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NCP का ट्रीटमेंट और शिंदे सरकार का विकल्प,पवार ने अध्यक्ष पद छोड़ साधे कई निशाने

NCP अध्यक्ष के लिए अजित और सुप्रिया के बजाय एक तीसरे नाम की संभावना ज्यादा क्यों?

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राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) के अध्यक्ष शरद पवार (Sharad Pawar) ने पार्टी अध्यक्ष पद  छोड़ने की घोषणा कर राजनीतिक तूफान खड़ा कर दिया है. देश और प्रदेश की राजनीति में पवार एक कद्दावर नेता हैं और उनके इस निर्णय से प्रादेशिक और राष्ट्रीय नीति पर दूरगामी परिणाम हो सकते हैं. 1 मई को ही महाराष्ट्र का स्थापना दिन मनाया गया था और उसके दूसरे ही दिन पवार ने यह राजनीतिक धमाका कर दिया है. 

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राजनीति से संन्यास नहीं ले रहे हैं पवार

पवार ने पद छोड़ने की घोषणा करने के समय यह स्पष्ट कर दिया कि वे सिर्फ अध्यक्ष पद छोड़ रहे हैं,राजनीति से संन्यास नहीं दे रहे हैं. पार्टी व कार्यकर्ताओं के लिए वे हमेशा उपलब्ध रहेंगे और राज्य तथा देश में अपनी यात्रा जारी रखेंगे. राज्यसभा में अभी उनका 3 साल का कार्यकाल बचा है. राजनीति में उनकी सक्रियता और महत्व कम नहीं हुआ है. भारतीय जनता पार्टी और आपसी मतभेदों के बीच विपक्ष में एकता बनाने के लिए उनकी उपयोगिता नजरअंदाज नहीं की जा सकती है. बढ़ती उम्र के बावजूद उनकी राजनीतिक सक्रियता और सबको चौंकाने वाली हैं. 

पवार ने दिखाई 'पावर', पार्टी को शॉक ट्रीटमेंट 

बावजूद पवार का पार्टी अध्यक्ष पद छोड़ने की घोषणा ने पार्टी नेताओं और कार्यकर्ताओं को अचंभे में डाल दिया है. ऐसा माना जा रहा है कि पार्टी में आपसी मतभेदों को दूर करने तथा नेताओं तथा कार्यकर्ताओं को शॉक ट्रीटमेंट देने के लिए पवार ने यह धमाकेदार कदम उठाया है. यह समझा जाता है कि एनसीपी में अंदरुनी तौर पर दो गुट हैं- पहला शरद पवार की बेटी सुप्रिया सुले (Supriya Sule) के साथ है और दूसरा पवार के भतीजे अजित पवार Ajit Pawar) के साथ है. 

सुप्रिया गुट कभी खुलकर सामने नहीं आया है जबकि अजित पवार और उनके समर्थक अपनी शक्ति का प्रदर्शन कर चुके हैं हांलाकि उन्हें मुंह की खानी पड़ी थी. 2019 में देवेंद्र फडणवीस (Devendra Phadnavis) के नेतृत्व में बनी ढाई दिन की सरकार में अजित पवार उपमुख्यमंत्री थे.

उन्होंने दावा किया था कि उनके साथ 40 विधायक हैं लेकिन शपथ ग्रहण के समय ही उनके समर्थकों ने पीठ दिखा दी और अजीत शपथ लेने वाले एकमात्र  विधायक थे. यह कहा जाता है कि 2019 का खेल भी  शरद पवार के इशारे पर  खेला गया था क्योंकि जब शिवसेना, कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी की मिली जुली महाविकास आघाडी की सरकार बनी तब उसमें भी अजित पवार ही उपमुख्यमंत्री थे. 

यह सवाल पूछा जाता है कि यदि शरद पवार वास्तव में बगावत से नाराज होते तो वे अजित पवार को उपमुख्यमंत्री क्यों बनाते? इस सवाल का जवाब किसी ने दिया तो नहीं है लेकिन जो तस्वीर दिखाई दे रही है उससे यही लगता है कि यह नूरा कुश्ती थी. 
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महाराष्ट्र में 'शिंदे सरकार' का विकल्प तैयार करने की कोशिश 

अजित पवार महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री बनना चाहते हैं यह बात किसी से छिपी नहीं है. अभी 15 दिन पहले राज्य के प्रमुख शहरों में पोस्टर लगे थे जिनमें अजीत पवार को अगला मुख्यमंत्री बताया गया था. इस पोस्टर युद्ध के कारण भी पार्टी में नाराजगी का माहौल बना था. कयास लगाए जा रहे थे  कि अगर सुप्रीम कोर्ट वर्तमान मुख्यमंत्री एकनाथराव शिंदे (Eknatharao Shinde) को अयोग्य घोषित करता है तो उस स्थिति में अजीत पवार अपने समर्थक विधायकों को लेकर भाजपा के साथ सौदेबाजी करेंगे और तब मुख्यमंत्री पद से कम पर सहमति नहीं बनेगी.

सुप्रीम कोर्ट का फैसला अभी आने वाला है. इस बात की संभावना कम ही है कि कोर्ट की छुट्टियां लगने के पहले इस बारे में कोई फैसला आएगा. ऐसा नहीं है कि शरद पवार जैसा अनुभवी नेता अपने भतीजे की महत्वाकांक्षा को जानता- समझता ना हो. एनसीपी के नेता और कार्यकर्ता भी जानते हैं कि राज्य में पार्टी की जितनी भी सीटें आती हैं वह पवार की व्यक्तिगत साख से आती हैं. वे जमीन से जुड़े नेता है जबकि बाकी लोग विरासत के आधार पर बने हुए नेता है. 

अजित पवार एक बार सांसद रह चुके हैं लेकिन उनकी राजनीति महाराष्ट्र तक ही सीमित रही है. इस नाते वर्तमान या भविष्य में जब भी मौका मिले तो वे महाराष्ट्र का मुख्यमंत्री बनना चाहते हैं लेकिन राज्य में पार्टी का नेतृत्व कौन करेगा, टिकट किसे मिलेगी, मंत्री कौन बनेगा- यह सारे फैसले पवार की मर्जी और सहमति से ही होते हैं. 

2019 में भी महा विकास आघाडी का नेतृत्व उद्धव ठाकरे को देने का निर्णय शरद पवार की महत्वपूर्ण भूमिका थी और कांग्रेस ने भी उससे अपनी सहमति जताई थी. इस आघाडी में कांग्रेस को शामिल करने की रणनीति भी शरद पवार ने ही बनाई थी और कांग्रेस आलाकमान को समझाने में भी उन्होंने सफलता पाई थी. 

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अब शरद पवार की भूमिका क्या रहेगी? संभावना बनी हुई है कि पार्टी नेताओं और कार्यकर्ताओं के दबाव में आकर शरद पवार अपना फैसला बदल सकते हैं किंतु यदि ऐसा नहीं हुआ तो पवार की भूमिका क्या रहेगी? इसमें कोई शक नहीं है कि शरद पवार के दमखम पर ही राकांपा टिकी हुई है और पार्टी भविष्य में भी उनके मार्गदर्शन में काम करेगी.

इस समय जो बड़े पार्टी नेता है वे जमीन से जुड़े हुए नहीं हैं और यदि हैं भी तो उनका राजनीतिक दबदबा या प्रभाव उनके जिले तक या 2-4 विधानसभा चुनाव क्षेत्रों तक सीमित है.  पूरे राज्य को प्रभावित करने वाला या दबदबा रखने वाला नेता इस पार्टी में नहीं है इसलिए जो भी व्यक्ति पार्टी का नेतृत्व करेगा उसे पवार की उंगली पकड़ कर ही चलना होगा.

यह निश्चित है कि सीमित राजनीतिक प्रभाव वाले नेता राज्य या राष्ट्रीय स्तर पर प्रभाव नहीं डाल पाएंगे. 2024 में राज्य विधानसभा चुनाव भी हैं और इतने कम समय में अपने बूते पर संगठन और राज्य पर नियंत्रण पा सके ऐसा कोई नेता फिलहाल नहीं है. 

NCP का अगला राष्ट्रीय अध्यक्ष कौन? 

शरद पवार ने अध्यक्ष पद छोड़ते समय कहा था कि एक समिति का गठन किया जाएगा जो यह तय करेगी कि पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष कौन हो. इस समय एनसीपी के पास दो ही व्यक्ति हैं जिनकी राष्ट्रीय स्तर पर पहचान है.पहले व्यक्ति हैं प्रफुल्ल पटेल (Prafulla Patel) और दूसरी हैं पवार की बेटी सुप्रिया सुले.

सुप्रिया लोकसभा सदस्य हैं और सर्वश्रेष्ठ सांसद का सम्मान पा चुकी हैं. राजनीतिक मुद्दों पर उनकी अच्छी पकड़ है. प्रफुल्ल पटेल इस समय राज्यसभा के सदस्य हैं. राजनीतिक मुद्दों पर वे मुखर नहीं है लेकिन उनकी गिनती राजनीति गुत्थियों को सुलझाने वाले व्यक्ति के रूप में है. उनका राजनीतिक प्रभाव सीमित है. 

पार्टी का नया अध्यक्ष बनने के लिए पवार द्वारा बनाई गई समिति में प्रफुल्ल पटेल, सुप्रिया सुले के अलावा अजित पवार, सुनील तटकरे,  प्रदेश अध्यक्ष जयंत पाटिल, छगन भुजबल, दिलीप वलसे पाटिल, के.के. शर्मा, अनिल देशमुख, राजेश टोपे जितेन्द्र आव्हाड, हसन मुश्रीफ,धनंजय मुंडे, जयदेव गायकवाड, फौजिया खान, धीरज शर्मा और सोनिया शामिल है. संभावना यही है कि प्रफुल पटेल को अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी सौंपी जाएगी ताकि अजीत पवार और सुप्रिया सुले के बीच सीधा टकराव टाला जा सके. 

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शरद पवार ने बाल ठाकरे से अलग तरीका अपनाया  

शिवसेना में नेतृत्व को लेकर उद्धव ठाकरे(Uddav Thakre)और राज ठाकरे के बीच विवाद चल रहा था.राज ठाकरे ज्यादा आक्रामक नेता है. ऐसा समझा जाता था कि शिवसेना प्रमुख बालठाकरे (Bal Thakare) राज ठाकरे को अपना उत्तराधिकारी घोषित कर सकते हैं. लेकिन उन्होंने शिवसेना की कमान अपने बेटे उद्धव ठाकरे को सौंप दी.

यही नहीं जब शिव सैनिकों के सामने वे उद्धव ठाकरे को अपना उत्तराधिकारी बना रहे थे तो उसी समय उन्होंने उद्धव ठाकरे के उत्तराधिकारी की भी घोषणा कर यह कह कर कर दी थी कि जैसे आप लोगों ने मुझे संभाला है इसी तरह उद्धव और आदित्य ठाकरे (Aditya Thakare) को भी संभालिए. शिवसेना का राजनीतिक ढांचा था इसलिए वहां चल गया लेकिन लोकतांत्रिक पार्टी का दावा करने के कारण शरद पवार ने एक समिति बनाकर अध्यक्ष चुनने का काम उसे सौंप दिया. 

विपक्षी एकता पर क्या असर पड़ेगा?  2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा (BJP) और नरेंद्र मोदी (Narendra Modi) का सामना करने के लिए विपक्षी दल मिलकर रणनीति बनाने की कोशिश कर रहे हैं. विपक्षी दलों को एक मंच पर लाने में शरद पवार की महत्वपूर्ण भूमिका रही है. इस्तीफा देने के बावजूद उनके राजनीतिक कद और संपर्कों का लाभ अभी भी विपक्ष को मिलेगा लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या विपक्ष एक होगा?

विपक्ष में सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस है और बाकी सारे दल राज्य स्तर से ज्यादा महत्व नहीं रखते हैं. सबसे बड़ी बात है कि ये छोटे-मोटे दल कांग्रेस से परहेज करते हैं और शरद पवार सहित हर दल के मुखिया के मन में प्रधानमंत्री बनने की ललक है.

सारे महत्वाकांक्षी लोगों को एक सूत्र में पिरोना बड़ा मुश्किल काम है. एक कॉमन एजेंडा और प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार पहले से तय होने की स्थिति में विपक्षी एकता होना संभव है. यह बात भी तय है कि सभी दलों को एक जगह पर लाने की क्षमता पवार में है लेकिन विपक्षी एकता की सफलता के बारे में संदेह है. इसलिए राष्ट्रीय स्तर पर पवार का प्रभाव कम होगा यह कहना नासमझी होगी. 

(विष्णु गजानन पांडे लोकमत पत्र समूह में रेजिडेंट एडिटर रह चुके हैं. लेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं और उनसे क्विंट हिंदी का सहमत होना जरूरी नहीं है)

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