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पेगासस जासूसी कांड की जांच मांगने वाली याचिका को अगले हफ्ते सुनेगा सुप्रीम कोर्ट

Pegasus Snooping: याचिका में एक सिटिंग या रिटायर्ड जज की अध्यक्षता में जांच कराने की मांग की गई

Updated
भारत
2 min read
<div class="paragraphs"><p>याचिका में सिटिंग या रिटायर्ड जज की अध्यक्षता में जांच कराने की मांग</p></div>
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सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने पेगासस जासूसी कांड (Pegasus Snooping) में न्यायिक जांच की मांग वाली याचिका को अगले हफ्ते सुनने का फैसला किया है. द हिंदू अखबार के पूर्व चीफ एडिटर एन राम (N Ram) और एशियानेट के फाउंडर शशि कुमार (Sashi Kumar) ने कोर्ट में याचिका दायर की थी. याचिका में एक सिटिंग या रिटायर्ड जज की अध्यक्षता में जांच कराने की मांग की गई है.

30 जुलाई को वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने इस मामले को चीफ जस्टिस एनवी रमना के सामने उठाया. सिब्बल ने कहा, "नागरिकों, विपक्षी नेताओं, पत्रकारों, कोर्ट स्टाफ की नागरिक स्वतंत्रताएं सर्विलांस पर रख दी गई हैं. ये मुद्दा भारत और दुनिया में उठाया जा रहा है और इस पर जल्दी सुनवाई होनी चाहिए."

इस पर CJI रमना ने कहा, "हम मामले को अगले हफ्ते सुनेंगे."

एन राम और शशि कुमार के अलावा राज्यसभा सांसद जॉन ब्रिटास और वकील एमएल शर्मा ने भी पेगासस जासूसी कांड में सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है.

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याचिका में क्या कहा गया?

रिट याचिका कहती है कि केंद्र सरकार को निर्देश दिए जाएं कि वो बताए उसने या उसकी किसी एजेंसी ने पेगासस स्पाइवेयर के इस्तेमाल से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तौर पर ऐसी सर्विलांस की है या नहीं.

याचिकाकर्ताओं ने कहा कि लीक हुए डेटाबेस में सामने आए नामों में से कुछ के फोन का फॉरेंसिक एनालिसिस हुआ है और उनमें पेगासस के ट्रेस मिले हैं.

याचिका में सवाल उठाया गया कि क्या पत्रकारों, डॉक्टरों, वकीलों, विपक्षी नेताओं, केंद्रीय मंत्रियों, सिविल सोसाइटी एक्टिविस्टों के फोन में पेगासस डालकर टार्गेटेड सर्विलांस किया गया था.

याचिका में पूछा गया कि क्या ऐसी हैकिंग एजेंसियों और संस्थानों द्वारा 'बोलने की आजादी और विरोध जताने के हक' को दबाने की कोशिश है.

याचिकाकर्ताओं का कहना है कि पत्रकारों को टारगेट करना प्रेस की आजादी पर हमला है, और बोलने और अभिव्यक्ति की आजादी में शामिल जानने के अधिकार में भी हस्तक्षेप करता है.

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