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Maharashtra Crisis: BJP का 'ऑपरेशन लोटस' नरेंद्र मोदी युग में कितना सफल रहा?

Maharashtra में मचे सियासी संग्राम के बीच आइए जानते हैं कि बीजेपी के 'ऑपरेशन कमल' का अब तक क्या असर रहा है.

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महाराष्ट्र में सियासी घमासान मचा है, MVA सरकार पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं, शिवसेना नेता एकनाथ शिंदे ने महाराष्ट्र की सियासत में तूफान मचा रखा है. वो लगभग 20 विधायकों के साथ गुजरात के बाद गुवाहाटी में डेरा डाले बैठे हैं, ऐसे में कयास लगाए जा रहा हैं कि महाराष्ट्र की सरकार पर संकट आ सकता है. महाराष्ट्र का राजनीतिक भविष्य क्या होगा वो तो आने वाले वक्त में पता चलेगा, लेकिन अगर पीछे मुड़कर देखें तो देश के करीब पांच राज्यों में बीजेपी ने 'ऑपरेशन लोटस' के जरिए अपनी सरकार बनाई.

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कर्नाटक 

जुलाई 2019 में कर्नाटक में जो राजनीतिक 'नाटक' हुआ उसने वहां की सरकार ही बदल दी. एचडी कुमारस्वामी के नेतृत्व वाली गठबंधन सरकार को 23 जुलाई 2019 को उखाड़ फेंका गया. 6 जुलाई को कांग्रेस और JD(S के 16 विधायकों ने इस्तीफा दिया था. सरकार ने विश्वास मत खो दिया था, इसके खिलाफ विधायकों ने मतदान किया.

कांग्रेस ने बीजेपी पर 'ऑपरेशन लोटस' का आरोप लगाया. 26 जुलाई को बीजेपी के बीएस येदियुरप्पा ने कर्नाटक के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली थी, उन्होंने 29 जुलाई को विधानसभा में ध्वनि मत से विश्वास प्रस्ताव जीतकर बहुमत साबित किया.

2019 में मध्यप्रदेश में बीजेपी ने बनाई सरकार 

मध्य प्रदेश में 2018 में विधानसभा चुनाव हुए थे, जिसमें बीजेपी को 109 सीटों पर जीत मिली. वहीं कांग्रेस के 114 विधायक जीते. कमलनाथ ने निर्दलीय विधायकों के समर्थन के साथ सरकार बनाई और मुख्यमंत्री बने. सरकार बने अभी दो साल पूरे भी नहीं हुए थे कि ज्योतिरादित्य सिंधिया और कमलनाथ के बीच तकरार शुरू हो गई. 2020 में ज्योतिरादित्य 22 विधायकों के साथ बीजेपी में शामिल हो गए और एमपी में बीजेपी की सरकार दोबारा सरकार बनी.

बागी विधायकों में तत्कालीन कमलनाथ सरकार के 14 मंत्री शामिल थे. उसके बाद बीजेपी के शिवराज सिंह चौहान एक बार फिर मुख्यमंत्री बने.

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गोवा

साल 2017 में कांग्रेस 17 सीटों के साथ चुनाव के बाद सबसे बड़ी पार्टी थी जबकि बीजेपी ने 13 का आंकड़ा हासिल किया था. जीत का जादुई आंकड़ा 21 था और बीजेपी अपने दम पर इस लक्ष्य से कम होने के बावजूद गोवा फॉरवर्ड पार्टी (GFP) की बदौलत सत्ता हासिल करने में सफल रही. जीएफपी ने पूरे चुनाव में कांग्रेस के साथ प्रचार करने के बाद रिजल्ट आ जाने के बाद अपना पाला बदल दिया था.

अरुणाचल प्रदेश

2016 के दौरान बीजेपी अरुणाचल प्रदेश में सरकार बनाने में कामयाब रही, जबकि 60 सदस्यीय विधानसभा में उसके पास केवल 11 विधायक थे. मुख्यमंत्री पेमा खांडू के नेतृत्व में 43 पीपुल्स पार्टी ऑफ अरुणाचल (PPA) के विधायकों में से 33 के बीजेपी में शामिल होने के बाद सरकार बनी. बीजेपी ने 44 विधायकों के बहुमत के साथ राज्य में अपनी सरकार बनाई.

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राजस्थान में भी आया था कांग्रेस सरकार पर संकट

2018 में मुख्यमंत्री पद से महरूम रह जाने के बाद से परेशान सचिन पायलट ने जुलाई 2020 में विद्रोह कर दिया. सचिन पायलट सहित 19 कांग्रेस विधायक सीएम अशोक गहलोत का विरोध करते हुए विधायक दल की बैठकों से दूर रहे. गहलोत ने अपने समर्थकों को होटलों में तब तक रखा जब तक कि दिल्ली में पार्टी के नेतृत्व ने हस्तक्षेप नहीं किया और पायलट ने विद्रोह छोड़ दिया. विधानसभा में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने विश्वास मत प्राप्त किया. गहलोत ने महीने भर से चल रहे संकट के लिए बीजेपी को इंजीनियरिंग का दोषी ठहराया.

अगस्त 2020 में शिवसेना पत्रिका 'सामना' के एक संपादकीय के मुताबिक राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने "ऑपरेशन लोटस' पर एक ऑपरेशन को अंजाम दिया और बीजेपी को सबक सिखाया.

महाराष्ट्र

साल 2019 में शिवसेना ने कांग्रेस और एनसीपी के साथ सरकार बनाने के लिए गठबंधन किया, लेकिन बीजेपी ने 23 नवंबर की सुबह देवेंद्र फडणवीस के शपथ ग्रहण के बाद एनसीपी प्रमुख शरद पवार के भतीजे और अजीत पवार को अपनी तरफ करने और उन्हें डिप्टी सीएम बनाने का फैसला किया. हालांकि शरद पवार और अन्य लोगों द्वारा चतुर राजनीतिक चालबाजी की वजह से अजीत पवार और विधायक हासिल नहीं कर सके. इसके बाद फडणवीस सरकार ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा फ्लोर टेस्ट के आदेश के तुरंत बाद इस्तीफा दे दिया.

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उत्तराखंड

साल 2016 के दौरान उत्तराखंड ने अपने सबसे खराब राजनीतिक संकट का अनुभव किया, जिसे मुख्यमंत्री हरीश रावत के खिलाफ अपनी ही पार्टी के विधायकों द्वारा एक बड़े विद्रोह के रूप में पहचाना गया. इसके बाद उन्हें सत्ता से बेदखल कर दिया गया और राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू किया गया, जो लगभग दो महीने तक चला. कोर्ट के दखल के बाद कांग्रेस की सरकार वापस आई. इस पूरे घटनाक्र के लिए कांग्रेस केंद्र की बीजेपी सरकार को जिम्मेदार ठहराती है.

उस वक्त प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और तत्कालीन बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह पर कांग्रेस द्वारा लोकतांत्रिक रूप से चुनी गई सरकार को अस्थिर करने के लिए अपनी ही पार्टी के अंदर दलबदल करने का आरोप लगाया गया.

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