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लॉयड ऑस्टिन की यात्रा:भारत-चीन-अमेरिका के रिश्ते क्या शक्ल ले रहे?

अमेरिकी रक्षा मंत्री लॉयड ऑस्टिन की दिल्ली यात्रा दिखाती है कि बाइडेन भारत के साथ अच्छे संबंध बनाए रखना चाहते हैं.

Updated
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 19 मार्च को अमेरिकी रक्षा मंत्री लॉयड ऑस्टिन से मुलाकात की
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अमेरिकी रक्षा मंत्री लॉयड ऑस्टिन की दिल्ली यात्रा को न तो हमें बढ़ा-चढाकर पेश करना चाहिए और न ही इसके महत्व को कम करना चाहिए. एक तरफ यह उनके एशिया दौरे का हिस्सा है. जो कि अमेरिका को दक्षिण कोरिया और जापान जैसे अहम सहयोगी देशों तक ले गया है. दूसरी ओर इस दौरे में नई दिल्ली को शामिल करना दिखाता है कि जो बाइडेन प्रशासन को भारत के साथ अच्छे संबंध जारी रखने में अपने हित भी दिख रहे हैं.

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रक्षा मंत्री ऑस्टिन के दौरे को बाइडेन प्रशासन के चीन को लेकर नई नीतियों को बनाने की प्रयासों के संदर्भ में भी देखा जाना चाहिए. ऑस्टिन राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली, सियोल और टोक्यो होते हुए आए हैं. यहां उन्होंने अपने सहयोगी यूएसए के विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकेन के साथ मिलकर अपने समकक्षों के साथ टू प्लस टू वार्ता की.

अमेरिकी विदेश मंत्री ब्लिंकेन और यूएस राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जेक सुलीवन चीन के साथ बातचीत के लिए अलास्का पहुंचे. इसी बीच लॉयड ऑस्टिन भारत दौरे पर शुक्रवार को आए. इसे बाइडेन सरकार की प्रमुख नीति के रूप में देखा जा रहा है जिसका उद्देशय चीन को महामारी से निपटने समेत कई मुद्दों पर घेरना है.

ऑस्टिन ने प्रेस ब्रीफिंग में कहा कि भारत तेजी से बदलती अंतरराष्ट्रीय गतिशीलता में बदलाव करने में एक महत्वपूर्ण भागीदार है. लॉयड ऑस्टिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल से 19 मार्च को मुलाकात की. इसके बाद रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह से 20 मार्च को बातचीत की. देश के विदेश मंत्री एस. जयशंकर से भी मिले.

पेंटागन (अमेरिकी रक्षा विभाग) के प्रेस नोट के मुताबिक दोनों देशों ने क्षेत्रीय सुरक्षा सहयोग, सैन्य से सैन्य जुड़ाव और रक्षा व्यापार को लेकर बातचीत की है.

अमेरिकी रक्षा मंत्री लॉयड ऑस्टिन, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह से भी मिले
अमेरिकी रक्षा मंत्री लॉयड ऑस्टिन, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह से भी मिले
(फोटो: PTI)

लॉयड ऑस्टिन ने कहा कि उन्होंने रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, विदेश मंत्री एस.जयशंकर और एनएसए डोभाल के साथ बातचीत के दौरान अल्पसंख्यकों के मानवाधिकार पर चर्चा की. आगे उन्होंने कहा कि साझेदारों के बीच इस तरह की चर्चाएं होनी चाहिए. इस पर भारतीय पक्ष ने कहा कि अफगानिस्तान में मानवाधिकारों को लेकर चर्चा हुई है, न कि भारत को लेकर.

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भारत-अमेरिका संबंध के लिए रक्षा इतना जरूरी क्यों है?

यह कोई इत्तेफाक नहीं है कि भारत दौरे पर आने वाले बाइडेन प्रशासन के पहले शीर्ष मंत्री एक रक्षा मंत्री हैं. भारत-अमेरिका रिश्ते में अधिकतर चीजें रक्षा क्षेत्र में ही हो रही है. पिछले कुछ सालों में यूएस ने भारत को बड़ी संख्या में हथियार बेचे हैं. भारत ने अमेरिका के बेसिक एक्सचेंज एंड कोऑपरेशन एग्रीमेंट (बीईसीए- आदान-प्रदान सहयोग समझौता) पर हस्ताक्षर किए हैं.

अमेरिका ने भारत को सामरिक व्यापार प्राधिकरण-1 (एसटीए-1) और प्रमुख रक्षा साझेदार का दर्जा दिया भी हुआ है.

हिंद महासागर का महत्व

ऑस्टिन के भारत यात्रा से पहले पेंटागन के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि दौरे का मकसद हिंदुस्तान और अन्य देशों के साथ नेटवर्क बढ़ाना और साझेदारी है.

यह पार्टनरशिप हिंद महासागर में हो या प्रशांत महासागर में, अहम है. भारत-अमेरिका रक्षा सहयोग के लिए यूएस इंडो-पेसिफिक कमांड चलाते हैं. इसकी तय जगह पूर्वी हिंद महासागर है. भारत की मुख्य चिंता पश्चिमी हिंद महासागर (जिसमें कि नार्दन अरेबियन सी भी शामिल है) को लेकर है, जहां से कि तेल का बड़ा हिस्सा आता है.

अभी फिलहाल सभी तरह के अभ्यास इंडो-पेसिफिक कमांड के पास हैं. हालांकि, भारतीयों चिंताओं को देखते हुए अब उम्मीद है कि अमेरिका अपनी सेंट्रल कमांड में भारत की गतिविधियों को शामिल करेगा. इसमें बहरीन स्थित पांचवीं फ्लीट भी शामिल है.

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अमेरिका, भारत में लोकतांत्रिक मूल्यों को लेकर क्या कह रहा है?

लॉयड ऑस्टिन के भारत दौरे से पहले यूएस सीनेट फॉरेन रिलेशंस कमेटी के चेयरमैन बॉब मेनेंडेज ने पत्र लिखा. इसमें कहा कि अमेरिका-भारत साझेदारी 21वीं सदी की चुनौतियों का सामना करने के लिए अहम है. संबंध लोकतांत्रिक मूल्यों के पालन के आधार पर होने चाहिए जिससे कि भारत दूर जा रहा है.

सरकार इन शिकायतों को इसलिए नजरअंदाज कर रहा है, क्योंकि उसे पता है कि अमेरिका को इंडो-पैसिफिक यानी हिंद-प्रशांत में भारत की जरूरत है. हालांकि, अब बाइडेन प्रशासन का मुकाबला चीन के साथ लोकतंत्र बनाम सत्तावादी होता जा रहा है.

इसके बाद भी दिल्ली के लिए अच्छा मौका है. हाल ही में अमेरिकी सीनेट में ‘डेमोक्रेसी टेक्नोलॉजी पार्टनरशिप एक्ट’ नाम का एक विधेयक पेश किया है. इस एक्ट के तहत लोकतांत्रिक देशों के साथ साझेदारी और तकनीक विकसित करने पर जोर दिया गया है.

भारत इसमें वो भूमिका निभा सकता जो अभी तक चीन निभाता था. भारत टेक्नोलॉजी में पश्चिम के निवेश की जगह बन सकता है लेकन इसके लिए सरकार को बुनियादी ढांचा उपलब्ध कराने के लिए अभी काफी कुछ करने की आवश्यकता है, सिर्फ नारों से काम नहीं चलेगा.

(लेखक ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन, नई दिल्ली में विशिष्ट फेलो हैं. इस आर्टिकल में छपे विचार लेखक के अपने हैं. इसमें क्विंट का उनसे सहमत होना जरूरी नहीं है.)

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