महाराष्ट्र सरकार बनाम कंगना रनौत : किसने खोया, किसने पाया?

वरिष्ठ पत्रकार स्मृति कोप्पिकर बता रही हैं कि कैसे और क्यों कंगना रनौत व्यक्तिगत से राजनीतिक मुद्दे में बदल गईं?

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नजरिया
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 एक्ट्रेस कंगना रनौत और शिवसेना के बीच एक तर्कहीन लड़ाई है.
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राजनीतिक दृष्टिकोण को छोड़ दिया जाए, तो यह बॉलीवुड एक्ट्रेस कंगना रनौत और शिवसेना के बीच एक तर्कहीन लड़ाई है. दोनों पक्षों ने एक-दूसरे पर छींटाकशी, अभद्रता, अपमानजनक और धमकी भरी भाषा का उपयोग किया. जो एक सेल्फ मेड फिल्म स्टार और महाराष्ट्र सरकार का नेतृत्व करने वाली पार्टी, दोनों के लिए ही अशोभनीय है. इससे जनता को सिर्फ एक मुद्दा, मनोरंजन और प्राइमटाइम पर व्यर्थ की बहसें देखने को मिलीं. रनौत ने एक चाल चली, शिवसेना ने पलटवार किया. लड़ाई हर दिन बढ़ी.

इस वाद-विवाद से प्रश्न उठता है कि इसका अंत क्या होगा और इससे किसका लाभ होगा?

इससे शिवसेना को, तो कतई लाभ होगा नहीं

कैसे कंगना ने इसे व्यक्तिगत लड़ाई बनाया

राज्य और मुंबई नगर निगम (बीएमसी) में सत्ता में होने के बावजूद पार्टी अवैध निर्माण के आधार पर रनौत के बंगले को गिराने के मामले में बैक फुट पर है. कंगना द्वारा मुंबई की तुलना पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर से करने पर पार्टी के राज्यसभा सांसद संजय राउत जैसे नेता भड़क उठे, कार्यकर्ताओं ने उनके पोस्टरों पर जूते-चप्पल फेंके और मुंबई हवाई अड्डे पर उसके खिलाफ नारे लगाए. इससे पहले कुछ ही महीनों पहले एक बदली हुई और परिपक्व राजनीतिक ताकत के रूप में आने के बाद शिव सेना अपने आक्रामक रूप को छोड़ते हुए दिख रही थी.

14 जून को सुशांत सिंह राजपूत की आत्महत्या के बाद कंगना ने बॉलीवुड में भाई-भतीजावाद का मुद्दा उठाया.

कंगना ने कहा कि कथित 'ड्रग्स और मूवी माफिया रैकेट' द्वारा सुशांत की 'हत्या' की गई थी। उन्होंने मुंबई पुलिस और सुशांत मामले की जांच पर भी सवाल उठाए और कहा कि वह मुंबई में 'असुरक्षित' महसूस करती हैं। रनौत बेवजह एक ऐसी लड़ाई में शामिल हो गयीं, जो उनकी नहीं थी

स्नैपशॉट
  • सुशांत सिंह की आत्महत्या के बाद बॉलीवुड में भाई-भतीजावाद का मुद्दा उठाने वाली कंगना रनौत खुद एक मुद्दा बन गईं.

  • रनौत बेवजह एक ऐसी लड़ाई में शामिल हो गईं, जो उनकी नहीं थी.

  • उन्होंने क्यों इसे अपनी व्यक्तिगत लड़ाई में बदल दिया और व्यक्तिगत बहुत तेजी से राजनीतिक में बदल गया? देखा जाए, तो रनोत ने इससे गंवाने की जगह कुछ पाया ही है.

  • कंगना रनौत लंबे समय से भाजपा और पीएम मोदी की प्रशंसा करती रही हैं. अब ऐसा लगता है कि उन्होंने खुद को भी उनके 'उद्देश्य' के साथ जोड़ लिया है.

  • पिछले दो महीनों में कई तरीकों से सुशांत सिंह राजपूत की दुर्भाग्यपूर्ण मौत का राजनीतिकरण करने की कोशिश की गई है.

  • सुशांत की मौत के बाद कैंपेन चलाकर आदित्य ठाकरे का नाम इसमें जोड़कर उन्हें बदनाम करने की कोशिश की गई.

  • शिवसेना शासित बीएमसी द्वारा कंगना रनौत का बंगला गिराना एक बड़ी चूक है. इससे कंगना भड़क उठीं और उन्हें जमकर बयानबाजी का मौका मिल गया.

  • इससे निश्चित रूप से महाराष्ट्र सरकार और विशेष रूप से सीएम उद्धव ठाकरे कंगना के ऑफ-स्क्रीन विरोधी बन गए हैं.

कंगना ने इसे व्यक्तिगत से राजनीतिक क्यों बनाया?

निसंदेह मुंबई भारत में महिलाओं के लिए सुरक्षित और बेहतर शहरों में से एक है, लेकिन कंगना ने मुंबई में सुरक्षा को लेकर टिप्पणी की. इस पर शिवसेना नेता राउत ने उन्हें अपने घर मनाली से न लौटने के लिए कहा. ऐसा करके उन्होंने कई मुंबईकरों, विशेषकर शिवसैनिकों की भावनाओं का प्रतिनिधित्व किया, जिनका मानना था कि वह उस शहर का अपमान कर रही थीं, जहां वह एक स्टार बन सकीं. इसके बाद यह मुद्दा उनके नियंत्रण से बाहर हो गया। कंगना ने सुरक्षा की मांग की और केंद्र सरकार से उन्हें वाई + सुरक्षा मिली. उन्होंने मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे को बहुत ही अपमानजनक भाषा में चुनौती दी, उनकी तुलना बाबर से की, कश्मीरी पंडितों के दर्द को महसूस करने की बात की और इस मुद्दे में एक नायिका बन गईं.

कंगना ने क्यों इसे अपनी व्यक्तिगत लड़ाई में बदल दिया और व्यक्तिगत बहुत तेजी से राजनीतिक में बदल गया? देखा जाए, तो रनोत ने इससे गंवाने की जगह कुछ पाया ही है.

  • अब कंगना के पास उस स्तर की सुरक्षा है, जो मुख्य न्यायाधीश जैसे कुछ चुनिंदा भारतीयों के पास है.

  • स्टारडम के साथ अब उनकी एक राष्ट्रीय राजनीतिक प्रोफाइल बन गई है.

  • वह एक शक्तिशाली क्षेत्रीय पार्टी के द्वारा प्रताड़ित होने का दावा करती हैं.

  • उन्होंने भारत की सत्ता पर काबिज राष्ट्रीय पार्टी के साथ अपने संघर्ष को शामिल किया है.

रनौत लंबे समय से भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की प्रशंसक हैं. अब ऐसा लगता है कि उन्होंने खुद को इनके उद्देश्य के साथ भी जोड़ लिया है.अपने ट्वीट में उन्होंने बीजेपी विधायक राम कदम को टैग करते हुए कहा कि उन्हें मूवी माफिया से ज्यादा मुंबई पुलिस का डर था. उन्होंने एक अन्य ट्वीट में स्पष्ट किया कि उन्होंने दो बार पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ने से मना कर दिया था. इसके बाद उन्होंने तालिबान का हवाला देते हुए महाराष्ट्र के गृह मंत्री अनिल देशमुख पर नाराजगी जाहिर की.

कैसे सुशांत की मौत शिवसेना और ठाकरे को बदनाम करने के लिए उपयोग हुई?

किसी भी लड़ाई में उद्देश्य और विजेता, इन दो पक्षों की तलाश करना शिक्षाप्रद होता है। पिछले दो महीनों में कई तरीकों से सुशांत सिंह राजपूत की दुर्भाग्यपूर्ण मौत का राजनीतिकरण करने की कोशिश की गई.

मुख्यमंत्री के बेटे और महाराष्ट्र के मंत्री आदित्य ठाकरे के खिलाफ अभियान चलाकर सुशांत की मौत से उनका कनेक्शन जोड़ने की कोशिश की गई और –

  • कहानी बनाई गई कि सुशांत के आत्महत्या नहीं की, उनकी हत्या हुई है

  • सुप्रीम कोर्ट में जांच को घसीटा गया

  • मुंबई पुलिस से मामले को छीनना और देश की सबसे शक्तिशाली राष्ट्रीय एजेंसी - केंद्रीय जांच ब्यूरो को सौंप देना

  • जांच में अन्य केंद्रीय एजेंसियों जैसे प्रवर्तन निदेशालय (ED) और नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (NCB) को शामिल किया गया

  • सुशांत को बिहार का बेटा बताया गया, जिसे मुंबई ने बड़ा बनाया, लेकिन वह यहां अपनी प्रतिष्ठा के लिए लड़ते रहे

  • शिवसेना और ठाकरे को बदनाम करने के लिए हर तरफ से प्रयास किए गए

बीजेपी के लिए परेशानी क्यों बना ठाकरे परिवार

इसमें कोई नई बात नहीं है कि भाजपा को नवंबर 2019 से ही बहुत तकलीफ हो रही है, क्योंकि विधानसभा चुनाव के बाद सबसे बड़ी पार्टी होने के बावजूद उसे सत्ता से दूर रहना पड़ा और शिवसेना, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा) और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने मिलकर मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे के नेतृत्व में महा विकास अगाड़ी (एमवीए) सरकार का गठन किया.

हालांकि यह ऑफ-रिकॉर्ड है, लेकिन सभी जानते हैं कि ऑपरेशन कमल के द्वारा कई मौकों पर सरकार को अस्थिर करने, गोवा, कर्नाटक और मध्य प्रदेश में सफलतापूर्वक सत्ता हासिल करने तथा राजस्थान में इसके प्रयास किए गए हैं.

एनसीपी प्रमुख शरद पवार के राजनीतिक मार्गदर्शन में ठाकरे अब तक शांति के साथ सत्ता में बने रहने में कामयाब रहे थे. बाल ठाकरे के पुत्र होने से लेकर शिव सेना अध्यक्ष और मुख्यमंत्री बनने तक के अपने सफर में ठाकरे ने अपने संयम और शालीनता को बनाए रखा. उन्होंने शिवसेना के ट्रेडमार्क झगड़ालूपन और आक्रामकता को प्रदर्शित किए बिना पार्टी को फिर से अपनी छवि में लाने का प्रयास किया. वह हमेशा सफल नहीं रहे, लेकिन बीजेपी लगभग 25 साल उनकी सहयोगी रही.

उनके पूर्ववर्ती भाजपा के देवेंद्र फड़नवीस ने ठाकरे और उनकी सरकार के लिए ऐसा कोई अवसर नहीं छोड़ा जिससे वे फिर साथ आ सकें. महाराष्ट्र, विशेष रूप से मुंबई और पुणे में COVID-19 मामलों की बढ़ती संख्या और मौतों ने ठाकरे को रक्षात्मक बना दिया है.

बीजेपी के लिए किन्हीं अन्य तरीकों से उन्हें बहकाने का बेहतर समय क्या है?

ऑनलाइन ट्रोल्स के एक विशेष वर्ग ने आदित्य को पेंगुइन बताकर ठाकरे परिवार पर हमले किए और उन पर कई मीम तथा चुटकुले बनाए. फिर उसे सुशांत सिंह राजपूत मामले से जोड़ने की कोशिश की गई. और अब ठाकरे और शिवसेना को क्षेत्रीय गर्व या मुंबई के गौरव पर उकसा कर बाहर करने के प्रयास किए जा रहे हैं. हालांकि हो सकता है यह एक-दूसरे से लिंक न हों, लेकिन यह भी संभव है कि यह वास्तव में एक योजना का हिस्सा हों.

बीएमसी और शिव सेना कैसे कंगना के जाल में फंसते चले गए?

शिवसेना शासित बीएमसी द्वारा कंगना रनौत का बंगला गिराना एक बड़ी चूक है. इससे कंगना भड़क उठी और उन्हें और ज्यादा बयानबाजी का मौका मिल गया. बंगला गिराने के अगले दिन शिवसेना के अखबार ने इसे 'उखाड़ दिया' शीर्षक दिया. इसके बाद कंगना ने इसे 'लोकतंत्र की हत्या' की संज्ञा दी और इसकी तुलना कथित तौर पर बाबर द्वारा राम मंदिर के 'विध्वंस' से की और बीएमसी टीम को 'बाबर की सेना' कहा, जिसके ठाकरे, बाबर हैं.

ऐसे में यह जानना महत्वपूर्ण और जरूरी हो जाता है कि दिवंगत बाल ठाकरे ऐसे पहले नेता थे, जिन्होंने 1992 में हुए बाबरी मस्जिद विध्वंस में गर्वपूर्वक अपना हाथ होने का दावा किया था.

इसके बाद कंगना ने बॉम्बे हाईकोर्ट में अर्जी दाखिल करते हुए कहा कि बीएमसी की कार्रवाई तथ्यों के आधार पर न होकर इरादतन की गई है.

बंगला गिराने का समय और तरीका शिवसेना की ओर से एक उठाया गया एक गलत कदम था और यह आलोचना के योग्य है, लेकिन ऐसा किन परिस्थितियों में किया गया, कंगना द्वारा जानबूझकर क्यों उकसाया गया आदि के बारे में जाने बिना आलोचना करना गलत होगा.

कैसे कंगना रनौत ने एक छुपे हुए राजनीतिक खेल में भूमिका निभाई?

कंगना रनौत ने बड़ी ही चतुराई से इसे 'मणिकर्णिका' और विरोधी सत्ता के बीच की लड़ाई के रूप में प्रचारित किया. मणिकर्णिका को रानी लक्ष्मीबाई के नाम से जाना जाता है. उन्होंने 1857-58 में प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के दौरान ब्रिटिश सेना से लड़ते हुए अपना जीवन कुर्बान कर दिया था. रनौत ने इन्हीं महान शौर्यपूर्ण रानी पर एक फिल्म बनाई थी, जिसमें वह मणिकर्णिका की भूमिका में थीं.

महाराष्ट्र सरकार और विशेष रूप से सीएम उद्धव ठाकरे कंगना के ऑफ-स्क्रीन विरोधी बन गए हैं.

लगातार सात दिनों तक शिव सेना की कार्रवाई और कंगना की शिकायतें समाचार पत्रों की सुर्खियां बने रहे, लेकिन यह वो समाचार नहीं थे, जिनकी भारत को जरूरत थी. इस विवाद ने जनता को गंभीर और जरूरी खबरों से दूर रखा, जो अब एक परंपरा सी बन गई है.

  • प्रति दिन औसतन 94,000 COVID-19 मामले.

  • पिछले 45 वर्षों में भारत-चीन सीमा पर पहली बार गोली चली.

  • अर्थव्यवस्था की गंभीर स्थिति.

  • लॉकडाउन के कारण बड़े पैमाने पर नौकरियों का जाना और भुखमरी.

  • जॉब जाने, लॉकडाउन, आर्थिक परेशानी, गरीबी आदि के कारण सैकड़ों भारतीयों ने आत्महत्या की.

  • माने या न माने, लेकिन यह सच है कि कंगना रनौत ने एक छुपे हुए राजनीतिक खेल में भूमिका निभाई.

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