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इस खरीफ सीजन धान की 17% कम रोपाई, क्या और बढ़ जाएगी महंगाई?

भारत में धान का रकबा पिछले साल 155.3 लाख हेक्टेयर था जो अब 128.5 लाख हेक्टेयर रह गया है.

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देश के कई हिस्सों में इस बार मानसूनी (Monsoon) बारिश में कमी देख गई है. इसका किसानों (Farmer) पर भी असर पड़ा है और खरीफ की फसलों में जहां दालों का रकबा बढ़ा है तो वहीं धान की रोपाई पिछले साल के मुकाबले करीब 17 प्रतिशत कम हुई है. लेकिन इसकी वजह अकेली बारिश नहीं है. धान के घटते रकबे के कई और कारण भी हैं, जो हम इस स्टोरी में नीचे आपके सामने रखेंगे.

लेकिन यहां सवाल ये है कि 17 प्रतिशत कम अगर धान की बुवाई हुई है तो जाहिर है धान की पैदावार भी कम होगा. तो क्या इससे आने वाले वक्त में धान चावल महंगा होगा और क्या ये कमी किल्लत में बदल सकती है.
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खरीफ फसल का हाल?

कृषि मंत्रालय के मुताबिक, पिछले साल के मुकाबले इस साल धान की अब तक करीब 17.4 प्रतिशत कम बुवाई हुई है. इसके अलावा तुर भी पिछले साल के मुकाबले 20.2 प्रतिशत कम बोया गया है. उधर मूंग 31.3 प्रतिशत ज्यादा बोई गई है. कपास का रकबा भी पिछले साल के मुकाबले 6.4 प्रतिशत बढ़ा है. गन्ने की बुवाई भी इस बार थोड़ा कम हुई है. इसके रकबे में 0.7 प्रतिशत की मामूली गिरावट आई है. उड़द भी इस बार 7.8 फीसदी ज्यादा बोया गया है. इसके अलावा मोटे अनाज की बुवाई भी 15.7 फीसदी ज्यादा हुई है.

इन सबमें धान की फसल को लेकर थोड़ा मुश्किल है जिसका रकबा पिछले साल 155.3 लाख हेक्टेयर था जो अब 128.5 लाख हेक्टेयर रह गया है.
भारत में धान का रकबा पिछले साल 155.3 लाख हेक्टेयर था जो अब 128.5 लाख हेक्टेयर रह गया है.
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धान की कम पैदावार से बढ़ेगी महंगाई?

बिजनेस स्टैंडर्ड ने अर्थशास्त्री युविका सिंघल के हवाले से लिखा है कि, पिछले साल की तुलना में धान का रकबा काफी घटा है. युविका सिंघल कहती हैं कि, इसके अलावा रिपोर्ट्स के मुताबिक सरकार के पास गेहूं का स्टॉक भी खत्म हो रहा है. उधर सरकार की प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना सितंबर 2022 तक चलने वाली है. अगर चावल की पैदावारा में गिरावट आई तो ये गेहूं और चावल दोनों की कीमतों पर असर डालेगा. जो आगे चलकर महंगाई को बढ़ावा दे सकता है.

हरियाणा के करनाल जिले में डिप्टी डायरेक्टर एग्रीकल्चर आदित्य डबास ने क्विंट से कहा कि, एक साल में कम पैदावार से मुझे नहीं लगता कि बहुत असर पड़ेगा. क्योंकि हमारे पास चावल सरप्लस है और हम दालें बाहर से मंगाते हैं. अगर दाल की पैदावार बढ़ेगी तो इनके रेट पर भी असर पड़ेगा. कहीं ना कहीं ये बैलेंस का काम करेगा. लेकिन अगर लगातार पैदावार में गिरावट होती रही तो दिक्कत आ सकती है. क्योंकि चावल बड़ी मात्रा में लोग खाते हैं. हमारे यहां से काफी बासमती एक्सपोर्ट भी होती है. तो ये एक सवाल जरूर है कि कहीं किसान हर साल धान की खेती से हटते ना रहें.

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इस बार कम क्यों लगाया गया धान?

हरियाणा के करनाल जिले में डिप्टी डायरेक्टर एग्रीकल्चर आदित्य डबास ने क्विंट से बताया कि, कम बारिश के साथ-साथ धान की कम रोपाई के कई और कारण भी है. उन्होंने कहा कि,

धान की फसल में लेबर का काफी बड़ी संख्या में इस्तेमाल होता है. लेकिन अब लेबर काफी महंगी हो गई है. इसके अलावा कीटनाशक भी महंगे होते जा रहे हैं. जिसने धान की फसल की लागत को काफी बढ़ा दिया है. ऐसे में अगर बारिश कम होती है तो लागत और ज्यादा बढ़ जाती है.

आदित्य डबास ने आगे कहा कि, अगर हम दलहन फसलों के मुकाबले धान की खेती को देखें तो इससे आधे से भी कम लागत दलहनी फसलों में आती हैं. उन्होंने हरियाणा का उदाहरण देते हुए कहा कि, हरियाणा में धान की नर्सरी से लेकर और मंडी तक पहुंचाने तक में करीब 20 हजार रुपये प्रति एकड़ लागत आती है. लेकिन अगर आप इसकी जगह मूंग की खेती करते हैं तो उसका एक एकड़ में मुश्किल से 8-9 हजार का खर्चा आता है. अब दलहनों का रेट भी अच्छा मिल रहा है और धान की एमएसपी कोई खास बढ़ नहीं रही है.

इसके अलावा कई प्रदेशों में सरकारें भी चाहती हैं कि किसान धान की खेती छोड़कर दूसरी फसलों की ओर रुख करें क्योंकि वहां पानी की किल्लत है और वाटर लेवल कम हो रहा है. जैसे अगर आप हरियाणा में धान की खेती छोड़कर कुछ और खेती को अपनाते हैं तो हरियाणा सरकार 7 हजार रुपये एकड़ सब्सिडी देती है.

भारत में धान का रकबा पिछले साल 155.3 लाख हेक्टेयर था जो अब 128.5 लाख हेक्टेयर रह गया है.
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किसानों की आमदनी पर क्या असर?

सवाल तो ये भी है कि धान की कम पैदावार से किसानों की आमदनी पर क्या असर पड़ेगा. अगर धान कम पैदा हुआ और रेट ज्यादा बढ़ गए. तो जिन किसानों ने धान छोड़कर दूसरी फसल लगाई है वो घाटे का सामना कर सकते हैं. इसके अलावा अगर उन्होंने बिल्कुल भी धान नहीं लगाया है तो खाने के लिए महंगे दामों में खरीदना पड़ सकता है.

भारत की अर्थव्यवस्था में चावल की हिस्सेदारी?

भारत दुनिया में दूसरा सबसे बड़ा चावल उत्पादक देश है, लेकिन बासमती एक्सपोर्ट के मामले में भारत नंबर वन पर है. भारत ने साल 2019-20 के मुकाबले 2020-21 में ज्यादा बासमती चावल निर्यात किया था. दरअसल 2020 में भारत ने 9.49 मिलियन टन बासमती और गैर बासमती चावल निर्यात किया था. जिसकी कीमत 6,397 मिलियन यूएस डॉलर थी. 2021 में ये निर्यात बढ़कर 17.72 मिलियन टन हो गया जिसकी कीमत 8,815 मिलियन डॉलर हो गई. जो पिछले साल के मुकाबले 44 फीसदी ज्यादा था. अगर रुपये में इन पैसों को कनवर्ट किया जाये तो पिछले साल भारत ने 45,379 करोड़ रुपये का चावल निर्यात किया और 2021 में 65,298 करोड़ रुपये का चावल हमने निर्यात किया.

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इंटरनेशनल मार्केट में पाकिस्तान से लड़ाई

इंटरनेशनल मार्केट में भारत की पाकिस्तान के साथ बासमती के GI Tag को लेकर झगड़ा है. वैसे भारत बासमती चावल का दुनिया का सबसे बड़ा उत्पादक देश है. खाड़ी देशों में के अलावा भारत यूरोपीय देशों को बड़ी मात्रा में बासमती चावल निर्यात करता है. पिछले काफी समय से भारत और पाकिस्तान के बीच इंटरनेशनल मार्केट में बासमती के GI Tag यानी ज्योग्राफिक इंटिगेशन टैग पाने की लड़ाई चल रही है. अगर ये टैग भारत को मिलता है तो फिर बासमती के उत्पादन का एक तरीके से पेटेंट हमारे देश के पास होगा. जिससे भारत की बासमती की कीमत इंटरनेशनल मार्केट में ज्यादा होगी और वो पहले बिकेगी. हालांकि अब भी ऐसा ही है लेकिन अभी पाकिस्तान भारत को काफी टक्कर देता है और भारत ऑफिशियली ये टैग हासिल करना चाहता है.

क्या इस लड़ाई पर धान की पैदावार में कमी से असर पड़ेगा ?

हरियाणा के करनाल जिले में डिप्टी डायरेक्टर एग्रीकल्चर आदित्य डबास ने क्विंट से बातचीत में कहा कि, बासमती जीटी बेल्ट पर सबसे ज्यादा उगाई जाती है. जिसमें हरियाणा, पंजाब और यूपी का कुछ हिस्सा आता है. इन्हीं इलाकों से विदेशों में ज्यादातर बासमती एक्सपोर्ट भी होती है. और इन इलाकों में यूपी को छोड़कर धान की रोपाई में खास कमी नहीं आई है. तो इंटरनशनल मार्केट में बासमती के टैग की लड़ाई में लगता नहीं कि इससे कोई फर्क पड़ने वाला है. बशर्ते चावल की बड़े पैमाने पर कमी ना हो. क्योंकि अगर ऐसा हुआ और अच्छे रेट यहीं मिलने लगे तो किसान लोकल मार्केट में बेचेगा और हो सकता है लोग महंगी बासमती खाने को मजबूर हो जायें.

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