मणिकर्णिका की वीरता को घर-घर तक पहुंचाने वाली सुभद्रा कुमारी चौहान

सुभद्रा जी राष्ट्रीय चेतना के अलावा सामजिक चेतना की भी एक सजग साहित्यकार और स्वाधीनता सेनानी थीं. 

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सुभद्रा जी राष्ट्रीय चेतना के अलावा सामजिक चेतना की भी एक सजग साहित्यकार  थीं
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"खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी...." बचपन से अनगिनत बार पढ़ी और सुनी गई इन पंक्तियों से जितनी बार वास्ता पड़ता है, शरीर में एक लहर सी दौड़ जाती है. रानी लक्ष्मीबाई की जगजाहिर वीरता को वीर रस की शैली में बेहद खूबसूरती से शब्दों में पिरोकर लिखने वाली कवयित्री थीं सुभद्रा कुमारी चौहान.

सुभद्रा कुमारी चौहान बचपन से ही कविता लिखने लगी थीं. महज 9 साल की उम्र में उन्होंने अपनी पहली कविता 'नीम' लिख डाली. ये कविता 'मर्यादा' नाम की पत्रिका में छपी थी. उनकी कविताओं ने उन्हें पूरे स्कूल में मशहूर बना दिया था. हालांकि उनकी पढ़ाई नौवीं क्लास के बाद छूट गई, लेकिन इससे साहित्य में उनकी पकड़ कहीं से भी कम न हो पाई. स्कूली शिक्षा पूरी न होने के बावजूद उनकी रचनाओं में यह अभाव जरा भी नहीं दिखता.

वातावरण चित्रण-प्रधान शैली में लिखी गई उनकी सबसे लोकप्रिय कविता 'झांसी की रानी' की भाषा जितनी सरल है, उतनी ही ओजपूर्ण और प्रभावशाली भी:

सिंहासन हिल उठे, राजवंशों ने भृकुटी तानी थी,

बूढ़े भारत में भी आई फिर से नयी जवानी थी,

गुमी हुई आजादी की कीमत सबने पहचानी थी,

दूर फिरंगी को करने की सबने मन में ठानी थी,

चमक उठी सन सत्तावन में

वह तलवार पुरानी थी।

बुंदेले हरबोलों के मुंह

हमने सुनी कहानी थी।

खूब लड़ी मर्दानी वह तो

झांसी वाली रानी थी॥

पूरी कविता पढ़ने से पता चलता है कि इसकी एक-एक पंक्ति मानो झांसी की रानी की वीरगाथा का आंखों देखा हाल बयां कर रही है.

सुभद्रा कुमारी चौहान का जन्म 16 अगस्त, 1904 को इलाहाबाद के निहालपुर गांव में हुआ था. देशभक्ति की निर्भीक अभिव्यक्ति से साहित्य में खास जगह बनाने वाली सुभद्रा राजनीति में भी सक्रिय रहीं. वो कांग्रेस की कार्यकर्ता थीं और स्वाधीनता संग्राम में कई बार जेल गईं. उनका विवाह मध्य प्रदेश के खंडवा निवासी ठाकुर लक्ष्मण सिंह के साथ हुआ. पति के साथ वो महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन से जुड़ गईं. यही वजह है कि उनकी रचनाओं में देशभक्ति की धार बखूबी नजर आती है. स्वतंत्रता संघर्ष के दौरान उन्होंने अपनी कविताओं के जरिए आज जनमानस में शौर्य और वीरता की प्रेरणा की तस्वीर खड़ी की.

उस वक्त में जब देश गुलाम था तब अंग्रेजों के दमन के खिलाफ बगावत को शब्दों में गढ़कर उसे सशक्त आवाज बनाने में उनकी अहम भूमिका रही.

उनकी कविता 'जालियांबाग में बसंत' की एक झलक देखिए:

यहां कोकिला नहीं, काग हैं शोर मचाते,

काले-काले कीट, भ्रमर का भ्रम उपजाते।

कलियां भी अधखिली, मिली हैं कंटक-कुल से,

वे पौधे, व पुष्प शुष्क हैं अथवा झुलसे।

परिमल-हीन पराग दाग सा बना पड़ा है,

हां! यह प्यारा बाग खून से सना पड़ा है।

ओ, प्रिय ऋतुराज! किन्तु धीरे से आना,

यह है शोक-स्थान यहां मत शोर मचाना।

सुभद्रा जी राष्ट्रीय चेतना के अलावा सामजिक चेतना की भी एक सजग साहित्यकार थीं. अपनी रचनाओं से उन्होंने देशभक्ति की अलख जगाने के अलावा अशिक्षा, अंधविश्वास, जातिप्रथा, छुआछूत, नारी शोषण जैसी सामाजिक विसंगतियों पर भी प्रहार किया है. उनकी कविता ‘प्रभु तुम मेरे मन की जानो’ की बानगी देखिए:  

मैं अछूत हूं, मंदिर में आने का मुझको अधिकार नहीं है।

किंतु देवता यह न समझना, तुम पर मेरा प्यार नहीं है॥

तुम सबके भगवान, कहो मंदिर में भेद-भाव कैसा?

हे मेरे पाषाण! पसीजो, बोलो क्यों होता ऐसा?

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रचनाएं-

‘बिखरे मोती’ उनका पहला कहानी संग्रह है. इसमें भग्नावशेष, होली, पापीपेट, मंझलीरानी, परिवर्तन, दृष्टिकोण, कदम के फूल, किस्मत, मछुये की बेटी, एकादशी, आहुति, थाती, अमराई, अनुरोध, व ग्रामीणा कुल 15 कहानियां हैं. सुभद्रा जी की कहानियों की भाषा सरल बोलचाल की भाषा है. अधिकांश कहानियां नारी विमर्श पर केंद्रित हैं.

‘उन्मादिनी’ शीर्षक से उनका दूसरा कथा संग्रह 1934 में छपा. इस में उन्मादिनी, असमंजस, अभियुक्त, सोने की कंठी, नारी हृदय, पवित्र ईर्ष्या, अंगूठी की खोज, चढ़ा दिमाग, व वेश्या की लड़की कुल 9 कहानियां हैं. इन सब कहानियों में मोटे तौर पर सामाजिक बुराइयों पर ही चोट की गई है.

'सीधे साधे चित्र' सुभद्रा कुमारी चौहान का तीसरा व आखिरी कथा संग्रह है. इसमें कुल 14 कहानियां हैं. इन कहानियों में नारी से जुड़ी पारिवारिक सामाजिक समस्यायें हैं.

सुभद्रा जी ने करीब 88 कविताओं और 46 कहानियों की रचना की.

15 फरवरी 1948 को बसंत पंचमी के दिन एक सड़क दुर्घटना में उनका निधन हो गया.

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