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शादी का मतलब ये तो नहीं कि आदमी जब भी चाहे, औरत सेक्स करने को राजी हो जाए

Marital Rape को अपराध नहीं मानना चाहिए, इसके समर्थन में क्या दलीलें हैं?

Published
कुंजी
8 min read
शादी का मतलब ये तो नहीं कि आदमी जब भी चाहे, औरत सेक्स करने को राजी हो जाए

क्या आपको पता है कि दो औरतों को चुड़ैल बताकर कभी फांसी की सजा देने वाले इंग्लिश जज (उसकी मौत 1676 में हो गई थी), आज की भारत सरकार, 10 साल पुरानी संसदीय स्थायी समिति और बीवियों को पीटने वाले पतियों के बीच क्या समानताएं हैं?

वे सबके सब एक जादू में विश्वास करते हैं- जिसमें एक आदमी और औरत आग के सामने कुछ चक्कर काट लेते हैं, या किसी और किस्म की रस्म निभा लेते हैं, या कागज के टुकड़े पर दस्तखत कर लेते हैं. और जब यह सब हो जाता है, तो इसका मतलब यह होता है कि औरत, जब भी आदमी चाहे, उसके साथ सेक्स करने को राजी है.

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11 मई, बुधवार को दिल्ली हाई कोर्ट ने मैरिटल रेप (Marital Rape) के अपवाद की संवैधानिकता पर एक बंटा हुआ फैसला सुनाया. जस्टिस राजीव शकधर ने कहा कि धारा 375 की अपवाद संख्या 2 (जिसमें मैरिटल रेप का अपवाद दिया गया है) “संविधान के अनुच्छेद 14, 15, 21 का उल्लंघन है और उसे रद्द कर दिया जाना चाहिए.“

हालांकि जस्टिस सी. हरिशंकर, डिविजन बेंच के दूसरे जज ने इस बात से असहमति जताई और कहा कि इस अपवाद को रद्द करने का अदालत के पास कोई आधार नहीं है. यह अपवाद अनुच्छेद 14 के तहत उचित था और यह विवाह के जरिए बनाए गए अंतर यानी इंटेलिजिबल डिफ्रेंशिया पर आधारित था.

यह अपवाद आईपीसी में 1860 से है जब से उसे लागू किया गया. लॉर्ड मैकाले ने 1839 में क्रिमिनल लॉ के अपने मूल ड्राफ्ट में इस अपवाद को जरूरी बताया था ताकि पति के “वैवाहिक अधिकारों” की रक्षा की जा सके.

यह 1600 शताब्दी के उस ब्रिटिश जज सर मैथ्यू हेल, जिनका ऊपर जिक्र किया गया है, की “कवरचर” की अवधारणा पर आधारित था (कवरचर एक कानूनी सिद्धांत था जिसके तहत, शादी के बाद, एक महिला के कानूनी अधिकार उसके पति के अधिकार में समाहित हो जाते थे). सर हेल का कहना था कि शादी के बाद महिला अपनी एजेंसी को अपने पति को सौंप देती है जिसमें सेक्सुअल इंटरकोर्स के लिए सहमति भी शामिल है.

संसद कई साल पहले इस पुराने, महिला विरोधी कानून से पीछा छुड़ाने से इनकार कर चुकी है. इसके सालों साल बाद दिल्ली हाई कोर्ट इसे असंवैधानिक मान सकता है और इसे रद्द कर सकता है.

वैसे इससे जुड़े हुए कुछ आंकड़े बताना जरूरी है. एनएफएचएस के हाल के आंकड़ों के अनुसार, भारत में 15 से 49 साल के बीच हर तीन में से एक महिला का कहना है कि वे अपने पतियों/पार्टनर की किसी न किसी किस्म की हिंसा की शिकार हुई हैं. लगभग 80 प्रतिशत महिलाओं ने अपने मौजूदा पतियों को दोषी बताया, जबकि 9 प्रतिशत ने अपने पूर्व पतियों को दोषी बताया.

इस अपवाद के क्या मायने हैं?

आईपीसी के सेक्शन 375, जोकि बताता है कि रेप का अपराध क्या है, का अपवाद 2 कहता है:

“एक पुरुष द्वारा अपनी खुद की बीवी, अगर बीवी की उम्र पंद्रह वर्ष से कम नहीं है, के साथ सेक्सुअल इंटरकोर्स या सेक्सुअल एक्ट रेप नहीं है.”
सेक्शन 375, IPC

यानी इसका मतलब यह है कि अगर आप शादीशुदा आदमी हैं और आप अपनी बीवी के साथ, उसकी रजामंदी के बिना सेक्स करने के लिए जोर जबरदस्ती करते हैं, तो ऐसा करने के लिए आप चाहें जो कुछ भी करें, चाहे शारीरिक हिंसा करें या उसे नशा दे दें या उसके माता-पिता की हत्या करने की धमकी दें, वह पुलिस के पास नहीं जा सकती और रेप के अपराध की शिकायत नहीं दर्ज करा सकती.

आजादी के बाद से भारत में रेप के कानूनों में बहुत से बदलाव हुए हैं. लेकिन मैरिटल रेप का अपवाद हमेशा कायम रहा है.

पांच साल पहले 2017 में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि इस सेक्शन में लिखा जाना चाहिए, “अगर बीवी की उम्र अठारह साल से कम नहीं है.” लेकिन वह फैसला यह सुनिश्चित करने तक सीमित था कि आईपीसी का यह सेक्शन सहमति की आयु के अनुरूप हो जो कि 18 वर्ष है, और इसके जरिए बालिगों के मामले में मैरिटल रेप वाले विवाद का हल नहीं निकला था.

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क्या संसद मैरिटल रेप के अपवाद से छुटकारा दिला सकती है

2000 में भारतीय लॉ कमीशन ने यौन हिंसा पर भारतीय कानूनों में सुधार के प्रस्तावों पर विचार किया था. उस समय कमीशन ने इस बात से इनकार किया था कि मैरिटल रेप के अपवाद को हटा दिया जाना चाहिए. कमीशन का कहना था कि "हम इस बात से संतुष्ट नहीं हैं कि इस अपवाद को हटाने की सिफारिश की जानी चाहिए क्योंकि इससे वैवाहिक संबंधों में अत्यधिक दखल हो सकता है."

निर्भया गैंगरेप और हत्या के बाद भारत के रेप कानूनों में संशोधन का प्रस्ताव रखने वाली जस्टिस जेएस वर्मा कमिटी ने भी अपनी तमाम सिफारिशों में मैरिटल रेप के अपवाद को खत्म करने की पेशकश की थी. हालांकि 2013 में संसदीय पैनल ने इस संशोधन को स्वीकार नहीं किया था.

2015 में जब संसद में मैरिटल रेप के बारे में सरकार से सवाल किया गया, तब गृह राज्य मंत्री हरिभाई परथीभाई चौधरी ने जवाब दिया था: "मैरिटल रेप को देश में लागू नहीं किया जा सकता क्योंकि शादी को भारतीय समाज में एक संस्कार या पवित्र माना जाता था."

2017 में केंद्रीय गृह राज्य मंत्री कृष्ण राज ने एक बार फिर कहा कि केंद्र सरकार अपवाद को हटाने के खिलाफ है. उन्होंने इस पर 2013 के संसदीय पैनल के विचारों का हवाला दिया जो यह था कि

"अगर मैरिटल रेप को कानून के तहत लाया जाता है तो पूरी परिवारिक व्यवस्था तनावपूर्ण हो जाएगी."

कुल मिलाकर, मैरिटल रेप को अपराध घोषित करने से सांसदों ने लगातार और जोरदार तरीके से इनकार किया है, और साफ तौर पर दोहराया है कि यह बीवी का कर्तव्य है कि वह पति के साथ सेक्स करे और विवाह की संस्था का मतलब बुनियादी रूप से यह है कि महिला का सहमति का अधिकार खत्म हो जाता है.

क्या मामला है?

यह मामला रिट फाउंडेशन की 2015 की एक याचिका से शुरू हुआ था, जो हाई कोर्ट में अंतिम बहस के चरण में पहुंच चुका है. इसमें यह दलील दी गई है कि यह याचिका भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 का उल्लंघन करती है. यह भी कहा गया है कि इससे छुटकारा पाने का मतलब है, “शादी की संस्था” को खतरा हो जाएगा. दूसरी तरफ अदालत की तरफ से नियुक्त किए गए दोनों एक्सपर्ट्स ने कहा कि इस अपवाद को खत्म ही होना चाहिए.

अब जिंदगी में ऐसी कुछ बातें जरूर होती हैं जिनके दोतरफा तर्क नहीं हो सकते, क्योंकि इन बातों के साथ जो समस्याएं होती हैं, जो बहुत स्पष्ट होती हैं.

मैरिटल रेप वाला अपवाद ऐसा ही है. हां, हो सकता है कि इसके लिए कुछ सेफगार्ड्स लगाए जाएं ताकि यह सुनिश्चित हो कि इसे हटाने से, इसका दुरुपयोग नहीं होगा (जो कि जरूरी नहीं, कि कोई बड़ी समस्या होगी).

लेकिन इससे परे, क्या वास्तव में उस कानूनी प्रावधान का बचाव करना संभव है जो मूल रूप से कहता है कि पति का अपनी पत्नी के साथ जोर जबरदस्ती करना सही है?

जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़ ने धारा 377 पर अपने फैसले में कहा था कि अदालतें पुरानी दलीलों का सहारा नहीं ले सकतीं, ताकि इस बात को अनदेखा कर दिया जा सके कि कैसे एक कानून भेदभावपूर्ण और दमनकारी हो सकता है और लोगों के साथ अलग व्यवहार कर सकता है.

अनुच्छेद 14, जोकि कानून के आगे सभी के साथ समान व्यवहार की गारंटी देता है- के उल्लंघन पर विचार करते समय भी इस पर सोचा जाना चाहिए. परंपरागत रूप से इसका आकलन दो आयामी परीक्षण (टू प्रॉन्ग्ड टेस्ट) के लिहाज से किया गया है जिसमें विधायिका के मंतव्य को देखा जाता है.

यह कि मैरिटल रेप का अपवाद शादीशुदा महिलाओं के मूलभूत अधिकार का उल्लंघन करता है, बहुत साफ नजर आता है.

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यह अपवाद किसी पुरुष से ब्याही गई महिला और ब्याही नहीं गई महिला, दोनों के साथ अलग-अलग व्यवहार करता है- एक जैसे कृत्य के लिए भी, जोकि सहमति के बिना बना यौन संबंध है. इन दोनों औरतों के बीच एक ही फर्क है- उनकी वैवाहिक स्थिति. इसके अलावा वैवाहिक स्थिति और जिसे बलात्कार कहा जाता है, उनके बीच कोई तार्किक संबंध नहीं है, इसलिए अनुच्छेद 14 का उल्लंघन होता है.

क्या ऐसे कोई कारण हें जिनके चलते हाई कोर्ट अपवाद को रद्द नहीं कर सकता

बदकिस्मती से, भले ही मैरिटल रेप का अपवाद बहुत भयानक है लेकिन जरूरी नहीं कि दिल्ली हाई कोर्ट या यहां तक सुप्रीम कोर्ट भी इसे रद्द कर सकें, तकनीकी रूप से देखा जाए तो.

मैरिटल रेप के अपवाद का समर्थन करने वालों ने हाई कोर्ट में सुनवाई के दौरान कई ऐतराज जताए. उनका कहना था कि प्रक्रियागत कारणों के चलते इस अपवाद से छुटकारा नहीं पाया जा सकता:

  1. विधायिका को नीतिगत मुद्दों को तय करना होता है, और सभी कानूनों को संवैधानिक मानकर चला जाता है. इसलिए अगर वे यह कहना चाहते हैं कि वैवाहिक संबंधों की वजह से किसी पुरुष द्वारा किसी महिला के बलात्कार को अलग तरीके से देखा जाए तो अदालत को दखल नहीं देना चाहिए. बेहतर यह होगा कि इस विषय पर संसद अपने तरीके से, अपने समय से, और अपने विवेक के आधार पर फैसला ले.

  2. अपवाद को खत्म करने से एक नए अपराध का निर्माण करना होगा, यानी पति द्वारा अपनी पत्नी का रेप, जो कि अदालत नहीं कर सकती, और इसलिए इसे खत्म नहीं किया जा सकता. या अदालत को पूरा सेक्शन ही रद्द करना होगा, जोकि जाहिर तौर से, मुमकिन नहीं है.

अब, पहली दलील मानी नहीं जा सकती, कानून की भाषा में कहें तो. चूंकि संविधान से पहले बने कानूनों, जैसे आईपीसी को संवैधानिकता का लाभ नहीं मिल सकता, यानी बेनेफिट ऑफ प्रीजम्पशन नहीं मिल सकता. जैसा कि सुप्रीम कोर्ट ने हाल के दिनों में कहा भी है. इसके अतिरिक्त चाहे विधायिका कानूनी प्रावधान की समीक्षा करने की योजना बना रही हो या नहीं, संवैधानिक अदालतों के पास अभी भी कानून को असंवैधानिक घोषित करने का अधिकार है, यदि यह मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता है.

जहां तक दूसरी दलील का सवाल है, अब यह बड़ा मामला है, खासकर जब एक जज ने संकेत दिया है कि इसे लेकर वह कुछ चिंतित हैं.

लेकिन अपवाद को हटाना एक नए अपराध का निर्माण करना नहीं है, यह केवल रेपिस्ट्स के एक वर्ग को मिली इम्युनिटी को खत्म करना है, जैसा कि सीनियर एडवोकेट रेबेका जॉन का कहना है. रेबेका जॉन को हाई कोर्ट ने एमिकस क्यूरी के रूप में नियुक्त किया गया था.

धारा 375 की भाषा बहुत सरल है, और यह साबित करने के लिए कि सहमति के बिना किया गया सेक्सुअल एक्ट रेप नहीं होता, आपको बाल की खाल निकालनी होगी. यह भी बताना होगा कि यह अपवाद, इस सामान्य नियम का भी अपवाद है.

इस तरह की इम्युनिटी को हटाना, किसी नए अपराध का निर्माण करना नहीं है, जैसा कि हाउस ऑफ लॉर्ड्स ने अपने 1991 के फैसले में इंग्लैंड और वेल्स में मैरिटल रेप के अपवाद से छुटकारा पाते वक्त कहा था (जिसे वहां अलग तरह से लिखा गया था - वास्तव में, वहां सीधी भाषा में इसे अपराध घोषित किया गया और अपवाद के रूप में नहीं लिखा गया.)

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जब 2017 में भारत के सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह अपवाद तब लागू नहीं हो सकता है यदि पत्नी की उम्र 15-18 वर्ष है, तो उसने विशेष रूप से कहा था कि यह एक नए अपराध का निर्माण नहीं है.

मैरिटल रेप के अपवाद के समर्थक और कुछ नहीं, बाल की खाल ही निकाल रहे हैं. और कुछ ऐसे तर्क देने की कोशिश कर रहे हैं:

• अपवाद को खत्म करने से विवाह की संस्था को ही खतरा हो जाएगा (हां- बिल्कुल क्योंकि शादी का यही मतलब है, एक आदमी को अपनी बीवी से रेप करने की कानूनी मंजूरी मिल जाए).

• जब लोग एक साथ रह रहे हों तो सहमति का पता लगाना मुश्किल होता है, इसलिए एक महिला अपने पति पर रेप का आरोप लगाने के लिए इसका दुरुपयोग कर सकती है (हां- बिल्कुल क्योंकि असली दुरुपयोग को रोकने के लिए कुछ सेफगार्ड्स नहीं लगाए जा सकते, और क्योंकि इतनी सारी महिलाएं रेप के झूठे आरोप लगाकर अपनी शादियों को तबाह करना चाहती हैं).

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