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'मेरे पिता को उसने मार डाला जिसकी वह मदद करते थे', प्रतापगढ़ में मौलाना की हत्या क्यों हुई?

"पिताजी ने हमेशा उसकी मदद की और उसे संदेह का लाभ दिया. आज, उसने जमीन के एक टुकड़े के लिए उनकी हत्या कर दी."

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(चेतावनी: इस स्टोरी में हिंसा का जिक्र है, पाठक अपने विवेक का इस्तेमाल करें)

उत्तर प्रदेश (Uttar Pradesh) के प्रतापगढ़ में जमीयत उलमा-ए-हिंद के महासचिव और जाने-माने धर्मगुरु मौलाना फारूक (67 साल) की शनिवार, 8 जून को सोनपुर गांव में निर्मम हत्या कर दी गई. इस वारदात के बाद गांव में तनाव फैल गया. ग्रामीण 'तत्काल न्याय' और आरोपियों की गिरफ्तारी की मांग कर रहे हैं.

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उनके एक बेटे, मुफ्ती मामून ने द क्विंट को बताया:

"हमारा आरोपी के साथ पहले कभी कोई विवाद या झगड़ा नहीं हुआ था. वह अक्सर हमारे घर आता था. यहां तक ​​कि रमजान के दौरान भी उसने हमसे कहा था कि उसे मदद की जरूरत है, इसलिए हमने उसे अनाज दिया ताकि वह अपने परिवार का पेट भर सके."

फारूक कादीपुर गांव में मदरसा चलाते थे और मुख्य आरोपी चंद्रमणि तिवारी के मददगार थे. इस बीच बड़ा सवाल है कि अचानक ऐसा क्या हुआ कि तिवारी ने मुस्लिम मौलवी की हत्या कर दी?

तमाम अटकलों के बीच मौलान फारूक के बेटे ममून ने बताया कि दोनों के बीच क्या हुआ था?

फारूक ने बताया कि शनिवार की सुबह तिवारी ने मुस्लिम धर्मगुरु को मिलने के लिए बुलाया था. चूंकि फारूक और उनका परिवार नियमित रूप से तिवारी को काम में और वित्तीय मदद करता था, इसलिए उन्हें किसी गड़बड़ी का संदेह नहीं था.

'सिर पर कुल्हाड़ी और लोहे की रॉड से किया वार'

ममून ने बताया कि तिवारी ने उनसे जमीन के एक टुकड़े के बारे में पूछा. उसने मेरे पिता को कुर्सी पर बैठाया और जमीन का बंटवारा करने को कहा. "जमीन का यह टुकड़ा अब तक कभी विवाद का विषय नहीं रहा था."

"अगले ही पल, आरोपी ने उनके सिर पर कुल्हाड़ी और लोहे की रॉड से जोरदार वार किया और उन्हें मार डाला. उनके सिर से बहुत खून बह रहा था. वह इतना उग्र क्यों हो गया? जमीन का इस्तेमाल सिर्फ उसके फायदे के लिए किया जा रहा था और मेरे पिता यह देखने गए थे कि उसे मदद की जरूरत है या नहीं."
मौलाना के बेटे मुफ्ती मामून

मामून ने आगे बताया कि जब भी तिवारी को किसी चीज की जरूरत होती थी, तो वह कहता था, 'खेत अलग करना है', और फिर उन चीजों के बारे में बात करने लगता था जिनकी उसे वास्तव में जरूरत होती थी और मेरे पिता उसे संदेह का लाभ देते हुए उसकी मदद करते थे.

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10 साल पहले मौलाना के परिवार ने '10 बिस्वा' जमीन (करीब 13,500 वर्ग फीट) खरीदी थी. यह जमीन चुपचाप तिवारी के पास छोड़ दी गई थी ताकि वह अपने परिवार का भरण-पोषण कर सके. दरअसल, दिहाड़ी मजदूर तिवारी ने फारूक से 8 लाख रुपए का कर्ज भी लिया था. उसकी आर्थिक स्थिति को जानते हुए मौलवी ने उसे कहा था कि वह इसकी चिंता न करे और जब भी संभव हो, कर्ज चुका दे.

दूसरी ओर, मामून ने यह भी स्पष्ट किया कि इस घटना में कोई "सांप्रदायिक एंगल" नहीं है, "हालांकि कुछ लोग कह रहे हैं कि इसके पीछे कोई सांप्रदायिक कारण हो सकता है, लेकिन मुझे ऐसा नहीं लगता. क्या उसने किसी के कहने पर उनकी हत्या की, ये मैं अभी नहीं जानता हूं."

फारूक की हत्या के बाद इलाके में बवाल मच गया. तनाव को देखते हुए न केवल प्रतापगढ़ बल्कि आसपास के इलाकों से भी पुलिस बल को बुलाना पड़ा.

फारूक के बेटे ने कहा कि भले ही डीएम कह रहे हों कि वहां करीब 50,000 लोगों की भीड़ थी, लेकिन ऐसा नहीं है. हत्या के खिलाफ ग्रामीणों के विरोध-प्रदर्शन के बावजूद किसी ने कानून-व्यवस्था नहीं तोड़ी.

द क्विंट से बात करते हुए एसएचओ धर्मेंद्र सिंह ने कहा, "यह न तो किसी संपत्ति का विवाद है और न ही कोई सांप्रदायिक मामला है. आरोपी ने आरोप लगाया है कि उसने एडवांस में कुछ पैसे दिए थे, जो वो वापस मांग रहा था."

SHO ने कहा कि FIR वारदात के दिन ही दर्ज कर ली गई थी, इसमें पांच लोगों के खिलाफ आईपीसी की धारा 302 (हत्या के लिए सजा) जैसे आरोप शामिल हैं. उन्होंने बताया, "दो लोगों को गिरफ्तार कर लिया गया है, देवी प्रसाद और तिवारी की पत्नी सीता, जबकि अन्य तीन की तलाश जारी है."

इससे पहले, प्रतापगढ़ के एसपी सतपाल अंतिल ने मीडिया से बात करते हुए कहा कि फारूक का शव उसी दिन पोस्टमॉर्टम के लिए भेज दिया गया था.

उन्होंने बताया कि इस बीच, परिवार के लोगों ने अपनी सुरक्षा, नौकरी और आरोपियों के खिलाफ जल्द से जल्द कार्रवाई की मांग की है.

पुलिस और प्रशासन के वरिष्ठ अधिकारियों ने गांव का दौरा किया है. इलाके में सुरक्षा कड़ी कर दी गई है. दूसरी ओर, मौलवी की हत्या के बाद से परिवार और गांव में शोक का माहौल है.

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