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International Widows Day: आखिर क्यों दर-दर भटकने को मजबूर हैं विधवा महिलाएं?

2011 की जनगणना के मुताबिक भारत में 5.6 करोड़ विधवा महिलाएं हैं.

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International Widows Day: आखिर क्यों दर-दर भटकने को मजबूर हैं विधवा महिलाएं?
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यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः

संस्कृत के इस श्लोक का अर्थ है- जहां नारी की पूजा होती है, वहां देवता निवास करते हैं. भारतीय संस्कृति में नारी के सम्मान को बड़ा महत्व दिया गया है. भारत में नारी को देवी का दर्जा दिया गया है. लेकिन आज के वक्त में देश में कुछ ऐसी महिलाएं भी हैं जो उपेक्षा की शिकार हैं. इनमें विधवाएं (Widows) भी हैं. पति की मौत के बाद इन महिलाओं को सामाजिक और आर्थिक समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है.

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आज दुनियाभर में अंतरराष्ट्रीय विधवा दिवस (International Widows Day) मनाया जा रहा है. इस मौके पर क्विंट उत्तर प्रदेश की कुछ विधवा महिलाओं की कहानियां आपको बता रहा है, जिन्हें सामाजिक सुरक्षा के नाम पर सिर्फ निराशा हाथ लगी है. इसके साथ ही हम बता रहे हैं, पति की मौत के बाद इन महिलाओं को किन-किन समस्याओं से जूझना पड़ रहा है.

सबसे पहले आंकड़ों पर एक नजर डालते हैं

2011 की जनगणना के मुताबिक भारत में 5.6 करोड़ विधवा महिलाएं हैं. 2001 से 2011 के बीच 89.71 लाख महिलाओं को विधवा की श्रेणी में जोड़ा गया है. कुल विधवा महिलाओं में से 0.45 फीसदी नाबालिग विधवाएं हैं, जिनकी उम्र 10 साल से 19 साल के बीच की है. वहीं 9.0 फीसदी 20 से 39 साल के बीच की हैं. 32 फीसदी विधवाएं 40 से 59 साल और 58 फीसदी 60 वर्ष से ऊपर की हैं. वहीं कोरोना से पति की मौत के बाद सरकार ने विधवाओं का कोई आधिकारिक आंकड़ा पेश नहीं किया है.

अगर हम उत्तर प्रदेश की बात करें 2011 के आंकड़ों के मुताबिक यहां 1,36,099 विधवा महिलाएं हैं. वहीं सिंगल वुमन का आंकड़ा 12,086,019 है. इनमें बगैर शादी, तलाकशुदा, अलग रहने वाली महिलाएं और विधवा शामिल हैं.

आपको बता दें कि मथुरा जिले के वृंदावन में राज्य सरकार ने निराश्रित विधवा महिलाओं के लिए आश्रय स्थल बनवाया गया है. जहां 1000 विधवा महिलाएं रह सकती हैं. ये पूरे देश में विधवा महिलाओं का का सबसे बड़ा आश्रय स्थल है.

वही जानकार बताते हैं कि भारत मे विधवा महिलाएं सबसे ज्यादा परेशान रहती हैं. विधवा पेंशन और पति की मृत्यु के बाद मिलने वाली धनराशि के लिए ज्यादातर महिलाओं को चक्कर लगाना पड़ता है. यहां तक की शहीद जवानों की पत्नियों को परेशानी का सामना करना पड़ता है.

बकरी चराकर गुजारा, अभी तक नहीं बना राशन कार्ड

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ (Lucknow) से 300 किमी दूर एटा (Etah) जिले की कुछ विधवा महिलाओं ने क्विंट से अपना दर्द साझा किया है. 65 साल की सुनहरी देवी राजा का रामपुर की रहने वाली हैं. 45 साल पहले उनके पति की मौत हो गई थी. उन्होंने बताया कि तब से लेकर अब तक उन्हें कोई सरकारी मदद नहीं मिली है. कई बार अलीगंज का चक्कर भी लगाया है लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई. यहां तक की दलालों ने भी उनसे पैसे ऐंठ लिए.

सुनहरी देवी ने बताया कि, वो बकरियां चराकर अपना गुजारा करती हैं. राशन कार्ड नहीं बनने से उन्हें मुफ्त का राशन भी नहीं मिलता है. वहीं उनका मकान भी कच्चा है.

मृत्यु प्रमाण पत्र बनवाने में लगे तीन महीने

कोरोना के समय में भुने आलू बेचने वाले विनोद की मृत्यु हो गई थी. जिसके बाद से विनोद की पत्नी सरकारी मदद के लिए दफ्तरों के चक्कर काट रही हैं. उन्हें न तो पेंशन और न ही मृतका आश्रित धनराशि मिली है. वो कहती हैं कि उन्हें अपने पति का मृत्यु प्रमाण पत्र बनवाने में 3 महीने लग गए.

7 साल बाद भी शहीद की पत्नी को मदद का इंतजार

शहीद सुशील कुमार की 30 वर्षीय पत्नी ललिता देवी बताती हैं कि उनकी शादी 5 जून 2015 को हुई थी. 4 दिसम्बर 2016 को उनके पति पुंछ में शहीद हो गये थे. उस समय उनका बच्चा मात्र पांच महीने का था.

इसके साथ ही उन्होंने कहा कि, सरकारी पट्टों पर दबंगो ने कब्जा कर लिया था, बाद में उसे मुक्त करवाया गया. ललिता ने आगे बताया कि 11 जून 2022 को एटा जिलाधिकारी अंकित अग्रवाल ने हस्ताक्षर के बाद उनके फाइल को लखनऊ भेजने की बात पता चली.

वहीं गांव की सुधा देवी कहती हैं कि लोग सुबह-सुबह हमारी शक्ल तक नहीं देखना चाहतेे, कहते हैं कि विधवा आ गई है. ऐसी कई विधवा महिलाएं हैं जो पेंशन और मदद के लिए सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटने को मजबूर हैं.

(इनपुट- शुभम श्रीवास्तव)

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