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LokSabha Election 2024: हैदराबाद में ध्रुवीकरण, क्या ओवैसी पर भारी पड़ेंगी माधवी लता?

Loksabha Election 2024 Hyderabad:माधवी लता हर गली कूचे पर इस विश्वास से हिंदुत्ववाद का झंडा लहरा रही है कि इससे वह असदुद्दीन ओवैसी को मात दे देंगी.

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लोकसभा चुनाव 2024 (Loksabha Election 2024) में ऐसे महिला प्रत्याशियों की कमी नहीं है, जिन्होंने फीके चुनाव प्रचार में तड़का लगा दिया है. अमेठी में स्मृति ईरानी (Smriti Irani) हैं जिन्होंने राहुल गांधी को 'गांधी परिवार'के गढ़ में शिकस्त दी. दूसरी ओर महुआ मोइत्रा (Mahua Moitra) हैं, जो हमेशा की तरह फायरब्रांड की भूमिका में हैं. महबूबा मुफ्ती हैं, जो राजनीतिक प्रासंगिकता के लिए लड़ रही हैं. पश्चिम बंगाल के बशीरहाट से रेखा पात्रा हैं, जो बदमाशों के खिलाफ विद्रोह का प्रतीक मानी जाती हैं. इन सबके बीच सुनेत्रा पवार (Sunetra Pawar) हैं जो अपना पहला चुनाव लड़ेंगी और वो भी अपनी ननद सुप्रिया सुले के खिलाफ. महिला कैंडिडेट का जिक्र हो रहा है तो हम कंगना रनौत (Kangana Ranaut) और उनके गैर-जिम्मेदाराना टिप्पणियों को कैसे भूल सकते हैं?

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हालांकि, साध्वी प्रज्ञा का टिकट इस चुनाव में कट गया. हैदराबाद से बीजेपी के टिकट पर माध्वी लता (Madhavi Lata) इस सूची में शामिल हो गईं. हैदराबाद निर्वाचन क्षेत्र से वह AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी को मात देने की चाहत रखती हैं. लगभग कुछ महीने पहले तक लता का अनजान चेहरा आज कुछ हफ्तों में ही देश भर में अपनी पहचान बना चुका हैं.

बीजेपी के कट्टर समर्थकों को उम्मीद है कि माध्वी लता वह कर दिखाएंगी, जो लगभग असंभव है. वह हैदराबाद की सीट अपने हिस्से करेंगी, जो करीब 40 सालों से AIMIM और ओवैसी का गढ़ रहा है.

तड़के सुबह का वक्त है और ऐतिहासिक चारमीनार अपने हर वक्त के धुल धक्कड़ से मुक्त है. कुछ मजदूर स्मारक तक जाने वाली सड़क से कूड़ा साफ करने में व्यस्त हैं. आमतौर पर आप यहां कई लोगों को चाय की चुस्कियां लेते हुए देखेंगे. इलाके में टहलते हुए मैनें चार मुस्लिम लड़कों को बिना हेलमेट बाइक रेसिंग करते देखा, जैसे ही उन्होंने गाड़ी का ब्रेक लगाया मैंने अपने कदमों को उन तक बढ़ाया और लोकसभा चुनाव के लड़ाई पर उनसे सवाल कर बैठा.

एक ने मुझसे पूछा कि क्या मैं दिल्ली से आया पत्रकार हूं, मैंने हामी भरी तो उसने अपने भारी आवाज में कहा, "आप लोग दिल्ली में बैठ कर माधवी लता का बेमतलब की हवा बना रहे हो. वह जोकर और एक ड्रामा क्वीन है. हम सुनिश्चित करेंगे उनकी जमानत जब्त हो जाए."
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जब मैंने उसे और टटोला और पूछा कि ये 'हम' कौन है तो उसने कहा "ये हमारी कौम की इज्जत का सवाल है." तभी दूसरे लड़के ने हमारे बात के बीच में कहा कि ओवैसी काफी लोकप्रिय हैं, हिंदूओं में भी.

कुत्तों के अचानक भौंकने के वजह से अपने कार के तरफ जाने से पहले मैंने एक आखिरी सवाल किया. मेरा सवाल था: आपको हैदराबाद में कौन सबसे ज्यादा पसंद है? चारों ने एकसाथ और गर्व से कहा: असदुद्दीन ओवैसी.

इसमें कोई संदेह नहीं है कि हैदराबाद में धार्मिक ध्रुवीकरण हुआ है. माधवी लता सभी को यह याद दिलाने का मौका नहीं गंवाती कि हैदराबाद का मूल नाम भाग्यनगर था. उनकी रैलियों और रोड शो में हिंदू प्रतीक और हिंदुत्व रचा-कूबा हुआ है. यहां तक कि राम मंदिर का आह्वान भी किया जा रहा है और साथ ही यह आक्षेप लगाया जाता है कि ओवैसी भावनात्मक रूप से भारत से जुड़े नहीं हैं. इसमें आश्चर्य नहीं कि माधवी लता हर गली के कोने पर हिंदुत्व का आह्वान कर एक बड़े चुनौती के रूप में उभर रही हैं.

पार्टी कार्यकर्ताओं को तो छोड़िए, बीजेपी के शीर्ष नेता और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह भी सार्वजनिक रूप से कह चुके हैं कि 'रजाकार' चार दशकों से हैदराबाद पर राज कर रहे हैं और उन्हें इस चुनाव में बाहर कर दिया जाना चाहिए.

अगर आपको पता न हो तो बता दें रजाकार एक 'निजी' मिलिशिया थे, जो हैदराबाद के तत्कालीन निजाम के प्रति वफादार थे और उन्होंने हैदराबाद का भारत में विलय की संधि पर हस्ताक्षर करने से इनकार कर दिया था.

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जबकि हैदराबाद के उच्च-मध्यम वर्ग के निवासी माधवी लता को एक साइड शो के रूप में खारिज करते हैं, वह हैदराबाद में निम्न-आय वाले हिंदुओं के बीच काफी लोकप्रिय हो गई हैं. इस सीट पर बीजेपी का हमेशा से कोर वोट मजबूत रहा है. जिस तरीके से प्रचार किए जा रहे हैं इसके कारण इस वोट बेस में हजारों हिंदू वोटर्स शामिल होंगे.

क्या असदुद्दीन ओवैसी को चिंतित होना चाहिए? क्या माधवी लता सरप्राइज कर सकती हैं? राजनीति में कुछ भी संभव है. लेकिन उनकी संभावनाएं 2024 में इंडिया ब्लॉक द्वारा नरेंद्र मोदी को हटाने के बराबर है.

1999 में ओवैसी के पिता सुल्तान सलाहुद्दीन ओवैसी ने अपना आखिरी चुनाव लड़ा और 41.36 प्रतिशत वोट शेयर के साथ जीता. 2004 में, असदुद्दीन ओवैसी ने लगभग 38 प्रतिशत वोट शेयर के साथ लोकसभा सांसद के रूप में अपनी शुरुआत की. 2014 तक, वोट शेयर 53 प्रतिशत तक बढ़ गया था. 2019 के लोकसभा चुनाव में यह 64 प्रतिशत था. बीजेपी उम्मीदवार को 28 फीसदी वोट शेयर के साथ आधे से भी कम वोट मिले.

बयानबाजी दिलचस्प है. लेकिन असल जवाब डेटा के हाथ में होता है.

(सुतानु गुरु सी-वोटर फाउंडेशन के कार्यकारी निदेशक हैं. यह एक राय लेख है और ऊपर व्यक्त किए गए विचार लेखक के अपने हैं. क्विंट हिंदी न तो उनका समर्थन करता है और न ही उनके लिए जिम्मेदार है.)

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