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यादव फैक्टर : शरद और मुलायम के बिना क्या बच पाएगी ‘मंडल राजनीति’?

समाजवाद के दो बड़े नेता शरद यादव और मुलायम सिंह यादव नहीं रहे, लालू यादव बीमार चल रहे हैॉ

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मुलायम सिंह यादव के निधन के कुछ ही समय बाद समाजवादी दिग्गज शरद यादव  Sharad Yadav  का 75 वर्ष की आयु में निधन हो गया. यह एक राजनीतिक युग के अंत जैसा प्रतीत हो रहा है.

वहीं भारतीय समाजवादी विचारधारा के आइकॉन राम मनोहर लोहिया और जयप्रकाश नारायण से प्रेरित और पोषित लालू प्रसाद इस समय बीमार हैं और सिंगापुर के एक अस्पताल में उपचार करवा रहे हैं. मुलायम, शरद और लालू यादव की तिकड़ी राजनिति में काफी मायने रखती थी. पिछड़ी जातियों और मध्यम किसान वर्ग के बढ़ते प्रभाव को ट्रिगर करके इस महत्वपूर्ण तिकड़ी ने उत्तर भारतीय राजनीति में अपना दबदबा बनाया था.
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शरद यादव के राजनीतिक करियर को उनके जन कौशल ने जोरदार तरीके से प्रभावित किया था

यह एक विरोधाभास की तरह है, भले ही निसंदेह तौर पर इस तिकड़ी में दो साथी (मुलायम और लालू) के मुकाबले शरद यादव के पास व्यापक राजनीतिक करिश्मे का अभाव था, लेकिन लगभग 50 साल पहले राष्ट्रीय राजनीति में उनका आगमन कहीं ज्यादा शानदार तरीके से हुआ था.

मध्य प्रदेश में समाजवादी छात्र राजनीति में एक आशाजनक दौड़ के बाद, जयप्रकाश नारायण ने स्वयं शरद यादव को 1974 में जबलपुर से लोकसभा उपचुनाव में संयुक्त विपक्ष के उम्मीदवार के तौर पर चुना और इस चुनाव में उनकी जीत भी हुई. इस प्रकार, तत्कालीन प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी और सत्तारूढ़ कांग्रेस पार्टी के खिलाफ राजनीतिक दलों के उभरते गठबंधन को महत्वपूर्ण बढ़ावा मिला.

महज एक साल बाद देश की संसद के सबसे युवा सांसदों में एक 27 वर्षीय शरद यादव को आपातकाल लागू होने के बाद सैकड़ों अन्य विपक्षी नेताओं के साथ आंतरिक सुरक्षा अधिनियम (Maintenance of Internal Security Act-  MISA) के तहत जेल में डाल दिया गया था.

1977 के आपातकाल में पीएम इंदिरा गांधी ने एक बड़ा दांव खेलते हुए लोकसभा चुनाव कराने का ऐलान करवा दिया. यह दांव उन्हें उल्टा पड़ा और संयुक्त विपक्ष ने उनके शासन को उखाड़ फेंक दिया. 1977 के चुनाव में शरद यादव एक बार फिर मध्य प्रदेश से चुनाव लड़े और जीत भी दर्ज की.

वह बड़ी ही तेजी से नवगठित सत्तारूढ़ जनता पार्टी के उभरते हुए युवा राजनीतिक सितारों में से एक बन गए थे, जो यह दर्शाता है कि उनमें दोस्त बनाने और राजनीतिक स्पेक्ट्रम के लोगों को प्रभावित करने की काफी कुशल प्रतिभा थी. आश्चर्यजनक रूप से, वह अपने राजनीतिक आधार को अपने गृह राज्य मध्य प्रदेश से उत्तर प्रदेश, फिर बिहार में स्थानांतरित करने में कामयाब रहे थे. यह देखते हुए कि दोनों राज्यों में यादवों का एक प्रभावी समुदाय है, उनका निर्णय सोचा-समझा था.

मंडल पॉलिटिक्स से शरद यादव ने पिछड़े वर्गों को संगठित किया

1979 में, जब किसान नेता (मुखिया) और गृह मंत्री चरण सिंह ने जनता पार्टी से अलग होकर लोक दल बनाया और कांग्रेस के समर्थन से कुछ समय के लिए प्रधान मंत्री बने, तब शरद यादव उनकी नई पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव बने थे.

लगभग एक दशक बाद शरद यादव ने वीपी सिंह के नेतृत्व में जनता दल की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. वीपी सिंह ने शरद यादव को कपड़ा और खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्री के तौर पर कैबिनेट में शामिल किया था. वीपी सिंह द्वारा पिछड़ी जातियों के लिए विवादास्पद मंडल कमीशन आरक्षण नीति की घोषणा गई थी, जिसकी वजह से उनकी सरकार गिर गई. इसके बाद मुलायम सिंह और लालू प्रसाद के साथ शरद यादव "मंडल पॉलिटिक्स" के रूप में जाने जाने वाले प्रमुख मशालची बन गए.

जहां एक ओर इस तिकड़ी के दो यादवों (मुलायम और लालू) ने उत्तर प्रदेश और बिहार में अपनी क्षेत्रीय प्रोफाइल बढ़ाने पर ध्यान केंद्रित किया, वहीं दूसरी ओर शरद यादव ने 1989 से 1997 तक जनता दल के संसदीय बोर्ड के महासचिव और अध्यक्ष के तौर पर राष्ट्रीय राजनीति पर ध्यान केंद्रित किया और बाद में उन्हें पार्टी अध्यक्ष बनाया गया.

राजनीतिक वार्ता (पॉलिटिकल निगोशिएशन) में माहिर शरद यादव ने जनता दल के अध्यक्ष के तौर पर 1999 में अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली बीजेपी के साथ गठबंधन बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी, जॉर्ज फर्नांडीस और नीतीश कुमार की मदद से उन्होंने एक नई पार्टी जनता दल (यूनाइटेड) की नींव रखी जो बीजेपी के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन का हिस्सा बन गई. आगे चलकर बिहार में बीजेपी और जेडी (यू) ने मिलकर गठबंधन वाली सरकार बनाई और लालू प्रसाद को सत्ता से बाहर करके उनकी जगह नीतीश कुमार को स्थापित किया.

लालू प्रसाद और शरद यादव के संबंध कई वर्षों तक तनावपूर्ण बने रहे थे, क्योंकि शरद को लालू बिहार की राजनीति में दखलंदाजी करने वाले एक बाहरी के तौर पर देख रहे थे. दिलचस्प बात यह है कि बिहार का मधेपुरा निर्वाचन क्षेत्र, जिसे शरद यादव ने अपने गृह निर्वाचन क्षेत्र के रूप में चुना था, यह दोनों यादवों (शरद और लालू) के बीच चुनावी संघर्ष एक बड़ा केंद्र बन गया था.

लालू प्रसाद ने शरद यादव को मधेपुरा से दो बार हराया था, जबकि शरद ने लालू को एक बार हराया था. लालू के मैदान छोड़ने के बाद भी संघर्ष जारी रहा और उनकी पार्टी आरजेडी ने शरद यादव को हराने की पूरी कोशिश की, जिसमें एक बार पार्टी असफल रही जबकि अगली बार सफल हो गई.

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संघर्ष और गहरी दोस्ती ने लालू-शरद की जोड़ी को परिभाषित किया

लेकिन पिछले कुछ सालों में दोनों (लालू और शरद यादव) एक बार फिर करीब आ गए थे. 2014 में नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद बीजेपी की हिंदुत्व नीति अपनाने की दलील पर नीतीश कुमार द्वारा एनडीए से नाता तोड़ने के फैसले का समर्थन करने के बाद, शरद यादव ने नीतीश के साथ उस समय जाने से इंकार कर दिया था, जब लालू प्रसाद और उनके बेटे और उत्तराधिकारी तेजस्वी यादव के साथ विवाद के कुछ साल बाद जब नीतीश बीजेपी में लौटे थे.

कुछ साल बाद शरद यादव उस वक्त सही साबित हुए, जब नीतीश एक बार फिर बीजेपी के खिलाफ हो गए. उसके बाद नीतीश ने आरजेडी के साथ अपने गठबंधन को पुनर्जीवित करने का विकल्प चुना और तेजस्वी को अपना उपमुख्यमंत्री बनाया.

इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं कि शरद यादव के निधन के बारे में सुनकर बीमार लालू ने सिंगापुर में अपने बिस्तर से ट्वीट किया "हमारे बीच कई असहमति और झगड़े थे, लेकिन हमारे बीच कभी कड़वाहट नहीं थी." जबकि तेजस्वी ने कहा कि कैसे वह दिवंगत नेता (शरद यादव) को "अभिभावक और मार्गदर्शक" मानते हैं.”

(लेखक दिल्ली के वरिष्ठ पत्रकार हैं और 'बहनजी : ए पॉलिटिकल बायोग्राफी ऑफ मायावती' के लेखक हैं. यह एक राय है. ऊपर व्यक्त किए गए विचार लेखक के अपने हैं. क्विंट न तो इसका समर्थन करता है और न ही इसके लिए जिम्मेदार है. )

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