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T20 World Cup: भारत की 8 सालों में 8 बड़ी हार, टीम इंडिया कहां है लाचार?

T20 World Cup 2022: भारत ने अब तक सिर्फ 4 ICC कप जीते और एक बार संयुक्त विजेता रहा.

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T20 World Cup 2022 | 2014 T20 वर्ल्ड कप फाइनल...मायूसी, 2015 वर्ल्ड कप सेमीफाइनल...मायूसी, 2016 T20 वर्ल्ड कप सेमीफाइनल...मायूसी, 2017 चैंपियंस ट्रॉफी फाइनल...मायूसी, 2019 वर्ल्ड कप सेमीफाइनल...मायूसी, 2021 वर्ल्ड टेस्ट चैंपियनशिप फाइनल...मायूसी, 2021 T20 वर्ल्ड कप ग्रुप स्टेज से बाहर...मायूसी और अब 2022 T20 वर्ल्ड कप सेमीफाइनल और कप जीतने का सपना फिर चकनाचूर. ये पिछले 8 सालों में ICC इवेंट्स में मिली हार के आठ एपिसोड हैं. इस T20 वर्ल्ड कप में रोहित एंड कंपनी की शर्मनाक हार का पोस्टमार्ट आज की खेलपंती में...

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भारत अब तक 29 बार ICC टूर्नामेंट खेला. इसमें शामिल हैं-

  • 12 ODI वर्ल्ड कप

  • 8 T20 वर्ल्ड कप

  • 8 चैंपियंस ट्रॉफी और

  • 1 वर्ल्ड टेस्ट चैंपियनशिप

इन 29 में से भारत ने सिर्फ 4 कप जीते और एक बार संयुक्त विजेता रहा. इन चार कप में 3 महेंद्र सिंह धोनी की कप्तानी में आए और 1, 1983 वाला वर्ल्ड कप कपिल देव की कप्तानी में. 1 साल में 8 कप्तान ट्राई कर चुकी भारतीय टीम को कप जिताने का मौका इस बार रोहित शर्मा के पास था, लेकिन वे भी चूक गए और अब हो सकता है कि अब 2024 टी20 वर्ल्ड कप से पहले वो कप्तान भी न रहें.

भारत के ICC टूर्नामेंट

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लेकिन एक सवाल तो उठेगा कि सब कुछ ठीक लग रहा था, भारतीय टीम ने अपने ग्रुप में टॉप किया फिर हम कैसे इतनी बुरी तरह हार गए. मुझे लगता है कि भारतीय क्रिकेट न्यूटन को बहुत फॉलो करती है.

न्यूटन का फॉर्मूला था न- 'लॉ ऑफ इनर्शिया' हिंदी में बोलूं तो 'जड़त्व का सिद्धांत'. बस उसे ही टीम इंडिया ने अपना मंत्र बना लिया है और सलमान खान की एक के बाद फ्लॉप होती फिल्मों की तरह एक के बाद ICC इवेंट हार रहे हैं.

भारत को ये 'जड़त्व का नियम' बदलने की जरूरत

अगर आप जड़त्व के नियम को नहीं समझते तो मैं समझाता हूं. ये नियम कहता है कि जो वस्तु प्रारंभिक तौर पर जिस स्थिति में है उसी स्थिति में रहना चाहती है. भारतीय क्रिकेट पर भी यही लागू होता है, हम दशकों पुराने उसी किताबी फार्मूले पर अटके हैं जिसमें कहा जाता है कि पहले धीमा खलो, विकेट बचा के खेलो, इनिंग्स बनाओ और फिर अंत में तेजी से रन बनाओ.

इस टी20 वर्ल्ड कप में शुरू के 6 ओवर यानि पावरप्ले में टीम ने बिल्कुल अटैक नहीं किया.
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भारत ने पाकिस्तान के खिलाफ पावरप्ले में सिर्फ 31 रन, नीदरलैंड के खिलाफ 32 रन, साउथ अफ्रीका के खिलाफ 33, बांग्लादेश के खिलाफ 37, जिंबाब्वे के खिलाफ 46 और इंग्लैंड के खिलाफ 38 रन बनाए. यानी एक जिंबाब्वे छोड़ दें तो कभी लगा ही नहीं कि भारत ने तेज शुरुआत करने की कोशिश की.

पावरप्ले में भारत के स्कोर

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जब नींव ही कमजोर होगी तो कहां से आप 200 रन का स्कोर खड़ा करेंगे. ये समस्या पहले से चलती आ रही है लेकिन क्योंकि जीत मिल रही थी तो सबकी आंखें बंद थी. इंग्लैंड के खिलाफ हमारी कलई खुल गई. जॉस बटलर और एलेक्स हेल्स ने बता दिया कि एडिलेड की पिच पर 168 रन कितने कम थे. इंग्लैंड ने पहले 6 ओवरों में ही 63 रन बनाकर अपना आधा काम आसान कर लिया.

टी20 की टीम बनाने की जरूरत

इसी को थोड़ा और गहराई से देखेंगे तो समझ में आएगा कि हमने हमेशा से वंनडे और टी20 को एक ही थाली में रखकर देखा है. इसीलिए हमारे पास स्पेशल टी20 टीम नहीं है. इंग्लैंड को देखें तो उनकी टीम में 9 नंबर तक धाकड़ बल्लेबाज हैं और 6-7 गेंदबाज भी मौजूद होते हैं. भारत के बल्लेबाज गेंद से कुछ नहीं कर पाते और गेंदबाज बल्ले से कुछ नहीं कर पाते. एक हार्दिक पांड्या को अपवाद मान सकते हैं. इसीलिए भारत के बल्लेबाज खुलकर नहीं खेलते.

पिछले साल जब विराट कोहली ने T20 की कप्तानी से इस्तीफा दिया तो एक कोशिश की कि T20 का कप्तान अलग हो और वनडे का अलग, लेकिन BCCI को ये बिल्कुल मंजूर नहीं था.

कप्तान से सवाल

अगर आपको लगता है कि जड़त्व का नियम भारत ने सिर्फ बल्लेबाजी में लगाया तो आप गलत हैं. इसमें गेंदबाजी का भी बराबर योगदान रहा. पहले ऐसा माना जाता था कि आपको अपने सबसे मेन गेंदबाज के कुछ ओवर अंत के लिए बचा कर रखने चाहिए, लेकिन भारतीय कैंप में अभी भी ऐसा ही माना जाता है. अर्शदीप जैसे गेंदबाज दूसरा ओवर फेंकने आए और उसके बाद सीधा 10वां ओवर फेंकने...तब तक तो चिड़िया खेत चुग चुकी थी. और हां 10वें ओवर के बाद गेंदबाजी करने आए ही नहीं, अब रोहित ही जानें कि ऐसा क्यों हुआ!

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टीम मैनेजमेंट की कलई खुल  गई

यहां खिलाड़ियों से ज्यादा टीम मैनेजमेंट की गलती नजर आती है. युजवेंद्र चहल भारत के लिए टी20 में सबसे सफल स्पिन गेंदबाज हैं और ओवरऑल दूसरे नंबर पर हैं. भुवनेश्वर कुमार के नाम 84 मैचों में 89 विकेट हैं जबकि चहल सिर्फ 69 मैचों में 85 विकेट ले चुके हैं. उनकी विकेट टेकिंग एबेलिटी किसी से छिपी नहीं है लेकिन फिर भी 6 के 6 मैचों में ऐसा गेंदबाज बेंच पर बैठा रहा. हम इसी की बहस में बिजी थे कि कार्तिक को खिलाया जाए या पंत को और असली नुकसान कहीं और से हो रहा था.

भारतीय ओपनर्स भी लंबे समय से बड़ी साझेदारी करने में नाकाम हो रहे हैं लेकिन एक साल में 28 से ज्यादा खिलाड़ी आजमा चुके टीम मैनेजमेंट के पास ओपनिंग कॉम्बीनेशन का शायद कोई विकल्प नहीं.

गेंदबाजी में आपके पास बटलर और एलेक्स हेल्स के सवालों का कोई जवाब नहीं था. पहले से पता था कि यही दोनों इंग्लैंड के लिए सबसे ज्यादा रन बना रहे हैं फिर भी हमारे पास इनके लिए कोई प्लानिंग नहीं थी. यहां असली कलई टीम मैनेजमेंट की खुली है.

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कमजोर टीमों के सामने ही जीत पाए

भारत ऐडी-चोटी का जोर लगाकर पाकिस्तान के सामने जीत गया. इसके बाद नीदरलैंड़, बांग्लादेश और जिम्बाब्वे जैसी कमजोर टीमों के सामने भी जीत मिल गई. लेकिन जब साउथ अफ्रीका सामने आई तो पता चल गया कि हम कितने पानी में हैं और इंग्लैंड सामने आई तो उसी पानी में डूब गए.

रोहित ने 5 बार IPL जिताया तो उन्हें भारतीय टीम का कप्तान बनाया गया. अब पांड्या ने एक बार IPL जिताया तो उन्हें कप्तान बनाने की मांग शुरू हो गई. यहां गलती IPL की नहीं है बल्कि कप्तान, खराब प्लानिंग और उस माइंडसेट की गलती है जिसके जड़त्व से निकले बिना भारत कोई ICC कप नहीं जीत सकता.

गौतम गंभीर की एक बात बिल्कुल सही लगती है कि "कोई खिलाड़ी आएगा और शायद रोहित से ज्यादा दोहरे शतक लगा देगा और कोहली से ज्यादा शतक लगा देगा, पर मुझे नहीं लगता कि कोई भारतीय कप्तान धोनी की तरह कभी 3 ICC ट्रॉफी देश को जिता सकेगा."

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