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मिट्टी के बर्तन में खाना पकाना अच्छा होता है? सुझाव और सावधानियां

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Fit Hindi
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मिट्टी के बर्तन में खाना पकाना अच्छा होता है? सुझाव और सावधानियां

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क्या आपको गर्मियों में सुराही के पानी का स्वाद याद है? इसने न केवल आपकी प्यास बुझाई, बल्कि आपका दिल भी खुश कर दिया. फ्रिज के पानी के मुकाबले मिट्टी के बर्तन में रखे ठंडे पानी में अंदर से कुछ ज्यादा तृप्ति महसूस होती है. मिट्टी के बर्तनों का इस्तेमाल न सिर्फ पानी रखने के लिए किया जाता है, बल्कि खाना पकाने के लिए भी किया जाता है. हांडी चिकन का स्वाद कढ़ाई चिकन से बेहतर होता है.

मिट्टी के बर्तन अरसे से भारतीय घरों का हिस्सा रहे हैं. आज भी छोटे कस्बों और शहरों में लोग मिट्टी के तवे पर खाना पकाते हैं. मिट्टी के बर्तन में खाना पकाने की वापसी हो रही है और अब बड़े शहरों में भी कई दुकानों पर मिट्टी के बर्तन बिक रहे हैं.

विशेषज्ञों का दावा है कि 12,000-20,000 साल पहले पूर्वी एशिया में मिट्टी के बर्तनों का आविष्कार हुआ था. और मिट्टी के खास गुणों की वजह से दुनिया भर में सभी सभ्यताओं में खाना पकाने के लिए मिट्टी के बर्तन का इस्तेमाल किया जाता रहा है, जो नरम और ज़ायकेदार खाना पकाने के लिए धीरे-धीरे गर्मी और नमी को फैलाते हैं.

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मिट्टी के बर्तन में क्यों पकाएं खाना?

मिट्टी अल्कलाइन है और खाने में एसिड के संपर्क में आने के बाद यह पीएच को संतुलित करता है और जिससे खाना आयरन, फॉस्फोरस, कैल्शियम और मैग्नीशियम से समृद्ध होता है.
(फोटो: iStock)

मिट्टी के बर्तन ताप-रोधी होते हैं और धीरे-धीरे खाना पकाते हैं. ज़ायका बढ़ाने के साथ ही इसके कई स्वास्थ्य लाभ हैं. मिट्टी अल्कलाइन (क्षारीय) है और खाने में एसिड (अम्ल) के संपर्क में आने के बाद यह पीएच को संतुलित करता है, जिससे खाना आयरन, फॉस्फोरस, कैल्शियम और मैग्नीशियम से समृद्ध होता है.

इसके तमाम फायदे हैं:

  1. धीमी गति से और एक समान पकना
  2. छोटे छेद और ऊष्मारोधी गुण
  3. मेटल और अन्य बर्तनों की तुलना में नमी और पोषक तत्वों का कम नुकसान
  4. पोषक गुणों को बनाए रखता है
  5. कम तेल लगता है जिससे यह सेहतमंद होता है
  6. खाना जलने से रोकता है. नौसिखिये भी आराम से खाना पका सकते हैं
  7. खाने का ज़ायका बढ़ाता है
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मिट्टी के बर्तन की खरीदारी

कल्पवृक्ष फार्म्स की संस्थापक कल्पना मणिवन्नन की सलाह है कि बिना दरार वाले मोटे और भारी बर्तन खरीदें. वह सुझाव देती हैं कि मिट्टी के बर्तन की गुणवत्ता की जांच के लिए बर्तन को पलटें और उंगली से थपथपा कर देखें. अगर मेटल जैसी साफ ‘टुंग’ आवाज आती है, तो यह बर्तन अच्छा है.

खुरदुरा दिखने वाला बर्तन खरीदें क्योंकि बिना ट्रीटमेंट वाले बर्तन अपनी छेद वाली गुणवत्ता को बनाए रखते हैं और स्वास्थ्य लाभ देते हैं. चमकीले मिट्टी के बरतन में, छेद बंद हो जाते हैं और ऐसी कोटिंग इन बर्तनों में खाना पकाने के मकसद को नाकाम बना देती है.

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मिट्टी के बर्तन को खाना पकाने के लिए तैयार करना

मिट्टी के बर्तन में तेल लगाएं
(फोटो: iStock)

मिट्टी का बर्तन खरीदने के बाद इसे पानी से अच्छी तरह धो लें. साबुन का इस्तेमाल न करें. इसे साफ करने के लिए चावल का पानी, चने का बेसन या नमक का इस्तेमाल किया जा सकता है. फिर बर्तन को 5-6 घंटे या रात भर पानी में भिगो दें. निकालें और अच्छी तरह सुखा लें. इसे धूप या हवा में सूखने के लिए रख दें. लंबे समय तक असर कायम रखने के लिए पानी में भिगोने की यह प्रक्रिया दो बार दोहराएं.

अगला कदम बर्तन को खाना पकाने के इस्तेमाल में लाने के लिए तैयार करना है.

तेल (तिल, नारियल या खाना पकाने का तेल) की भरपूर लेप लगाएं. अंदर और बाहर दोनों तरफ पूरी तरह लेप लगाएं और इसे 4-5 घंटे या रात भर के लिए छोड़ दें. अब इस बर्तन को लें और धीरे से पानी से धो लें. आपका मिट्टी का बरतन सीज़न हो गया है और इस्तेमाल के लिए तैयार है.

जबलपुर की दगनी सोल ने 5 साल पहले मिट्टी के बर्तन में खाना पकाना शुरू किया क्योंकि उन्हें लगता था कि यह खाना पकाने का सबसे सेहतमंद तरीका है. उन्होंने स्थानीय बाजारों से मिट्टी के बर्तन खरीदे. वह बताती हैं, “मुझे काले बर्तन पसंद हैं. मुझे लगता है कि काले बर्तन लंबे समय तक चलते हैं और ज्यादा मजबूत होते हैं.”

वह सीज़निंग के लिए नए बर्तन तीन दिन पानी में भिगोती हैं और फिर पानी निकाल कर सूखने के लिए रख देती हैं. एक बार सूख जाने पर, वह उसमें पानी भर देती हैं और उसे धीमी आंच पर तब तक रखती हैं, जब तक पानी उबल न जाए. वह फिर उसे आंच से उतार लेती हैं और ठंडा होने देती हैं. अगले दिन वह चावल पकाती हैं. तब बर्तन किसी भी तरह का खाना पकाने के लिए तैयार हो जाता है. वह ज़ायकेदार खाना पकाने के लिए माइक्रोवेव में भी मिट्टी के बर्तनों का ही इस्तेमाल करती हैं.

खाना पकाते समय ध्यान रखें कि जब खाना 60-70% पक जाए तो गैस बंद कर दें. आंच बंद होने के बाद भी खाना पकाने के लिए बर्तन काफी गर्म रहता है.

जब आप खाना पकाना शुरू करते हैं, तो धीमी आंच पर बर्तन को गर्म होने दें. एक बार जब यह काफी गर्म हो जाए (8-10 मिनट के बाद), पेपर टॉवेल से अंदरूनी सतह को साफ कर लें और फिर खाने की नमी के हिसाब से इसमें तेल डालें. अगर आप आंच को धीमा रखती हैं, तो ज्यादातर सब्जियां ठीक से पक जाएंगी. मिट्टी के बर्तन पकाने के लिए ज्यादा नमी का इस्तेमाल करते हैं.

शुरू में, पहले कुछ इस्तेमाल के दौरान मिट्टी के बर्तनों में तड़का न लगाएं क्योंकि तड़के के लिए तेल को एक निश्चित तेज तापमान पर ले जाने की जरूरत होती है और शुरू में मिट्टी के बर्तन को इस तरह तेज तापमान पर रखना अच्छा नहीं है.
कल्पना मणिवन्नन, संस्थापक, कल्पवृक्ष फार्म्स

वह कहती हैं, यह सलाह केवल शुरुआती खाना पकाने पर लागू होती है. एक बार जब नियमित रूप से इस्तेमाल में आ जाता है, तो आप सीधे मिट्टी के बर्तनों में तड़का लगाना शुरू किया जा सकता है.

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सुझाव और सावधानियां

  • मिट्टी के बर्तनों को हमेशा हाथ से धोना चाहिए. प्राकृतिक फाइबर स्क्रब से खाने के हिस्से को हटाने के लिए गर्म पानी का इस्तेमाल करें.
  • केमिकल डिटर्जेंट का इस्तेमाल करने से बचें क्योंकि बारीक छेद साबुन को सोख सकते हैं और खाने में साबुन का ज़ायका मिला सकते हैं. बहुत ज्यादा घिसने से हमेशा बचना चाहिए.
  • किसी भी पारंपरिक बर्तन के मुकाबले मिट्टी के बर्तन को गर्म होने में करीब 15- 20 मिनट ज्यादा समय लगता है.
  • गर्म बर्तन में कभी भी ठंडा पानी या मसाले का ठंडा पेस्ट न डालें क्योंकि इससे दरारें पड़ सकती हैं और बर्तन चटक भी सकता है. बर्तन को बहुत तेज गर्म न करें.
  • अगर मिट्टी का बर्तन चिपचिपा हो जाता है, तो बेकिंग सोडा से धीरे से घिसें करें और बारीक छेदों को खोलने के लिए इसे पानी में आधे घंटे तक उबालें.
  • जब बर्तन इस्तेमाल में नहीं है तो हमेशा तेल की परत लगा कर रख दें. यह बर्तन को सीज़न करने में मदद करता है और नॉन-स्टिक गुण को भी बनाए रखता है. अगर आपके बर्तन में रिसने के संकेत दिख रहे हैं, तो इसे बदलने का समय आ गया है.

आदतों में बदलाव के लिए सब्र और निरंतरता की जरूरत होती है. केवल एक बर्तन के साथ धीरे-धीरे बदलाव से शुरुआत करें. शुरू में, आपको मिट्टी के बर्तन में खाना बनाना उलझाऊ काम लग सकता है, लेकिन बार-बार करने से यह आसान हो जाएगा.

स्वास्थ्य लाभ के साथ अपने खाना पकाने में ज़ायके के फर्क का अनुभव करने के लिए इसे आजमाएं.

(नूपुर रूपा एक स्वतंत्र लेखिका और मांओं के लिए लाइफ कोच हैं. वह पर्यावरण, फूड, इतिहास, पेरेंटिंग और ट्रैवेल पर लेख लिखती हैं.)

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