डियर PM मोदी: इकनॉमी को ठीक करना है तो इस पहेली को सुलझाइए

आज, भारत के उद्यमियों को “परायेपन” का एहसास हो रहा है

Updated17 Nov 2019, 03:27 PM IST
नजरिया
6 min read

भारतीय अर्थव्यवस्था की मौजूदा हालत को चार अक्षरों के एक ही शब्द से बयान किया जा सकता है. अरे..रे....वो नहीं, जो आप सोच रहे हैं.... अब तो स्टेट बैंक ऑफ इंडिया जैसा सरकारी बैंक भी कह रहा है कि जुलाई से सितंबर की तिमाही में देश की जीडीपी विकास दर गिरकर four यानी चार फीसदी पर आ सकती है, मैं उसी की बात कर रहा हूं!

और जैसा कि गहरे संकट के दौरान अक्सर होता है, हर कोई इस समस्या का समाधान बताने में लगा है. ये ठीक करो, इसे बढ़ा दो, उसे घटा दो... हालत ये है कि प्रधानमंत्री मोदी लाखों "चमत्कारी उपायों" के बोझ में दबे जा रहे हैं. लेकिन दुख की बात ये है कि अच्छे उपायों की भरमार भी एक बुरी बात बन जाती है, क्योंकि बहुत सारे उपायों को आधे-अधूरे ढंग से आजमाया जाता है, लेकिन परेशानी फिर भी दूर नहीं होती.

इसलिए आइए एक छोटी सी पहेली बूझते हैं. मैं आपको दस ऑप्शन दूंगा. भारत की इकनॉमी को उसकी मौजूदा दुर्दशा से निकालने के लिए इन सभी विकल्पों पर अमल करना बेहद जरूरी है. अंत में, मैं आपसे एक अंतिम सवाल करूंगा. आइए देखते हैं कि क्या आप इन उपायों को वाकई गहराई से समझ पाते हैं. तो चलिए शुरू करते हैं.

एक : क्रेडिट फ्लो यानी कर्ज की उपलब्धता फिर से बहाल करें, जिसमें अभी भयानक गिरावट आ चुकी है. उद्योगों के लिए इसकी वृद्धि दर गिरकर महज 2.7 फीसदी रह गई है, जो 12 महीनों में सबसे कम है. और सर्विस सेक्टर की क्रेडिट ग्रोथ अप्रैल 2018 से फरवरी 2019 के दौरान 20 फीसदी से ऊपर रहने के बाद अब घटकर 7.3 फीसदी रह गई है, जो 24 महीने में सबसे कम है. NBFC यानी गैर बैंकिंग वित्तीय कंपनियों की तरफ से दिए गए कर्ज की रकम में तो 36 फीसदी की भयानक गिरावट आई है.

दो : नॉमिनल FDI (यानी सीधे विदेशी निवेश की कुल रकम) 2009 से 2019 के दौरान 42 अरब डॉलर से बढ़कर 62 अरब डॉलर होने का जश्न मनाना बंद कीजिए. ऐसा इसलिए क्योंकि जीडीपी में हिस्सेदारी के तौर पर देखें तो इस दौरान FDI 3.4 फीसदी से घटकर 2.3 फीसदी रह गई है. ये जानने की कोशिश कीजिए कि ये रकम इस साल बढ़कर 100 अरब डॉलर के पार क्यों नहीं पहुंची और फिर कोई शोर-शराबा किए बिना उन तमाम अड़चनों और आक्रामक नीतियों को दूर कीजिए, जिनके कारण विदेशी निवेशक दूर जा रहे हैं.

तीन : वोडाफोन और एयरटेल को दिवालिया होने से बचाने के लिए हर मुमकिन उपाय पर अमल कीजिए. इनमें से अगर एक ने भी दिवालिएपन की अर्जी दाखिल कर दी, तो ये बिजनेस गवर्नेंस में भारत के "कुख्यात" नियमों के नाकारापन की एक बदनुमा मिसाल बन जाएगी.

चार : ये समझने की कोशिश कीजिए कि हमारे एक्सपोर्ट्स तबाह क्यों हो गए हैं. जी हां, तबाह ! साल 2000 से 2009 के दशक के दरमियान ग्लोबल एक्सपोर्ट में हम सम्मानजनक रूप से दसवें नंबर पर थे. हमारे एक्सपोर्ट 20 फीसदी की सालाना रफ्तार से बढ़ रहे थे, जो बाकी दुनिया के मुकाबले लगभग दोगुनी ग्रोथ रेट थी. लेकिन पिछले तकरीबन पांच सालों में हम गिरकर 33वें नंबर पर आ गए हैं और सालाना एक्सपोर्ट 325 अरब डॉलर के आसपास अटके हुए हैं.

पांच : वर्ल्ड बैंक के ईज ऑफ डुइंग बिजनेस इंडेक्स (EODB) में हमारी "शानदार" तरक्की की वजह से कोई खुशफहमी न पालें. ये बिलकुल सही है कि मोदी सरकार के कार्यकाल में भारत इस इंडेक्स में 79 पायदान ऊपर आ गया है (2014 में 142 से 2019 में 63 तक), जिसके लिए सरकार की पीठ थपथपानी चाहिए. लेकिन साथ ही हमें ये भी समझना चाहिए कि रैंकिंग सुधरने में सबसे ज्यादा योगदान बिल्डिंग परमिट में आसानी, ट्रेडिंग प्लेटफॉर्म्स और दिवालिएपन के निपटारे को सरल बनाए जाने का है. "माइनॉरिटी इनवेस्टर्स के प्रोटेक्शन" और "कॉन्ट्रैक्ट्स को लागू करने" जैसे ज्यादा अहम मामलों में हम या तो और नीचे लुढ़क गए हैं या फिर जहां के तहां अटके हुए हैं. इसीलिए हमारी ये "जीत" भी कुछ हद तक खोखली है.

छह : ये न भूलें कि हम प्रतिस्पर्धा में बने रहने की क्षमता का आंकलन करने वाले ग्लोबल कंपटीटिवनेस इंडेक्स में 10 पायदान नीचे लुढ़क चुके हैं. ऐसा क्यों हुआ ? क्योंकि हम ICT यानी इंफॉर्मेशन, कम्यूनिकेशन और टेक्नॉलजी को अपनाने में पिछड़ गए हैं, डिजिटल पर जोर देने के तमाम शोर-शराबे के बावजूद! हमारे वर्कर खराब सेहत और कमजोर कार्यकुशलता के शिकार हैं. और हमारी महिलाएं अब भी आमतौर पर वर्कफोर्स का हिस्सा नहीं बन पाई हैं.

सात : इस बात को स्वीकार कीजिए कि हम बेकार के बहाने बनाकर RCEP (Regional Comprehensive Economic Partnership) से भाग आए हैं. जी हां, "किसान समर्थक और लघु-उद्योग के पक्षधर" जैसे जुमले देश के भीतर लोगों को लुभाने के लिए अच्छे हैं, लेकिन कड़वी सच्चाई यही है कि हमारा मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर तमाम जकड़नों में कैद और प्रतिस्पर्धा से भागने वाला है और यही वजह है कि वो उस तेजी से आगे बढ़ते ट्रेड ब्लॉक में शामिल होने से डरता है, जिसकी 3 अरब आबादी दुनिया की बीस फीसदी जीडीपी का उत्पादन करती है. लेकिन प्रतिस्पर्धा से यूं ही कतराते रहे, तो हम न तो बड़े पैमाने पर विदेशी पूंजी को आकर्षित कर पाएंगे और न ही जीडीपी को 5 ट्रिलियन डॉलर के मुकाम तक पहुंचा सकेंगे. हमें अपनी जकड़नों में कैद अर्थव्यवस्था में बदलाव करने और RCEP में शामिल होने का हौसला जुटाना ही होगा और ये काम हम जितनी जल्दी करें, उतना अच्छा. जैसा कि मैं पहले ही कह चुका हूं, इससे बाहर रहना बिल्कुल बेकार की बहानेबाजी है.

आठ : संरक्षणवाद की उस तेजी से बढ़ती लहर को रोकें, जो "आर्थिक राष्ट्रवाद" की पीठ पर सवार है. ये बेहद चिंता की बात है कि डोनाल्ड ट्रंप के सनक भरे, अर्ध-शिक्षित टैरिफ-वार के बाद पिछले तीन साल में कारोबार के रास्ते में सबसे ज्यादा अड़चनें भारत ने ही खड़ी की हैं. ऐसी नीति अर्थव्यवस्था के लिए जहर है. अगर हम फिसलकर फिर से 1970-80 के दशक वाले उसी पुराने दौर में पहुंच गए, जहां आत्मनिर्भरता के नाम पर ऊंची लागतों और अक्षमता का बोलबाला था, तो पिछले तीन दशकों के दौरान प्रतिस्पर्धा से हासिल हुए सभी फायदों को बेवजह गवां बैठेंगे.

नौ : मूडीज इनवेस्टर सर्विसेज अगर "आर्थिक सुधार के इरादे की कमी और दीर्घकालीन मंदी" का जिक्र करते हुए भारत के सॉवरेन ऑउटलुक को घटाकर निगेटिव कर दे, तो हकीकत बयान करने के जुर्म में उसे फांसी पर न लटकाएं. बुरी खबर देने वाले को "गलत इरादे" की तोहमत लगाकर बदनाम करने की जगह हमें सच को स्वीकार करना चाहिए.

दस : और अंत में, मौजूदा वक्त की उस दोहरी तस्वीर से सबक सीखें, जो इससे पहले कभी देखने को नहीं मिली (कम से कम मैंने तो कभी नहीं सोचा था कि अपनी जिंदगी में मुझे ऐसा देखने को मिलेगा) - बिजनेस कॉन्फिडेंस 6 साल के सबसे निचले स्तर पर है (अभी ये 103 पर है, जबकि यूपीए के कार्यकाल के बेहद खराब साल 2013 में ये 100 पर था), जबकि शेयर बाजार अब तक के सबसे ऊंचे स्तर पर जा पहुंचा है. जैसा कि मैं पहले ही कह चुका हूं, पिछले तीन दशकों में ऐसी हालत मैंने पहली बार देखी है.

दरअसल, मैं इस बात को लेकर अक्सर मजाक करता रहा हूं कि भारत के बिजनेस लीडर शेयर बाजार की ताल से ताल मिलाते हैं, जिसे देखकर लगता है मानो उन्होंने अपनी समझदारी सेंसेक्स के हवाले कर दी हो (ओह..सॉरी!). अगर सेंसेक्स जोश में उछल-कूद कर रहा हो, तो भारत का कारोबारी समुदाय भी उसके साथ ही साथ चरम सुख का अनुभव करने लगता है. अब तक तो ऐसा ही होता रहा है. लेकिन अब वो आपसी रिश्ता टूट गया है. सेंसेक्स खुशी से आसमान चूम रहा है, लेकिन कारोबारी ठुकराए हुए प्रेमी की तरह निराशा की गहराइयों में गोते लगा रहे हैं. इसकी वजह क्या है ?

और अब मेरा अंतिम सवाल. कल्पना कीजिए कि प्रधानमंत्री मोदी आपको बुलाकर पूछते हैं: आपने अर्थव्यवस्था को ठीक करने के ऊपर दिए दसों विकल्प पढ़ लिए हैं. मुझे भी इन सभी उपायों के साथ-साथ एक दर्जन और विकल्प मिले हैं. लेकिन मुझे अपनी पूरी ताकत सिर्फ एक पर ही लगानी है, महज एक ही विकल्प पर. एक ऐसा उपाय, जो सबसे ताकतवर उत्प्रेरक हो. जो एक साथ कई बीमारियों को ठीक कर दे. इसलिए बताइए, मुझे कौन सा विकल्प चुनना चाहिए?

प्रिय पाठक, पीएम मोदी की तरफ से कार्रवाई के लिए आप कौन सा एक उपाय चुनेंगे ? गहरी सांस लीजिए और आगे बढ़िए (आपकी मर्जी).

जहां तक मेरी बात है, मैं तो बिना किसी हिचक के दसवें विकल्प का चुनाव करूंगा.

आज, भारत के उद्यमियों को “परायेपन” का एहसास हो रहा है. उनकी गलतियों को अपराध माना जाता है, उनकी नाकामियों को बढ़ाचढ़ाकर पेश किया जाता है और उनके संसाधनों पर बंदिशें लगाई जाती हैं.

लेकिन अगर उन्हें "समृद्धि पैदा करने वाला" मानकर उनका सम्मान किया जाए, जैसा कि खुद प्रधानमंत्री मोदी ने 15 अगस्त 2019 को लालकिले की प्राचीर से एलान किया था, तो उनका आत्म-सम्मान फिर से जाग उठेगा.

और तब आप देखेंगे कि भारत में छाए आर्थिक हताशा के बादल किस तरह छू मंतर हो जाएंगे.

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Published: 17 Nov 2019, 03:20 PM IST

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