिहास में पहली बार हुआ है जब किसी चुनी हुई यूनियन के साथ ऐसा बर्ताव हुआ है.

अस्त-व्यस्त हो गई है छात्रों की दिनचर्या

ऐसे कदम हर यूनिवर्सिटी का हिस्सा हैं, पर जेएनयू उबलता है, इसीलिए उसके बारे में आप ज्यादा जानते हैं. जेएनयू के बहाने हमें यह मौका मिलता है कि हम विश्वविद्यालयों की संरचना पर बात करें.

अधिकतर सरकारी संस्थानों में जो संरचनात्मक परिवर्तन हो रहे हैं, वे उनके पूरे चरित्र को ना सिर्फ बदल रहे हैं, बल्कि उन्हें नष्ट कर रहे हैं.

इस बदलाव की प्रक्रिया में छात्र और शिक्षक अपनी-अपनी समस्याओं में उलझ रहे हैं. नए आदेशों का इंतजार कर रहे हैं. कई छोटे मसलों के लिए उन्हें अदालतों का रुख करना पड़ रहा है. जेएनयू की स्टूडेंट यूनियन की मान्यता वाला मामला हाई कोर्ट तक पहुंच गया था. इससे छात्रों की दिनचर्या ही अस्त-व्यस्त हो रही है. उनके लिए असंभव किया जा रहा है कि वे किसी भी बड़े मुद्दे पर अपनी राय रख सकें.

यह दिलचस्प है कि कमजोर तबके के लड़के-लड़कियां स्टूडेंट लोन के बोझ तले राजनीतिक आंदोलनों से कतराते हैं. शिक्षा के निजीकरण की पूरी कोशिश की जा रही है. इसका नतीजा यही होने वाला है कि पढ़ने के लिए छात्रों को लोन लेना होगा.

स्टूडेंट लोन्स ने किस तरह यूथ को राजनीतिक आंदोलनों से दूर किया है, इसका उदाहरण अमेरिका से समझा जा सकता है. वियतनाम युद्ध के दौरान अमेरिका में छात्रों ने सरकार की चूलें हिला दी थीं. मगर अब वहां कॉलेज परिसर आम तौर पर शांत ही रहते हैं. इसका बहुत बड़ा कारण अमेरिका में स्टूडेंट लोन हैं. वहां कॉलेज छात्रों पर कर्ज का औसत बोझ 20 लाख रुपए से ज्यादा है. बैचलर डिग्री लेने वाले तीन में से दो छात्रों पर कर्ज है.

ऐसा उदाहरण न्यूजीलैंड में भी देखा जा सकता है. वहां 2012 में सात लाख से ज्यादा युवा स्टूडेंट लोन ले चुके थे और इसकी कीमत 13 अरब डॉलर के करीब थी. इसका सीधा असर स्टूडेंट एक्टिविज्म पर पड़ा.

युवाओं की प्राथमिकताएं बदलीं. कर्ज के कारण अधिकतर स्टूडेंट्स ने पार्ट टाइम काम करना शुरू किया. फिर अपनी पढ़ाई भी करनी थी. वेलिंगटन की विक्टोरिया यूनिवर्सिटी के रिसर्चर पॉल कोमरी थॉम्सन के पेपर स्ट्रेंथ, यूनिटी एंड सॉलिडैरिटी: कलेक्टिव्स एंड एक्टिविज्म इन न्यूजीलैंड में कहा गया है कि किसी स्टूडेंट को डिबेटिंग क्लब का मेंबर होने पर तो आसानी से नौकरी मिल सकती है लेकिन यूनिवर्सिटी की मार्क्सिस्ट कम्युनिटी का सदस्य होने पर उसे दिक्कतें ही होंगी. ऐसे में लोन के बोझ के तले दबे लोग एक्टिविज्म का खतरा कैसे मोल ले सकते हैं. अपने यहां भी मानो यही कोशिश की जा रही है.

क्योंकि छात्र सवाल करते हैं

जेएनयू के छात्र इस फंदे में फंसना नहीं चाहते. वे हर मसले पर सवाल करते हैं. कॉलेज कैंपस में लोकतंत्र की बात भी करते हैं और उससे इतर यह सवाल भी करते हैं कि नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) जैसे कानून क्यों बनाए जाते हैं. नागरिकता रजिस्टर की क्या जरूरत है? तभी सीएए में मुस्लिम छात्रों के साथ विरोध-प्रदर्शनों में हर धर्म के लोग खड़े हो जाते हैं. लड़कियों की सुरक्षा की दुहाई देने वालों में सिर्फ लड़कियां ही जमा नहीं होतीं. फीस बढ़ोतरी के मुद्दे पर हर वर्ग का युवा आंदोलन करता है. यही समावेशी चरित्र किसी भी संस्थान को उत्कृष्ट बनाता है. पर हुक्मरान इन सवालों के जवाब प्रहार से दे रहे हैं.

जामिया मिल्लिया में केंद्रीय गृह मंत्रालय के अंतर्गत आने वाली दिल्ली पुलिस बर्बरता करती है. अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में उत्तर प्रदेश की बीजेपी सरकार के अंतर्गत आने वाली पुलिस अत्याचार करती है. जेएनयू में अज्ञात हमलावर चुन-चुनकर छात्रों को मारते हैं और यूनिवर्सिटी प्रशासन का सुरक्षा तंत्र दम साधे बैठा रहता है.
सीएए के खिलाफ प्रदर्शन करते एएमयू के छात्र
सीएए के खिलाफ प्रदर्शन करते एएमयू के छात्र
(फोटो: PTI)

आप कब तक विरोध करेंगे... जवाब सीधा है, विरोध तब तक जारी रहेगा जब तक जुल्म जारी है. बंद करने का जिम्मा जालिम पर है. जिस पर हमला हो रहा है, उससे यह कहना कि तुम खामोश रहो तो यह सिलसिला बंद हो जाएगा- उलटबांसी ही है. यूं हम हम ऊब रहे हैं, लगातार एक सी बातें करते हुए. फिर भी लाठियां और पत्थर चलाने वालों से कहना चाहते हैं कि वे अपने हाथ लाठी और पत्थर की जगह किताब और कलम लें. सवाल करें कि उन्हें लाठियां और पत्थर थमाने की जगह हुक्मरान किताब और कलम क्यों नहीं थमाते?

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