ADVERTISEMENTREMOVE AD

राजस्थान में BJP के हाथों सत्ता गंवाने के 6 महीने के अंदर कांग्रेस ने कैसे वापसी की?

Rajasthan Lok Sabha Election Result: भगवा खेमे के भीतर अंदरूनी कलह के कारण बीजेपी में उम्मीदवारों का चयन खराब रहा.

Published
story-hero-img
i
छोटा
मध्यम
बड़ा

राजस्थान में सत्ता में वापसी के बमुश्किल छह महीने बाद ही सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) को 11 सीटों पर करारी हार का सामना करना पड़ा. यह कांग्रेस के लिए एक बड़ी वापसी है, जो पिछले दो लोकसभा चुनावों में इस रेगिस्तानी राज्य में एक भी सीट जीतने में विफल रही थी. राजनीतिक हलकों में अब इस बात को लेकर चर्चा हो रही है कि भगवा ब्रिगेड के इस करारी हार का क्या कारण है और क्या यह महत्वपूर्ण झटका राजस्थान बीजेपी में कोई बड़ा उलटफेर कर सकता है. कई लोग यह भी सोच रहे हैं कि इन नतीजों का मुख्यमंत्री (सीएम) भजन लाल शर्मा के भविष्य पर क्या असर होगा?

ADVERTISEMENTREMOVE AD

इस द्विध्रुवीय राज्य में कांग्रेस के पुनरुत्थान के कारणों को देखें तो राजस्थान बीजेपी में मतभेदों को सबसे ऊपर रखा जाना चाहिए. वर्षों से, राज्य बीजेपी आरएसएस लॉबी और पूर्व सीएम वसुंधरा राजे के वफादारों के बीच विभाजित रही है. हालांकि इसने पिछले विधानसभा चुनावों में जीत हासिल की, लेकिन बीजेपी ने आंतरिक मतभेदों को दूर करने के लिए कोई गंभीर प्रयास नहीं किया.

अंदरूनी कलह इतनी गंभीर थी कि दो महीने पहले केंद्रीय कैबिनेट मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने भी खुलेआम कहा था कि उनके क्षेत्र के बीजेपी विधायक उनके प्रचार में कोई मदद नहीं कर रहे हैं. जाहिर है, भगवा खेमे के भीतर अंदरूनी कलह के कारण उम्मीदवारों का चयन खराब रहा.

उदाहरण के लिए, चूरू में बीजेपी ने मौजूदा सांसद राहुल कस्वां को बाहर का रास्ता दिखा दिया, जो अपने पिता राम सिंह कस्वां के साथ पिछले पांच लोकसभा चुनावों से सीट जीत रहे थे. माना जा रहा है कि कस्वां को विपक्ष के पूर्व नेता राजेंद्र राठौड़, जो इस क्षेत्र के राजपूत नेता हैं, उनके साथ दुश्मनी के कारण बाहर किया गया. कस्वां जो एक प्रमुख जाट नेता हैं, वे जल्द ही कांग्रेस में चले गए - और अब उन्होंने सीट पर शानदार जीत दर्ज की है.

वसुंधरा राजे को स्पष्ट रूप से दरकिनार किया जाना

इसके विपरीत, बीजेपी ने बाड़मेर के सांसद कैलाश चौधरी को टिकट दी, जो मोदी मंत्रिमंडल में कृषि मंत्री हैं, जबकि अंदरूनी रिपोर्ट्स में कहा गया था कि पिछले पांच सालों में वे जमीनी स्तर पर पकड़ खो रहे हैं. निर्दलीय रवींद्र भाटी के उदय ने इस सीट पर बीजेपी को नुकसान पहुंचाया है, लेकिन स्थानीय पार्टी नेताओं को विश्वास में लेने में चौधरी की विफलता ने अब भारी नुकसान पहुंचाया है, जिससे मौजूदा केंद्रीय मंत्री तीसरे स्थान पर रहे हैं और कांग्रेस एक लाख से अधिक वोटों से जीत गई है!

इस गहरी दरार से जुड़ा हुआ है, वसुंधरा राजे को स्पष्ट रूप से दरकिनार किया जाना. इसका संकेत बीजेपी के शीर्ष नेताओं ने पिछले दिसंबर में विधानसभा चुनाव जीतने के बाद पहली बार विधायक बने भजन लाल शर्मा को मुख्यमंत्री नियुक्त करके दिया था. तब से, राजे को पूरी तरह से हाशिए पर धकेल दिया गया है. लोकसभा के लिए टिकट वितरण में उनकी कोई भूमिका नहीं थी, उन्हें कोई विशेष चुनाव संबंधी जिम्मेदारी नहीं दी गई थी, और चौंकाने वाली बात यह है कि उन्हें पीएम मोदी द्वारा सार्वजनिक रैलियों का हिस्सा बनने के लिए भी आमंत्रित नहीं किया गया था.

इसके बाद नाराज राजे ने खुद को सिर्फ झालावाड़ में अपने बेटे के प्रचार तक सीमित कर लिया, जहां दुष्यंत सिंह ने अब तीन लाख से अधिक वोटों के अंतर से जीत हासिल कर ली! अन्य सीटों पर प्रचार से उनकी अनुपस्थिति को बीजेपी की हार का एक प्रमुख कारण माना जा रहा है.

बीजेपी नेताओं के बीच घमासान हो सकता है इसका कारण नहीं रहा हो, लेकिन पार्टी कार्यकर्ताओं का मनोबल और भी गिरा है, क्योंकि कांग्रेस से आए दलबदलुओं को लोकसभा का टिकट मिल गया है, जबकि लंबे समय से टिकट चाहने वालों को हाईकमान ने नजरअंदाज कर दिया है. इसका सबसे बड़ा उदाहरण पूर्व कांग्रेस सांसद ज्योति मिर्धा का है, जिन्हें दिसंबर में विधानसभा चुनाव हारने के बावजूद नागौर से टिकट दिया गया. इसी तरह, पिछली अशोक गहलोत सरकार में कैबिनेट मंत्री रहे महेंद्रजीत मालवीय को कांग्रेस छोड़ने के कुछ ही दिनों के भीतर बांसवाड़ा से बीजेपी का उम्मीदवार बना दिया गया. अपनी तमाम चालों के बावजूद मालवीय इस आदिवासी सीट से करीब 2.5 लाख वोटों से हार गए.

ADVERTISEMENTREMOVE AD

इसके विपरीत, कांग्रेस पिछले विधानसभा चुनावों की तुलना में बहुत कम विभाजित दिखी. पूर्व सीएम अशोक गहलोत और पूर्व डिप्टी सीएम सचिन पायलट के बीच दरार अभी भी बनी हुई है, लेकिन दोनों दिग्गजों ने अपने मतभेदों को उजागर नहीं करने की कोशिश की. कांग्रेस द्वारा अब मजबूत वापसी के बावजूद, यह एक गंभीर वास्तविकता है कि गहलोत के बेटे वैभव जालोर सीट से दो लाख से अधिक वोटों से हार गए, जिन्हें लगातार दूसरी बार लोकसभा में हार का सामना करना पड़ा.

जाट फैक्टर

कांग्रेस को जिस बात से बहुत मदद मिली, वह थी रणनीतिक गठबंधन बनाना और अपने सहयोगियों का मजबूती से समर्थन करना. कांग्रेस ने जिन तीन सीटों को अन्य दलों को दिया, उन तीनों पर सहयोगी दल विजयी हुए. अगर आरएलपी के हनुमान बेनीवाल नागौर सीट से जीती, तो भारतीय आदिवासी पार्टी ने दक्षिण राजस्थान के आदिवासी क्षेत्र बांसवाड़ा सीट जीती, भले ही मूल कांग्रेस उम्मीदवार ने चुनाव से अपना नाम वापस नहीं लिया. लेकिन सबसे प्रभावशाली जीत सीपीएम उम्मीदवार अमरा राम चौधरी की रही, जिन्होंने भगवाधारी, मौजूदा बीजेपी सांसद सुमेधानद सरस्वती को 72000 से अधिक मतों से हराया.

सहयोगियों को साथ लाने के अलावा कांग्रेस ने जातिगत गणित भी सही साधा है. दूसरी ओर, लोकसभा चुनाव में जातिगत समीकरणों को साधने में बीजेपी की विफलता के कारण जाट-बहुल शेखावाटी में उसे भारी नुकसान उठाना पड़ा है. किसान आंदोलन और सेना में भर्ती के लिए अग्निवीर योजना को लेकर युवाओं के गुस्से के असर को भुनाने के अलावा, शेखावाटी क्षेत्र की चारों सीटों- चूरू, झुंझुनू, सीकर और नागौर- में कांग्रेस की जीत में ‘जाट-फैक्टर’ की अहम भूमिका बताई जाती है.

ADVERTISEMENTREMOVE AD
दरअसल, जनवरी से जाटों का गुस्सा और केंद्रीय ओबीसी सूची में शामिल किए जाने के लिए दबाव बनाने के लिए विरोध प्रदर्शन को पूर्वी राजस्थान की धौलपुर और भरतपुर सीटों पर बीजेपी की हार का मुख्य कारण माना जा रहा है. इसी तरह, 2018 में सचिन पायलट को सीएम पद से वंचित किए जाने पर गुज्जरों का गुस्सा कम होता दिख रहा है और कांग्रेस को दौसा और सवाई माधोपुर की महत्वपूर्ण सीटों पर कब्जा करने में मदद मिली है, जहां पार्टी ने पायलट के वफादारों को मैदान में उतारा था. कुल मिलाकर, इन हॉट सीटों के नतीजों ने सत्तारूढ़ बीजेपी के लिए खतरे की घंटी बजा दी है, जो पूर्वी राजस्थान और शेखावाटी बेल्ट में अपना आधार काफी हद तक खोती दिख रही है.

अंत में, बीजेपी की राष्ट्रीय हार के कारणों (मोदी लहर में कमी, राम मंदिर या राष्ट्रवादी विषयों के लिए कम आकर्षण) से परे, राजस्थान में तेज गिरावट को राज्य सरकार के फीके प्रदर्शन से जोड़ा जा रहा है. दिसंबर में जब से भजन लाल शर्मा ने सत्ता संभाली है, तब से यह धारणा बन गई है कि उनकी सरकार बस अपनी विधानसभा चुनाव की सफलता पर बैठी है और बहुत कम काम कर रही है. मध्य प्रदेश और हरियाणा सरकारों के साथ समझौतों के माध्यम से राज्य के जल संकट को हल करने के लिए कदम उठाने का बड़ा दावा भी समझौतों का पूरा विवरण साझा करने से इनकार करने से कुंद हो गया - और एक चर्चा शुरू हो गई कि बीजेपी कुछ छिपाने की कोशिश कर रही है.

ADVERTISEMENTREMOVE AD

आश्चर्य की बात नहीं है कि अब अटकलें लगाई जा रही हैं कि राजस्थान में बीजेपी की हार राजस्थान बीजेपी के भीतर तूफान ला सकती है, खासकर सीएम भजन लाल शर्मा के लिए. हालांकि उन्होंने बड़े पैमाने पर प्रचार किया और कई रोड शो और रैलियां कीं, लेकिन पहली बार विधायक बने सीएम मतदाताओं पर कोई खास प्रभाव नहीं डाल पाए. बीजेपी के अपने गृह जिले भरतपुर में भी हारने के बाद, बीजेपी के आलोचक बेचैन हो रहे हैं. नतीजे राजे के वफादारों के लिए भी संजीवनी हैं, जो दावा करते हैं कि राजस्थान में मजबूत बीजेपी के लिए वसुंधरा की जरूरत है.

कुल मिलाकर, राजस्थान में भगवा ब्रिगेड पर निराशा और रहस्य का माहौल छाया हुआ है. कांग्रेस जहां लोकसभा के नतीजों का जश्न मना रही है, वहीं बीजेपी अपनी तीव्र गिरावट के लिए स्पष्टीकरण देने में उलझी हुई है. सत्तारूढ़ बीजेपी के भीतर कटु गुटों के बीच टकराव के कारण, अनिश्चितता का दौर रेगिस्तानी राज्य में भीषण गर्मी को और भी बदतर बनाता दिख रहा है.

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और राजस्थान की राजनीति के विशेषज्ञ हैं. एनडीटीवी में रेजिडेंट एडिटर के रूप में काम करने के अलावा, वे जयपुर में राजस्थान विश्वविद्यालय में पत्रकारिता के प्रोफेसर रहे हैं. वे @rajanmahan पर ट्वीट करते हैं. यह एक ओपिनियन पीस है और इसमें व्यक्त विचार लेखक के अपने हैं. क्विंट हिंदी न तो उनका समर्थन करता है और न ही उनके लिए जिम्मेदार है.)

(क्विंट हिन्दी, हर मुद्दे पर बनता आपकी आवाज, करता है सवाल. आज ही मेंबर बनें और हमारी पत्रकारिता को आकार देने में सक्रिय भूमिका निभाएं.)

सत्ता से सच बोलने के लिए आप जैसे सहयोगियों की जरूरत होती है
मेंबर बनें
अधिक पढ़ें
×
×