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हार्दिक पटेल का गुजरात PCC वेबसाइट पर नाम तक नहीं,कांग्रेस से मनमुटाव की 5 वजहें

कांग्रेस के लिए 2017 चुनाव की तुलना में इस बार गुजरात में ज्यादा चुनौतियां

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हार्दिक पटेल का गुजरात PCC वेबसाइट पर नाम तक नहीं,कांग्रेस से मनमुटाव की 5 वजहें

गुजरात (Gujarat) में इसी साल दिसंबर में विधानसभा के चुनाव हैं, लेकिन उससे पहले कांग्रेस को 2 बड़े झटके लगे हैं. पहला- आदिवासी नेता और तीन बार से विधायक रहे अश्विन कोतवाल (Ashwin Kotwal) ने पार्टी छोड़ दी. बीजेपी में शामिल हो गए. दूसरा- पार्टी के प्रदेश कार्यकारी अध्यक्ष हार्दिक पटेल (Hardik Patel) ने ट्विटर बायो से पार्टी का नाम और पद हटा दिया, जो संकेत है कि वह पार्टी छोड़ सकते हैं. लेकिन समझने वाली बात ये है कि 3 साल में हार्दिक के साथ ऐसा क्या हुआ कि उन्होंने कांग्रेस के खिलाफ बगावती सुर अपना लिए और अब पिछले विधानसभा चुनाव में सरकार बनाने के करीब पहुंची कांग्रेस की गुजरात (Congress in Gujarat) में क्या स्थिति है?

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हार्दिक ने 2015 में सुर्खियां बटोरी-बीजेपी पर लगातार हमलावर रहे

सबसे पहले हार्दिक पटेल की बात कर लेते हैं. गुजरात के पाटीदार परिवार में जन्मे. अहमदाबाद में प्रारंभिक पढ़ाई हुई. 12वीं के बाद पिता के छोटे बिजनेस में हाथ बटाने लगे. 2010 में हार्दिक ने अहमदाबाद के सहजानंद कॉलेज में एडमिशन लिया. कॉलेज छात्र संघ के महासचिव पद के लिए चुनाव लड़े और जीत गए.

हार्दिक पटेल ने 2012 में सरदार पटेल ग्रुप (SPG) नाम के पाटीदार यूथ बॉडी को ज्वाइन किया. फिर कुछ ही महीनों में वीरमगाम यूनिट के प्रेसिडेंट बन गए. करीब तीन साल बाद हार्दिक को बड़ी पहचान मिली. जुलाई 2015 में पाटीदार आरक्षण आंदोलन का नेतृत्व किया, जिसमें पाटीदार जाति के लिए अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) का दर्जा देने की मांग की गई. तब भी राज्य में बीजेपी की सरकार थी. हार्दिक पटेल की नाराजगी और मांग बीजेपी सरकार से थी.

पाटीदार आंदोलन से कांग्रेस को फायदा-1990 के बाद सबसे ज्यादा वोट मिले

जब हार्दिक कांग्रेस में शामिल नहीं हुए थे, तब कहते थे कि उनकी नाराजगी बीजेपी से थी. उनकी पीढ़ी ने राज्य में बीजेपी के अलावा किसी और पार्टी की सरकार नहीं देखी है. पाटीदार आंदोलन के बीच 2017 आ गया. राज्य में विधानसभा चुनाव हुए. जाहिर तौर पर आंदोलन से कांग्रेस को फायदा हुआ.

2017 के चुनाव में 1990 के बाद कांग्रेस को सबसे ज्यादा 42.2% वोट मिले. 182 में से 77 सीटों पर जीत हुई. यानी कांग्रेस सरकार बनाने के काफी करीब पहुंच गई थी. इससे पहले 2012 में कांग्रेस ने 61 सीटों पर ही जीत हासिल की थी. 38% वोट मिले थे.

हार्दिक का वर्किंग प्रेसिडेंट बनने के बाद कांग्रेस से मनमुटाव शुरू हुआ

12 मार्च 2019 को हार्दिक कांग्रेस में शामिल हो गए. एक ही साल में, 11 जुलाई 2020 को गुजरात प्रदेश कांग्रेस कमेटी के वर्किंग प्रेसिडेंट बना दिए गए. यहां तक तो हार्दिक के लिए सब कुछ गुड-गुड था, लेकिन जब पद मिला तो काम और फैसलों को लेकर कांग्रेस से बात बिगड़ने लगी.

अब हार्दिक कहते हैं कि उनकी स्थिति पार्टी में उस नए दूल्हे जैसी है, जिसकी नसबंदी करा दी गई हो. यानी उन्हें पद तो मिला, लेकिन फैसले लेने का अधिकार नहीं दिया गया. उन्होंने खुद कहा कि मुझे प्रदेश कांग्रेस कमिटी की किसी भी बैठक में नहीं बुलाया जाता है. कोई फैसला लेने से पहले मुझसे राय मशविरा नहीं लेते. ऐसे पद का क्या मतलब है. ऐसी ही कांग्रेस से नाराजगी की 5 वजहें हैं.

1- हार्दिक ने पाटीदार नेता नरेश पटेल का जिक्र किया. उन्होंने कहा कि कांग्रेस नरेश पटेल के बारे में कोई फैसला न लेकर पाटीदार समाज का अपमान कर रही है. दरअसल, नरेश पटेल सौराष्ट्र के लेउवा पटेल समुदाय से आते हैं. पाटीदारों में दो समुदाय अहम माने जाते हैं. लेउवा पटेल और कड़वा पटेल. लेउवा पटेल 60% हैं. कड़वा पटेल 40%. लेउवा पटेल का सौराष्ट्र-कच्छ इलाके के राजकोट, जामनगर, भावनगर, अमरेली, जूनागढ़, पोरबंदर, सुरेंद्रनगर, कच्छ में प्रभुत्व ज्यादा है. ऐसे में कांग्रेस सहित बीजेपी और आम आदमी पार्टी नरेश पटेल को अपनी-अपनी तरफ खींचने में लगी हैं.

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2- पंजाब-राजस्थान में कांग्रेस के पैटर्न से हार्दिक पटेल को डर?

हार्दिक पटेल का डर कांग्रेस के ट्रेंड को लेकर भी है. जैसा पंजाब और राजस्थान में हुआ. एक इंटरव्यू में हार्दिक ने खुद इस बात का जिक्र किया. उन्होंने कहा, जो हाल राजस्थान में सचिन पायलट का हुआ, कुछ वही गुजरात में भी दोहराने की कोशिश हो रही है. सचिन को प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया. उन्होंने मेहनत की. लेकिन जब कुछ देने की बारी आई तो उनके साथ भेदभाव हुआ.

पंजाब में नवजोत सिंह सिद्धू के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ. इन दो पैटर्न से शायद हार्दिक के मन में डर है कि कहीं उनकी भी हालत ऐसी ही न हो. इसलिए वह विधानसभा चुनाव से पहले ही खुद को निर्णायक भूमिका में स्थापित कर कमांडिंग पोजीशन में आना चाहते हैं.

3- गुजरात पीसीसी वेबसाइट पर हार्दिक पटेल का नाम तक नहीं

हार्दिक पटेल को भले ही कांग्रेस में शामिल होने के एक साल बाद ही कांग्रेस वर्किंग प्रेसिडेंट बना दिया गया हो, लेकिन गुजरात पीसीसी की वेबसाइट में उनका नाम तक नहीं है. मार्च में कांग्रेस ने 75 जनरल सेक्रेटरी और 25 वाइस प्रेसिडेंट नियुक्त किए. तब हार्दिक ने नाराजगी जाहिर करते हुए कहा था कि इन नियुक्तियों के बारे में उनसे सलाह नहीं ली गई. स्थानीय निकाय चुनावों में भी उन्होंने टिकट वितरण में सलाह नहीं लिए जाने पर नाराजगी जाहिर की थी.

4- कांग्रेस की लोकल लीडरशिप में हार्दिक खुद को स्थापित करने में फेल

हार्दिक के साथ एक दिक्कत ये भी हुई है कि वो खुद को कांग्रेस के लोकल लीडरशिप में स्थापित नहीं कर सके हैं. इसके पीछे वजह ये हो सकती है कि कांग्रेस में उनकी वाइल्ड कार्ड एंट्री हुई थी. एक साल के अंदर ही वर्किंग प्रेसिडेंट का पद मिल गया. जबकि कई नेता ऐसे हैं जो सालों से पार्टी के लिए काम कर रहे हैं लेकिन उन्हें ऐसी तरक्की नहीं मिली. 2019 के लोकसभा चुनाव में हार्दिक गुजरात के एकमात्र नेता थे, जिन्हें कांग्रेस ने दिवंगत नेता अहमद पटेल के अलावा स्टार प्रचारक के रूप में चुना था.

5- हार्दिक पर 28 केस, लेकिन कांग्रेस की तरफ से कोई मदद नहीं मिली

हार्दिक पटेल ने इस साल फरवरी में घोषणा की थी कि अगर 2015 में आंदोलन के दौरान पाटीदारों पर लगाए केस वापस नहीं लिए गए तो वो 23 मार्च से आंदोलन करेंगे. उनकी इस घोषणा के बाद 23 मार्च से पहले ही गुजरात सरकार ने 10 मामलों को वापस लेने की प्रक्रिया शुरू कर दी. यानी बीजेपी ने उनकी मांग पर ध्यान दिया, लेकिन आरोप लगता रहता है कि कांग्रेस की तरफ से कोई समर्थन नहीं मिला. अभी हार्दिक पर 28 केस दर्ज हैं, जिनमें दो राजद्रोह के हैं.

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गुजरात में कांग्रेस की हालत 2017 की तुलना में ज्यादा चुनौती भरी

कांग्रेस, गुजरात में 27 साल से सत्ता से बाहर है. 1990 के बाद कांग्रेस ने 2017 के विधानसभा चुनाव में सबसे बढ़िया प्रदर्शन किया था. 77 सीटों पर जीत हासिल की, लेकिन इस जीत को ज्यादा दिनों तक संभाल नहीं सकी. 5 साल में 77 से संख्या घटकर 62 पर आ गई है. 12 से ज्यादा विधायकों ने पार्टी छोड़ दी. इतना ही नहीं, कांग्रेस के साथ चुनाव लड़ने वाली बीटीपी ने भी साथ छोड़ दिया. 2019 के लोकसभा चुनाव में दोनों दल अलग हो गए थे. अब बीटीपी ने AAP के साथ हाथ मिला लिया है. अबकी बार पाटीदार आंदोलन जैसा बड़ा मुद्दा भी नहीं होगा. पार्टी में गुटबाजी अलग ही दिख रही है. ऐसे में कांग्रेस के लिए गुजरात विधानसभा चुनाव, 2017 की तुलना में ज्यादा चुनौती भरा हो सकता है.

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