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‘पीरियड्स पॉवर्टी’ हटाने के लिए भारत में महिला नेतृत्व का इंतजार?

स्कॉटलैंड के कई शहरों में पहले से सैनिटरी प्रॉडक्ट्स मुफ्त दिए जाते थे अब कानून ने इसे महिला हक बना दिया है.  

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(वीडियो एडिटर: राहुल सांपुई)

ये साल 2020 है और अगर इस समय हमें मशहूर अमेरिकी पत्रकार ग्लोरिया स्टेनेम के 1978 में लिखे एसे की याद आ रही है तो यह ताज्जुब की बात नहीं. एसे का टाइटिल था- इफ मेन कुड मेन्स्ट्रुएट. इस एसे में ग्लोरिया ने लिखा था- ‘अगर पुरुषों के पीरियड्स होते तो सैनिटरी सप्लाइज फेडरली फंडेड और मुफ्त होते.’ यूं एसे की थीम यह थी कि अगर पुरुषों के भी पीरियड्स होते तो समाज में मैन्स्टुअल हेल्थ हॉट टॉपिक बन जाता. यानी चूंकि पुरुष मैन्स्ट्रुएट नहीं करते, तो उनके लिए पीरियड्स फीमेल इश्यू हैं. यह दिलचस्प है कि मैन्स्ट्रुअल प्रोडक्ट्स को फ्री में बांटने वाले पहले देश स्कॉटलैंड की फर्स्ट मिनिस्टर महिला- निकोला स्टर्जन हैं और इसे कानून बनाने का प्रस्ताव रखने वाली संसद सदस्य भी महिला.

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न्यूजीलैंड नहीं, स्कॉटलैंड ने बाजी मारी

तो क्या मैन्स्ट्रुएल हेल्थ को मेनस्ट्रीम में लाने के लिए फीमेल लीडरशिप की ही जरूरत है? लगता तो ऐसे ही है. इससे पहले मुफ्त मैन्स्ट्रुअल प्रॉडक्ट्स की पॉलिसी बनाने की घोषणा करने वाली न्यूजीलैंड की प्रधानमंत्री जेसिंड अर्डर्न थीं. हां, इस मामले में बाजी स्कॉटलैंड ने मार ली है. वहां की संसद ने सर्वसम्मति से पीरियड प्रॉडक्ट्स (फ्री प्रोविजन) (स्कॉटलैंड) एक्ट पास किया है. इसके तहत पब्लिक प्लेसेज़, यूथ क्लब्स वगैरह में सैनिटरी प्रॉडक्ट्स फ्री में मिलेंगे. सरकार इस योजना पर हर साल करीब 8.7 मिलियन पाउंड खर्च करेगी.

स्कॉटलैंड के कई शहरों में सरकार की तरफ से पहले से सैनिटरी प्रॉडक्ट्स मुफ्त दिए जाते थे लेकिन अब इस कानून ने इसे महिला हक बना दिया है. इसे पेश करने वाली महिला सांसद मोनिका लेनॉन पीरियड पावर्टी खत्म करना चाहती हैं. वह चार साल से इस बारे में जन समर्थन जुटा रही थीं और जमीनी स्तर पर काम कर रही थीं.
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पीरियड पावर्टी भारत सहित हर देश की सच्चाई

जिस पीरियड पावर्टी की बात स्कॉटलैंड में की गई है, वह सभी देशों की सच्चाई है. पीरियड पावर्टी मतलब, जब पीरियड्स प्रॉडक्ट्स खरीदना किसी भी महिला के लिए महंगा सौदा बन जाए. इस अभाव से अधिकतर देश जूझ रहे हैं. खासकर, कोविड-19 के हाहाकर के बीच. भारत जैसे देश में यह गरीबी पहले से ही मुंह बाए खड़ी है.

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दोनों में फर्क क्या है? हाइजीनिक तरीके होते हैं, कमर्शियल पैड्स या दूसरे वैकल्पिक प्रॉडक्ट्स और स्थानीय तरीके से बनाए गए सैनिटरी नैपकिन. असुरक्षित तरीके अपनी सुविधानुसार या जेब अनुसार अपनाए जाते हैं. गंदे कपड़े, कागज, प्लास्टिक, रेत, घास, उपले, ईंटें.... इनका इस्तेमाल कैसे होता है- यह सोचना भी मुश्किल है.

दो साल पहले फिरोजाबाद में एक महिला की टिटनस से इसलिए मौत हो गई थी क्योंकि वह पीरियड्स के दौरान फटे ब्लाउज का इस्तेमाल करती थी. ब्लाउज में जंक लगा हुक था जो उसकी मौत का कारण बन गया. अनगिनत औरतें रीप्रोडक्टिव ट्रैक इन्फेक्शन यानी आरटीई का शिकार हो जाती हैं.

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मैन्स्ट्रुएल हाइजीन सिर्फ सैनिटरी पैड्स तक सीमित नहीं

क्या पुरुष पॉलिसी मेकर्स इससे वाकिफ नहीं हैं. बिल्कुल हैं. पिछले साल संसद के मानसून सत्र में जब कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने मैन्स्ट्रुएल केयर के बारे में सवाल पूछा था तो केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री हर्ष वर्धन ने राष्ट्रीय किशोर स्वास्थ्य कार्यक्रम का हवाला दिया था. इसकी मैन्स्ट्रुएल हाइजीन स्कीम के जरिए सस्ती कीमत पर सैनिटरी पैड्स दिए जाते हैं. यूं पिछले कई सालों से अलग-अलग राज्य भी ऐसी कोशिश कर रहे हैं.

बहस मैन्स्ट्रुअल हाइजीन की, सिर्फ मुफ्त पैड्स की नहीं

लेकिन इन स्कीम्स की सबसे बड़ी समस्या यह है कि इससे मैन्स्ट्रुएल हाइजीन की चर्चा सिर्फ मुफ्त सैनिटरी पैड्स तक सीमित होकर रह जाती है. जबकि इसका दायरा बहुत व्यापक है. इसमें मैन्स्ट्रुएशन की साइकोलॉजी, हाइजीनिक तौर तरीके शामिल हैं, साथ ही सामाजिक वर्जनाओं को तोड़ना भी. यह भी ध्यान रखने की जरूरत है कि शौचालयों में सैनिटरी पैड वेंडिंग मशीन लगाने की वकालत करने पर साफ पानी और साफ-सफाई की बहस नेपत्थ में न चली जाए. फिर यह किसी महिला का हक है कि वह उन प्रॉडक्ट्स को खुद चुने जो उसे सबसे अधिक सुरक्षित महसूस हों. जो वह अपनी जरूरतों, व्यक्तिगत रुचि और खर्च करने की क्षमता के हिसाब से तय करे.

भारत में इस समय छोटे और मंझोले दर्जे के इनोवेटर्स मौजूद हैं जोकि मैन्स्ट्रुएल हाइजीन प्रॉडक्ट्स की वैरायटी पेश कर रहे हैं जैसे कपड़े से रीयूजेबल पैड्स और मैन्स्टुएल कप्स. ईकोफेम, सेफ पैड और साफकिन्स ऐसे रीयूजेबल पैड्स के ब्रांड्स हैं. दूसरी तरफ शी कप्स, बूंद, सोच वगैरह मैन्स्टुएल कप्स सस्ते और ईको फ्रेंडली हैं. मेडिकल ग्रेड सिलिकॉन से बनते हैं और चार से पांच साल तक चलते हैं.

गुजरात में 2017 में किए गए एक रिसर्च पेपर में कहा गया है कि शादीशुदा औरतें ने मैन्स्ट्रुएल कप्स के इस्तेमाल को लेकर काफी उत्साह दिखाया था. हां, वेजाइनल इंसर्शन को लेकर हमारे समाज में जो वर्जनाएं हैं, उन्हें तोड़ना पहले बहुत जरूरी है.
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यूं देश की सच्चाई यह है कि अभी लोगों के पेट भी भरे हुए नहीं हैं. फेमिनिज्म इन इंडिया में पीरियड लीव और दलित-आदिवासी महिलाओं पर एक लेख में एलएसआर की एक हिस्ट्री स्टूडेंट ने लिखा था कि उसकी एक दलित दोस्त ने उसे एक चौंकाने वाली सच्चाई बताई थी. दोस्त ने कहा था कि अगर उसके परिवार की औरतों को मुफ्त सैनिटरी पैड मिल जाएगा तो वह उसे बेचकर राशन खरीद लेंगी. इसी से पता चलता है कि भारत में सैनिटरी पैड्स ही नहीं, अपने स्वास्थ्य को लेकर औरतों को जागरूक करना भी उतना ही जरूरी है.

महिला स्वास्थ्य के लिए महिला नेतृत्व का ही इंतजार?

जैसा कि शुरुआत में कहा गया है, क्या मैन्स्ट्रुअल हेल्थ और हाइजीन पर चर्चा के लिए हमें फीमेल लीडरशिप का इंतजार करना होगा? फिलहाल हम दूसरे किस्म के झगड़ों में फंसे हुए हैं. समाज लड़कियों को जज़्बाती फिसलन से बचाने का धार्मिक कर्तव्य निभाने की तैयारी में है. यह तथाकथित मर्दपना है, जिसमें स्त्री की एजेंसी कोई मायने नहीं रखती. इस बीच स्कॉटलैंड का फीमेल लीडरशिप कुछ ठोस करने की कोशिश कर रहा है. सिस्टरहुड इसे ही कहा जाता है.

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