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The Kashmir Files: एक कश्मीरी बता रहा फिल्म कैसे आधा सच दिखाकर नफरत फैला रही

द कश्मीर फाइल्स दो समुदायों के बीच नफरत फैलाने का काम करती है

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‘कश्मीर फाइल्स’ (The Kashmir Files) का एक डायलॉग है- “झूठ फैलाना पाप है, लेकिन सच छुपाना, उससे भी बड़ा पाप है.” और फिल्म बनाने वालों ने यह दोनों ही किया है- झूठ फैलाया है और पूरा सच छिपाया भी है. फिल्म की कहानी की पेचीदगियों पर बात करने से पहले यह बताना जरूरी है कि 1990 के दशक और उसके बाद कश्मीरी पंडितों ने जो दर्द और तकलीफ झेली, उसे कम नहीं किया जा सकता. लेकिन जहां तक फिल्म की कहानी का सवाल है, वह मनगढंत, खुद रची गई और अतिशयोक्ति से भरपूर है.

दूसरा सबसे अहम मुद्दा यह है कि हम सबको एक बात ध्यान में रखनी चाहिए. वह यह कि जो भी कंटेंट हमें मिलता है, हमें उसके अच्छे-बुरे, दोनों पहलुओं पर गौर करना चाहिए.

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जैसे नेटफिल्क्स की वेबसीरिज ‘नार्को’ को ही लीजिए. यह कोलंबिया के कुख्यात ड्रग तस्कर पाब्लो इस्कोबार की बायोग्राफी है. लेकिन इसका सिनेमैटिक नेरेटिव इतना मजबूत है कि सीरिज के आखिर में, दर्शक पाब्लो से हमदर्दी करने लगते हैं, जोकि साफतौर से एक बड़ा अपराधी था.

सिनेमाई छूट बनाम सच्चाई

हालांकि ‘कश्मीर फाइल्स’ सच्ची कहानी पर आधारित है, लेकिन फिल्ममेकर्स ने पक्की तौर से फिल्म को ज्यादा से ज्यादा “नाटकीय” बनाने के लिए कलात्मक छूट ली है. फिल्म काफी लंबी और धीमी है, लेकिन लोगों को जो चीज बांधे रखती है, वह अनुपम खेर और दर्शन कुमार का अद्भुत और दिलकश अभिनय है. दर्शन कुमार फिल्म में अनुपम खेर के पोते की भूमिका में हैं.

पहला, हालांकि फिल्म का मकसद इतिहास की सच्चाई को पेश करना है, लेकिन वह इतिहास लिखने की ही कोशिश करती है. और कश्मीरी पंडितों की तकलीफ को दर्शाने की बजाय कश्मीरी मुसलमानों को बहुत हद तक बदनाम करती है.

यह देश के महानगरों में मुख्यधारा के दर्शकों को भले चोट न पहुंचाए लेकिन इससे कश्मीरी मुसलमानों और पंडितों के बीच खाई जरूर पैदा करता है जो शांतिपूर्ण तरीके से एक दूसरे के साथ रहने की कोशिश कर रहे हैं, इसके बावजूद कि निहित स्वार्थ इन दो समुदायों के बीच नफरत पैदा करने की कोशिशें कर रहे हैं.

फिल्म की कहानी 1990 के दशक की है और इसकी शुरुआत कश्मीरी मुसलमान बच्चों के एक जुलूस के साथ होती है जिनके पास बंदूकें हैं. उनकी उम्र आठ से 10 साल है. हालांकि अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय मीडिया, दोनों ने बड़े पैमाने पर कश्मीर का डॉक्यूमेंटेशन किया है लेकिन इस बात की पुष्टि कभी नहीं हुई कि हथियारबंद समूहों में इतने छोटे बच्चों की भर्तियां की जाती हैं.

घाटी में जिस सबसे कम उम्र के आतंकवादी मुदासिर पर्रे की मौत 2018 में श्रीनगर में हुई थी, उसकी उम्र 15 साल थी. इसके अलावा कश्मीर संघर्ष के इतिहास में आठ या नौ साल के बच्चों की सामूहिक भर्ती की कोई खबर नहीं मिली है.

हथियारबंद बगावत में बच्चों को शामिल बताना, काफी परेशान करने वाला है. इसके अलावा कहीं न कहीं, यह भी गलत तरीके से दिखाता है कि मुसलमान लोग अपने बच्चों को हथियारों से लैस करके पंडितों की सामूहिक हत्या की कोशिश कर रहे हैं.

दूसरा, 2010 के श्राइन बोर्ड आंदोलन के बाद कश्मीर में जो नारे लगे थे, उन नारों को 1990 के दशक में पंडितों के घरों के बाहर ग्राफिटी के तौर पर दिखाया गया है. मैं दक्षिण कश्मीर के एक कस्बे का रहने वाला हूं. इस कस्बे में ऐसे सैकड़ों पंडित परिवारों को आश्रय दिया गया जिन्होंने कश्मीर से पलायन नहीं किया. इसमें मेरे एक टीचर का परिवार भी शामिल है. वहां किसी पंडित के घर पर किसी मुसलमान ने ऐसे नारे चस्पा नहीं किए.
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बुरहान वानी, ईरान और दूसरे झूठ

तीसरा, इस बीच एक विचित्र त्रासदी भी है. फिल्ममेकर्स अपने इस्लामोफोबिया को खुलकर जाहिर करते हैं. शुरुआत में एक प्रदर्शन में आतंकवादी भीड़ को संबोधित करते दिखाए गए हैं. एक आतंकवादी अयातुल्ला खुमैनी का फोटो लिए खड़ा है. खुमैनी ईरान के शिया नेता हैं. उन्होंने शायद ही कभी कश्मीर के संघर्ष पर कोई बयान दिया होगा. फिर भी विवेक अग्निहोत्री ने इतिहास को तोड़ा मरोड़ा और यह दिखाया कि आतंकवादी उन पर श्रद्धा रखते हैं.

इसके अलावा, फिल्म का प्लॉट मौजूदा वक्त के साथ भी चलता है. फिल्म में देश के वामपंथी झुकाव वाले स्टूडेंट संगठनों को भी बदनाम किया गया है. विवेक अग्निहोत्री ने प्रोफेसर निवेदिता मेनन का कैरेक्टर रचा है, और एआईएफए के नाम से आइसा का झंडा इस्तेमाल किया है. इस तरह उन्होंने यूनिवर्सिटीज़ में बौद्धिक विमर्श को अपमानित करने की कोशिश की है.

उन्होंने जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय को एएनयू नाम दिया है और उसे ‘देशद्रोही ताकतों का गढ़’ बताया है. फिल्म में प्रोफेसर निवेदिता मेनन को दिखाया गया है जिन्हें राधिका मेनन नाम दिया गया है. राधिका को "बुरहान वानी जिंदाबाद" के नारे लगाते दिखाया गया है. बुरहान वानी आतंकवादी गुट हिजबुल मुजाहिदीन का कमांडर था. सोशल मीडिया पर उसके कई वीडियो वायरल हुए थे और लोग उसे पहचानने लगे थे.

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सच्चाई तो यह है कि निवेदिता मेनन का ऐसा एक भी भाषण नहीं, जिसमें उन्होंने कश्मीर में हथियारबंद विद्रोह को सही ठहराया हो या किसी आतंकवादी की तारीफ की हो, जैसा कि विवेक अग्निहोत्री ने दिखाया गया है, या क्रांतिकारी भगत सिंह से बुहरान वानी को बराबरी की हो.

कश्मीरी संघर्ष समिति जैसे पंडित समूह 400 कश्मीरी पंडितों की हत्या का आंकड़ा देते हैं, जम्मू कश्मीर सरकार के आधिकारिक रिकॉर्ड्स में इनकी संख्या 289 बताई गई है. दूसरी तरफ फिल्म का कहना है कि डल झील में कम से कम एक लाख पंडित डूब गए और मार दिए गए.

कश्मीर की सूफी परंपरा

नदीमर्ग नरसंहार जैसे दुखद हादसे को छोड़कर सामूहिक हत्याओं की कोई रिपोर्ट नहीं है. इस हादसे में 23 पंडितों को उन आतंकवादियों ने मार डाला था जो सैनिकों के से कपड़े पहने हुए थे.

अब अगर इसे "नरसंहार" में गिना जाता है तो इसमें गावकदल हत्याकांड (1990), बिजबेहरा नरसंहार (1993), सोपोर नरसंहार (1993), कुपवाड़ा नरसंहार (1994) जैसे हादसे भी शामिल हो सकते हैं. इन नरसंहारों में हजारों कश्मीरी मुसलमानों को निशाना बनाया गया और मार डाला गया. लेकिन फिल्म बनाने वालों ने इन सभी को फिल्टर कर दिया है.

लेकिन यहां पंडितों की बात हो रही है और हमें उसी पर चर्चा करनी चाहिए. एक बड़ी त्रासदी की तुलना छोटी त्रासदी से करने से किसी का दर्द कम नहीं होता.

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फिल्म में यह भी दिखाया गया है कि कश्मीरी मुसलमान श्रीनगर के अस्पताल में घुस रहे हैं और हिंदू मरीजों पर ताबड़तोड़ गोलियां चला रहे हैं. फिल्म के हिसाब से वे लोग अस्पताल में इसलिए भर्ती किए गए हैं क्योंकि उनके घरों पर विस्फोट किए गए, खासकर श्रीनगर में. हालांकि कश्मीर से ऐसे विस्फोटों की कोई सूचना नहीं मिली है. यहां का लाल देद अस्पताल, जिसे एक इमरजेंसी वार्ड के रूप में दिखाया गया है, 1970 के दशक से गायनाकोलॉजी यानी स्त्री रोगों का क्लिनिक रहा है.

फिल्म में यह भी दिखाया गया है कि मध्य युग में पंडितों को जबरदस्ती इस्लाम कबूल करवाया गया. इसे आसानी से खारिज किया जा सकता है. कश्मीर में एक समृद्ध सूफी परंपरा रही है. एक ईरानी व्यापारी शाही-हमदान इस्लाम धर्म का संदेश फैलाने के लिए कश्मीर आए और साथ ही स्थानीय लोगों को कढ़ाई की कला भी सिखाई. उनकी शिक्षा लोगों को एकजुट करती है. इसके बाद कश्मीर की मस्जिदों में भजन गूंजने लगे. कई पंडितों की तरह, यहां के मुसलमान परिवार खास दिनों में मांस खाने से परहेज करते हैं, और यहां के कई मुस्लिम संत शाकाहारी हैं.

आखिर में, कश्मीरी मुसलमानों को पंडितों के वंशज के रूप में देखा जाता है और इसके विपरीत, पंडित सूफी मजारों में आस्था रखते हैं. मेरे पिता के दोस्त भूषण लाल सिधा, हमेशा एक स्थानीय सूफी संत "रेशिमोअल साहब" के नाम की कसम खाते थे.

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(उमर सोफी कश्मीर के पत्रकार हैं. यह एक पर्सनल ब्लॉग है और यहां व्यक्त विचार लेखक के अपने हैं. क्विंट का उनसे सहमत होना जरूरी नहीं है.)

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