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चीन में इमारतों में बंद बेबस लोग क्यों चीख रहे हैं? शंघाई का ये हाल क्यों?

जीरो कोवि़ड नीति को असफल दिखाने वाली कई खबरें सामने आ रही हैं जबकि कम्युनिस्ट पार्टी इस नीति पर गर्व कर रही है.

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चीन में इमारतों में बंद बेबस लोग क्यों चीख रहे हैं? शंघाई का ये हाल क्यों?
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'जीरो कोविड की रणनीति' के साथ चलने वाले चीन (China) में आई कोरोना (Corona) की इस नई लहर ने पूरी दुनिया को चौंका दिया है.

2.5 करोड़ से ज्यादा की आबादी वाला शहर शंघाई (चोंगकिंग के बाद) में लॉकडाउन लगे हफ्ते भर से ज्यादा हो गया है. सोमवार, 11 अप्रैल को कोरोना के 26,087 नए मामले दर्ज हुए जो सीधे दसवें दिन का रिकॉर्ड नंबर है.

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1 मार्च के बाद से शहंगाई में कोरोना के 1,30,000 मामले दर्ज हो चुके हैं. खास बात ये है कि, कोरोना एक भी मौत नहीं हुई है.

इतने केसेज सामने आने के बावजूद अभी भी स्थानीय प्रशासन 'जीरो-कोविड रणनीति' का इस्तेमाल ही कर रहा है, वो रणनीति जो चीन ने महामारी की शुरुआत के बाद से अपना ली है.

अब इस रणनीति से शंघाई के लोगों पर क्या असर पड़ने लगा है? हाल में, सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे वीडियो में चीन के कमर्शियल हब में रहने वाले लोगों को अपने घरों से चिल्लाते हुए सुना गया.

चलिए समझते हैं कि ये 'जीरो-कोविड' रणनीति, सख्त लॉकडाउन और चीन के सबसे बड़े शहरों में लोगों को होने वाली परेशानियां क्या है.

महामारी से लड़ने के लिए चीन की जीरो-कोविड रणनीति क्या है?

कोरोना वायरस के प्रसार को कंट्रोल करने के लिए चीन अपनी "जीरो कोविड" रणनीति का पालन कठोरता से कर रहा है, इसमें क्या-क्या शामिल हैं-

  • घर से बाहर निकलने पर पाबंदी

  • नियमों का उल्लंघन करने पर जुर्माना या डिटेंशन

चीन के विश्लेषण के अनुसार इस रणनीति के लाभ नुकसान से ज्यादा हैं,

चीनी सरकार ने अनुमान लगाया है कि उसकी "जीरो कोविड" रणनीति की वजह से लगभग 10 लाख मौतें नहीं हुई और 5 करोड़ लोग कोरोना की चपेट में आने से बच गए.

चीन में कोरोना से होने वाली मौतों की संख्या आधिकारिक तौर पर लगभग 5,000 है, ये आंकड़े भी तब के हैं, जब महामारी शुरू हुई थी. चीन ने कोविड के प्रति पश्चिमी देशों के प्रयासों की लगातार आलोचना करने की कोशिश की है.

ग्लोबल टाइम्स (कम्युनिस्ट पार्टी का अंग्रेजी भाषी मुखपत्र माना जाता है) ने 11 अप्रैल को प्रकाशित किए एक लेख में कहा कि "पश्चिम देश वायरस को मात देने में अभी बहुत दूर है." इसके बाद उसमें लिखा गया कि "पिछले दो सालों में चीन ने उन सिद्धांतों का पालन किया जो कहता है कि लोगों का जीवन और स्वास्थ्य सर्वोपरी, वैज्ञानिक दृष्टि और जीरो कोविड की नीति. इसी नीति की वजह से चीन लोगों के जीवन और स्वास्थ्य की सुरक्षा करने में कामयाब रहा."

हालांकि चीन की नीति की वजह से क्या क्या हो रहा है इसकी पोल सोशल मीडिया पर आ रहे वो तमाम वीडियोज खोल रहे हैं जसमें लोगों की परेशानियां स्पष्ट रूप से देखी जा सकती है.

अब ये देखना बाकी है कि इस तरह की खबरों को दबाने के लिए चीनी सरकार क्या क्या करेगी जो उनकी जीरो कोवि़ड नीति को असफल दिखा रही है जबकि कम्युनिस्ट पार्टी इस नीति पर गर्व कर रही है.
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जीरो कोविड नीति वाले शंहगाई शहर का क्या हाल है?

2.5 करोड़ से ज्यादा आबादी वाले शहर शहंगाई में सोमवार को कोरोना के 26,087 मामले सामने आए हैं.

इसमें से केवल 914 (0.03%) लोगों में लक्षण देखे गए हैं.

शहंगाई के अधिकारियों ने बताया कि 1 मार्च से मिल रहे कोरोना के 97% केसेज बिना लक्षण के हैं, और हां एक भी मौत नहीं हुई है.

इसकी एक संभावित वजह यह है कि पुराने वेरिएंट की तुलना में ओमिक्रॉन वेरिएंट कम जानलेवा है. एक और संभावना ये हो सकती है कि शहर में वैक्सीनेन रेट हाई होगा. हालांकि, वैक्सीनेशन कराने वाले बुजुर्गों की संख्या अधिक नहीं है.

द न्यू यॉर्क टाइम्स के अनुसार, लगभग 26 करोड़ लोग हैं जो 60 वर्ष से अधिक आयु के हैं, और उनमें से लगभग 4 करोड़ लोग या तो बिना वैक्सीनेशन के हैं या तो वे फुल्ली वेक्सीनेटेड नहीं हैं.

रविवार को 11,000 लोग कोरोना से ठीक हुए जिन्हें अस्पताल से छुट्टी मिली.

पिछले हफ्ते प्रसाशन ने कहा कि कुछ 7000 रिहायशी इलाकों के लोग ही एक सीमित एरिया में निकल सकते हैं अगर रिहायशी इलाकों में संक्रमण शून्य है.

लॉकडाउन की वजह से खाने-पीने की समस्या बढ़ी

कोरोना से हो रही मौतों में कमी और बिना लक्षण वाले कोरोना संक्रमित लोग होने के बावजूद स्थानीय प्रशासन प्रतिबंधों में ढील देने के लिए प्रेरित नहीं हुआ है. किसी को अपने घर से बाहर निकलने की अनुमति नहीं है. 2.5 करोड़ से ज्यादा लोग एक तरह से नजरबंद हैं. यहां तक ​​कि उनके अपार्टमेंट और आपातकालीन निकास को भी बंद कर दिया गया है.

इसलिए, खाने-पीने का सामान खरीदना लगभग असंभव है, और डिलिवरी सर्विस पूरी तरह से बंद हैं. लोगों को भोजन और पानी का ऑर्डर देना पड़ता है और सरकारी कर्मचारियों का इंतजार करना पड़ता है क्योंकि वे ही सब्जियों, मीट और अंडे जैसी वस्तुओं की डिलिवरी कर रहे हैं.

इसकी वजह से खाने की चीजों का अभाव है और यहां तक की मेडिकल सुविधाएं भी नहीं मिल रही हैं.

अब इस वजह से हो ये रहा है कि छोटे-छोटे दंगे भड़क रहे हैं. कई बच्चे उनके माता-पिता से अलग हो रहे हैं. शंघाई के अस्पताल हल्के लक्षणों वाले मरीजों से भरे हुए हैं, जबकि बिना लक्षण वाले मरीज क्वारंटीन सेंटर में हैं.

अस्थायी रूप से बने अस्पतालों में ठीक सुविधाएं नहीं है. बेड है पर बेडशीट नहीं है और गंदगी के से भरे शौचालय हैं.

एक महिला ने 'वीबो' पर लिखा, "मुझे नहीं पता कि मेरा अस्पताल टेलीविजन पर दिखाए जाने वाले अस्पताल जैसा क्यों नहीं दिखता है."

यहां तक ​​कि पालतू जानवरों को भी नहीं बख्शा जा रहा है. चीनी सोशल मीडिया पर अपलोड किए गए एक वीडियो में दिखाया गया है कि कुत्ते का मालिक जब कोरोना पॉजिटिव पाया गया उसेक पालतू जानवर को एक कोरोना रोकथाम कार्यकर्ता द्वारा पीट-पीटकर मार डाला गया. वह कुत्ता उस बस के पीछे भाग रहा था जो अपने मालिक को ले जा रही थी जिसके बाद उसे मार दिया गया.

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लॉकडाउन लगाने में देरी की गई

यह शंघाई में लगाया गया पहला व्यापक लॉकडाउन है जो पूरे शहर में लगा है. इससे पहले, शहर के कुछ इलाकों में लॉकडाउन लगाया जाता था. मार्च में जब कोरोना की संख्या लगभग 1,800 हो गई, तब भी पूरे शहर में लॉकडाउन नहीं लगा.

महीने के आखिर में शहर में रोजाना 2,000 कोरोना के मामले दर्ज होने लगे.

28 मार्च में चरणबद्ध तरीके से लॉकडाउन लगाया गया पहले शहर के पूर्व में फिर कुछ दिनों बाद पश्चिम मेंं लगाया गया. लेकिन कोरोना के मामले फिर भी बढ़ते चले गए जिसके बाद 3 अप्रैल को पूरे शहर में कड़ा लॉकडाउन लगाया गया, जिसमें अब तक कोई ढील नहीं दी गई है.

शंघाई में जो रणनीति अपनाई गई वो अन्य शहरों (जैसे जियान) में अपनाई गई रणनीति से अलग है क्योंकि यह चीन की जीडीपी में में 3% से ज्यादा योगदान देता है.

हॉन्ग कॉन्ग की चीनी यूनिवर्सिटी में छपा अध्ययन बताता है कि इस दो हफ्ते का लंबा लॉकडाउन चीन की 2 फीसदी जीडीपी को नुकसान पहुंचा सकता है.

चीन ने साल 2022 के लिए 5.5 प्रतिशत (30 वर्षों में सबसे कम) का आर्थिक विकास लक्ष्य निर्धारित किया है, लेकिन शंघाई और देश के अन्य हिस्सों में उसकी कोरोना नियंत्रण नीतियां इस लक्ष्य को हासिल करना मुश्किल बना देंगी.

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