ADVERTISEMENT

इजरायल Vs फिलिस्तीन: भारत की कूटनीति दोनों को कैसे कर गई 'निराश'?

नेतन्याहू के ट्वीट और रियाद मलिकी के लेटर से स्पष्ट होता है कि हमने दोनों पक्षों को निराश करने का जोखिम लिया है

Published
<div class="paragraphs"><p>क्या इजरायल-फिलिस्तीन पर भारतीय पॉलिसी संतुलित है?</p></div>
i

इस सप्ताह फिलिस्तीन के विदेश मंत्री रियाद मलिकी ने अपने भारतीय समकक्ष एस. जयशंकर को लेटर लिखते हुए भारत द्वारा फिलिस्तीन के मुद्दे पर यूनाइटेड नेशंस ह्यूमन राइट काउंसिल(UNHRC) द्वारा लाए प्रस्ताव पर अनुपस्थित रहने के निर्णय की कड़ी आलोचना की. उन्होंने इसे मानवाधिकार को "दबाने" वाला कदम बताया.

'असामान्य रूप से कठोर" टर्म्स का प्रयोग करते हुए मलिकी ने कहा "भारत गणराज्य ने जवाबदेही, न्याय और शांति के रास्ते के इस महत्वपूर्ण और लंबे समय से अपेक्षित टर्निंग पॉइंट पर अंतर्राष्ट्रीय समुदाय के साथ खड़े रहने का मौका गंवा दिया". यह भारत जैसे फिलिस्तीनी हक के पुराने सहयोगी और संरक्षक के लिए कठोर शब्द हैं.

मलिकी ने जिक्र किया कि यह प्रस्ताव "व्यापक बहुपक्षीय विचार विमर्श" का परिणाम था और इस पर भारत की "अनुपस्थिति ने हरेक इंसान के मानवाधिकार, जिसमें फिलिस्तीनी लोग भी शामिल हैं, के महत्वपूर्ण काम को दबाया है".

UNHRC के प्रस्ताव को 24 वोट पक्ष में मिलने के बाद स्वीकार कर लिया गया, जबकि 9 वोट के विरोध में डाले गए. वोटिंग में भारत सहित 14 सदस्य अनुपस्थित रहे. इस प्रस्ताव के पास होने से इजरायल द्वारा अंतरराष्ट्रीय कानूनों के उल्लंघन को जांचने के लिए स्वतंत्र आयोग गठित करने का रास्ता साफ हो गया है. इजरायल इस बार भी पहले की तरह सहयोग नहीं करेगा. बावजूद इसके इस पूरे घटनाक्रम ने भारतीय स्टैंड में स्पष्ट बदलाव को कंफर्म कर दिया है, जिसे कईयों ने 16 मई को UN सुरक्षा परिषद में भारतीय हस्तक्षेप और 20 मई को UN जेनरल असेंबली में भारतीय बयान में देखा होगा.

ADVERTISEMENT

भारत ने अपना समर्थन पूरी तरह से इजराइल को दे दिया है?

सुरक्षा परिषद मीटिंग में भारत के स्थाई प्रतिनिधि टीएस. त्रिमूर्ति, इस मामले में भारत के परंपरागत पॉलिसी को भी दुहराते हुए नजर आए जब उन्होंने कहा कि रमजान के दौरान अल अक्सा मस्जिद में इजराइली फोर्स के घुसपैठ ने शांति को भंग किया. 3 दिन बाद इस प्वाइंट को भारत ने अपने जनरल असेंबली के भाषण में जगह नहीं दी,जहां फिलिस्तीनियों के लिए सहानुभूति सुरक्षा परिषद की अपेक्षा व्यापक है.

भारतीय पारंपरिक स्टैंड "न्याय संगत फिलिस्तीनी मुद्दे के लिए भारत का मजबूत समर्थन और 'टू स्टेट सॉल्यूशन' के लिए हमारी अटूट प्रतिबद्धता"सुरक्षा परिषद के बयान में तो था लेकिन जनरल असेंबली के बयान से गायब. इससे हमारी पॉलिसी की एकरूपता पर ही प्रश्न खड़ा हो जाता है.
ADVERTISEMENT

भारत के बाद के बयान ने भी इसी धारणा को मजबूत किया कि हमारा पूरा समर्थन इजराइल को ही है. भारतीय नागरिक सौम्या संतोष(जो इजराइल में नर्स के रूप में कार्यरत थीं) का इस संघर्ष में दुखद निधन हुआ और इस पर भारत ने शोक जताया. भारत के द्वारा हमास के रॉकेट अटैक की निंदा न्यायोचित होती,चाहे हमास को इजरायल ने कितना ही उकसाया क्यों ना हो. लेकिन इजराइली केस की समझ दिखाने में भारतीय स्टैंड जनरल असेंबली में इससे कहीं आगे निकल गया.

आश्चर्यजनक ढंग से भारत ने कहीं पर भी यह नहीं कहा कि इजरायल द्वारा कई गुना मजबूत और संगठित मिलिट्री के साथ जवाबी कार्यवाही अस्वीकार्य है, विशेषकर जब इजराइली हमले से आम फिलिस्तीनियों की मौत हुई ,जिसमें कई महिलाएं और बच्चे शामिल थें.साथ ही मीडिया ऑफिस पर इजरायली हमले की हमारी तरफ से कोई निंदा नहीं हुई जबकि यह हमला सूचना के स्वतंत्र प्रवाह के सिद्धांत को कमजोर करता है.

ADVERTISEMENT

इजरायल का फिलिस्तीनियों के साथ व्यवहार: भारत ने अपनी प्रतिक्रिया मंद कर ली

भारत का 27 मई को ह्यूमन राइट काउंसिल में लाए गए प्रस्ताव के वोटिंग में अनुपस्थित रहना उसके पॉलिसी शिफ्ट की पुष्टि करता है. इस प्रस्ताव में अंतरराष्ट्रीय कानूनों को दोहराने के साथ-साथ इजरायल द्वारा वैश्विक स्तर पर स्वीकृत मानवाधिकार के अनुपालन पर जोर दिया गया था.

अब तक हम अपने कुशल डिप्लोमेसी के दम पर इजरायल के साथ संबंध और फिलिस्तीनी हक,दोनों नावों पर एक साथ स्थिरता से सवार होते चले आए हैं.लेकिन इस बार हमने वह संतुलन बिगाड़ दिया. सच यह है कि पिछले कुछ सालों में भारत सरकार ने फिलिस्तीन के प्रति इजराइल के व्यवहार पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए अपनी आवाज को धीमी कर दी है और हल्की जबान में अपनी अस्वीकृति जाहिर कर रही है.

अब वह फिलिस्तीनियों की तरफ से जवाबी कार्यवाही की भी निंदा कर रहा है जबकि अतीत में भारत इसे सख्त इजराइली पॉलिसी के प्रतिक्रिया में देखता था और कई बार तो न्यायोचित भी करार देता था .इजराइल से मजबूत होते संबंध के साथ भारत ने UN ने उसके खिलाफ प्रस्ताव शुरू करना बंद कर दिया ,जबकि उन्हें अपना वोट देना जारी रखा है. इसे इजरायल विरोधी प्रस्ताव में भारत के स्टैंड के रूप में देखा गया.

ADVERTISEMENT

नई दिल्ली का अस्थिर स्टैंड

यह आसान नहीं है. दिल्ली में नीति-निर्माताओं को कई बातों का ध्यान रखना चाहिए. फिलिस्तीनी उद्देश्य के लिए भारत के 19 करोड़ मुस्लिमों के समर्थन को देखते हुए इसमें स्पष्ट घरेलू हित भी शामिल हैं. यही भारत का अरब समर्थक रूख का भी कारण है. खाड़ी देश में लगभग 60 लाख भारतीय कार्यरत हैं और यह भारत के लिए धन का एक प्रमुख स्रोत है, जिसे भारत खतरे में नहीं डालना चाहेगा.

दूसरी तरफ अरब क्षेत्र भी इजराइल के प्रति अपने स्टैंड को लेकर बदल रहा है, जहां कई देशों ने इजराइल को मान्यता देना शुरू कर दिया है .इजराइल को वह क्षेत्र में बढ़ते कट्टरपंथी इस्लामवाद के खतरे के खिलाफ समर्थक के रूप में देखते हैं. इससे कई खाड़ी देशों के शासनाध्यक्षों को खतरा हो सकता है. अभी भारत द्वारा अपने इजराइल समर्थक रुख को और मजबूत करने से भारत को नकारात्मक असर के होने का खतरा कम है.

भारत-इजरायल के बीच बढ़ती नजदीकियों के बीच, मुख्यतः सुरक्षा क्षेत्र में, भारत द्वारा इजरायल विरोधी स्टैंड लेने की कीमत अतीत की अपेक्षा बढ़ गई है. नेतन्याहू ने अपने ट्वीट में 20 देशों को इजराइल के साथ खड़े होने के लिए धन्यवाद कहा लेकिन उसमें भारत का नाम नहीं था.अब हम सुधार के लिए हाथ-पांव मार रहे हैं.
ADVERTISEMENT

संतुलन की जरूरत

इन तीन UN मीटिंगों ने इजराइल के प्रति भारत के झुकाव को स्पष्ट कर दिया है. फिर भी एक संतुलन प्राप्त करने की जरूरत है. विदेशों में बीजेपी सरकार द्वारा हिंदुत्व कट्टरता के प्रचार को लेकर चिंताएं बढ़ती जा रही है. भारत द्वारा पूरी तरह से इजराइल का पक्ष लेने के रुख को मुस्लिम वर्ल्ड में इस्लाम के खिलाफ यहूदी-हिंदू धुरी के रूप में देखा जा रहा है. यह कतई हमारे हित में नहीं है,चाहे दिल्ली में जिस किसी की भी सरकार हो.

कांग्रेस पार्टी के नेतृत्व वाली पूर्व सरकारों ने इजरायल के साथ रणनीतिक,सुरक्षा और तकनीकी सहयोग को मजबूत करते हुए फिलिस्तीनी अधिकारों और स्वतंत्रता के लिए अपने समर्थन के बीच सावधानीपूर्वक संतुलन बनाए रखने का प्रयास किया. अब उसने भारत द्वारा इजराइल के प्रति खुले झुकाव पर निराशा व्यक्त की है. वह भारत के पारंपरिक स्टैंड को दोहराते हुए 'टू-स्टेट सॉल्यूशन' का समर्थन और पूर्वी जेरूसलम को आजाद फिलिस्तीन की राजधानी के रूप में मान्यता देने के स्टैंड पर डटी हुई है.

भारत का लंबे समय से मत रहा है कि दोनों पक्ष को हिंसा त्याग कर 'टू-स्टेट सॉल्यूशन' के लिए शांति वार्ता पर लौटना चाहिए. दोनों तरफ के लोगों के समान संप्रभु अधिकारों के साथ इजरायल-फिलीस्तीन के बीच सार्थक शांतिपूर्ण सहअस्तित्व के लिए कोई दूसरा रास्ता नहीं है.

ADVERTISEMENT

भारत का अगला कदम क्या हो?

अभी नेतन्याहू के ट्वीट और मलिकी के लेटर से स्पष्ट होता है कि हमने दोनों पक्षों को निराश करने का जोखिम लिया है. अभी हमारी पॉलिसी हारती दिख रही है. इसे हमें अपने पक्ष में करने की कोशिश करनी चाहिए.

जैसा कि कुछ देशों ने दोनों पक्षों से अच्छा संबंध बना रखा है ,भारत को मिडिल-ईस्ट में एक विशेष दूत की नियुक्ति पर गंभीरता से विचार करना चाहिए,ताकि इजरायल और फिलिस्तीन के बीच शांति बहाली में हम अपनी सहायता दे सकें.अतीत में भी हमारे पास ऐसे मौके थे लेकिन हमने उसे गंवा दिया. शायद मोदी सरकार द्वारा इसे पुनर्जीवित करने का समय आ गया है.

(डॉ. थरूर तीसरी बार तिरुवनन्तपुरम से सांसद हैं. वह 22 किताबें लिखने वाले पुरस्कार प्राप्त लेखक भी हैं. उनकी हाल की किताब है ‘द बेटल ऑफ बिलॉगिंग्स’ (एल्फ). उनका ट्विटर हैंडल @ShashiTharoor है. यह एक ओपनियन लेख है. यहां व्यक्त विचार लेखक के अपने हैं. क्विंट का उनसे सहमत होना जरूरी नहीं है.)

(हैलो दोस्तों! हमारे Telegram चैनल से जुड़े रहिए यहां)

ADVERTISEMENT
ADVERTISEMENT
क्विंट हिंदी के साथ रहें अपडेट

सब्स्क्राइब कीजिए हमारा डेली न्यूजलेटर और पाइए खबरें आपके इनबॉक्स में

120,000 से अधिक ग्राहक जुड़ें!
ADVERTISEMENT