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अमेरिकी विदेश मंत्री भारत में, अफगानिस्तान, चीन से पेगासस तक हैं बड़े मुद्दे

Antony Blinken ने विदेश मंत्री एस. जयशंकर से की मुलाकात, पीएम मोदी और NSA अजीत डोभाल से भी मिलेंगे

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<div class="paragraphs"><p>अमेरिकी विदेश मंत्री&nbsp; Antony Blinken भारत दौरे पर&nbsp;</p></div>
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अमेरिका में बाइडन के राष्ट्रपति बनने के बाद वहां के विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन (Antony Blinken) अपने पहले भारत दौरे पर आये हैं. यह दौरा कई मामलों को लेकर खास हैं. ब्लिंकन विदेश मंत्री एस जयशंकर से मिल चुके. प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल से भी मुलाकात करेंगे.

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भारत दौरे के बारे में बताते हुए एक अमेरिकी प्रवक्ता ने कहा कि ब्लिंकन कोरोना से निपटने के लिये मिलकर काम करने, हिंद- प्रशांत महासागर, जलवायु परिवर्तन ,साझा क्षेत्रीय सुरक्षा हित , साझा लोकतांत्रिक मूल्यों जैसे तमाम मुद्दों पर चर्चा करेंगे.

"साझा क्षेत्रीय सुरक्षा हित" का अर्थ अफगानिस्तान की स्थिति से हो सकता है.अफगानिस्तान की मौजूदा स्थिति नई दिल्ली में चिंता का कारण बन हुई है.भारत 2001 में अमेरिकी आक्रमण के बाद स्थापित अफगान सरकार का एक मजबूत समर्थक रहा है.वहां मौजूद अमेरिकी सुरक्षा के साथ भारत ने 3 बिलियन डॉलर की विकास सहायता की है.

अफगानिस्तान में भारत की भूमिका

1999 में IC 814 हवाई जहाज के अपहरण में तालिबान की संदिग्ध भूमिका के साथ शुरुआत करते हुए, भारत के पास कड़वे तालिबानी अनुभव हैं. बाद के वर्षों में भारत ने कई घातक हमलों का सामना किया, जिन्हें तालिबान द्वारा पाकिस्तान के इशारे पर अंजाम दिया गया था.

इनमें 2008 और 2009 में काबुल में भारतीय दूतावास पर, 2010 में हामिद गेस्ट हाउस में भारतीय डॉक्टरों के आवास पर और हेरात, जलालाबाद , मजार-ए-शरीफ में भारतीय वाणिज्य दूतावासों पर किये हमले शामिल हैं. इसलिए, भारत ब्लिंकन के साथ चर्चा में पाकिस्तान-तालिबान संबंधों पर ध्यान केंद्रित कर सकता है. साथ ही भारत के खिलाफ आतंकवादी गतिविधियों के लिए जारी पाकिस्तानी समर्थन, विशेष रूप से सशस्त्र ड्रोन से जुड़ी हालिया घटनाओं के बाद भारत इस मुद्दे पर गंभीर है.

एंटनी ब्लिंकन को अफगानों की सहायता के लिए भारतीय प्रयासों के बारे में भी जानकारी दी जाएगी.आने वाले दिनों में, भारत अफगान राष्ट्रीय सुरक्षा बलों (ANSF) की वायु सेना को तकनीकी सहायता प्रदान कर सकता है.

चीन के साथ विवाद 

एजेंडे में चीन एक और महत्वपूर्ण विषय है. विदेश मंत्री एस. जयशंकर के दुशांबे में शंघाई सहयोग संगठन (SCO) के विदेश मंत्रियों की बैठक से इतर अपने चीनी समकक्ष वांग यी के साथ अपनी हालिया बातचीत के बारे में ब्लिंकन को जानकारी देने की उम्मीद है. विशेषज्ञों के अनुसार सीमा मुद्दे पर दोनों देशों के बीच स्पष्ट मतभेद हैं.यह जयशंकर-वांग के बीच बैठक के बाद दोनों विदेश मंत्रालयों के रीडआउट से भी पता चलता है.

मार्च में 'क्वाड' के पहले सफल शिखर सम्मेलन के बाद, जिसने समूह के लिए एक विस्तृत एजेंडा निर्धारित किया, इस वर्ष के अंत में एक ऑफलाइन मीटिंग आयोजित करने का प्रयास किया जा रहा है.

इस बीच, दक्षिण चीन सागर में "कानून के शासन" और "नेविगेशन की स्वतंत्रता" का समर्थन करने के लिए यूनाइटेड किंगडम और यूरोपीय संघ के प्रयासों ने क्वाड की प्रासंगिकता को बढ़ावा दिया है. यह चीन के खिलाफ मजबूत होते गठबंधन का संकेत है.
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लेकिन नई दिल्ली को यह ध्यान देने की जरूरत है कि बाइडेन प्रशासन की चीन के संबंध में रणनीति अभी भी समीक्षा और फार्मूलेशन स्तर पर है. इस बीच, अमेरिकी अधिकारी ऐसे रुख अपनाते रहे हैं जो चीन के साथ जुड़ाव की संभावना से लेकर रणनीतिक प्रतिस्पर्धा और चुनिंदा सहयोग तक से भरी हुई है.

पेगासस और 'साझा लोकतांत्रिक मूल्य'

ब्लिंकन के एजेंडे में एक और आइटम है- "साझा लोकतांत्रिक मूल्य", जो बताता है कि अमेरिकी विदेश मंत्री पेगासस से जुड़े मुद्दे को उठा सकते हैं.शुक्रवार को एक प्रेस वार्ता में, अमेरिका के दक्षिण और मध्य एशियाई मामलों के कार्यवाहक सहायक सचिव डीन थॉम्पसन ने कहा, "नागरिक समाज, या शासन के आलोचकों, या पत्रकारों, या इस तरह के किसी भी व्यक्ति के खिलाफ इस तरह की तकनीक का उपयोग करना चिंताजनक है".

मानवाधिकारों के मुद्दों पर अमेरिकी दृष्टिकोण कमोबेश औपचारिक है. यह देखते हुए कि यह सऊदी अरब को अपने करीबी सहयोगियों में से एक के रूप में गिनता है, इस बात कि संभावना कम है कि अमेरिका भारत सरकार द्वारा पेगासस जैसी अनुदार रणनीति के उपयोग को जरुरत से ज्यादा तरजीह देगा.

रविवार को इस मुद्दे पर नई दिल्ली की टिप्पणी ने अनावश्यक रूप से रक्षात्मक मानसिकता प्रदर्शित की.

अफगानिस्तान और भारत-प्रशांत में अमेरिकी लक्ष्य

भारत-अमेरिका द्विपक्षीय मोर्चे पर स्थिति अच्छी दिख रही है. दोनों के बीच वस्तुओं और सेवाओं का व्यापार फल-फूल रहा है. एफडीआई के संबंध में भी यही सच है, भले ही भारत का संरक्षणवादी रुख वाशिंगटन के साथ अच्छा नहीं है. दोनों के बीच रक्षा व्यापार और संबंध भी फल-फूल रहे हैं. लेकिन भारत-चीन व्यापार भी रिकॉर्ड स्थापित कर रहा है और व्यापार,निवेश में चीन के साथ अमेरिका की भागीदारी भी तेजी से जारी है.

लेकिन ब्लिंकन और अमेरिका के लिए बड़ा मुद्दा यह है कि क्या नई दिल्ली अफगानिस्तान और इंडो-पैसिफिक मामले में अमेरिकी लक्ष्यों की दिशा में बड़ी भूमिका निभाने की स्थिति में है. वैश्विक वैक्सीन पावरहाउस के रूप में उभरने के अपने पहले के दावों को देखते हुए, क्वाड वैक्सीन प्रोग्राम में अपनी भूमिका को पूरा करने में भारत की विफलता शर्मिंदगी का कारण है.

अमेरिका जानता है कि पश्चिमी प्रशांत के संबंध में भारत के पास सीमित क्षमता है और वह चाहता है कि नई दिल्ली अफगान सरकार की सहायता के लिए बड़ी भूमिका निभाए. भारत इसके लिए पूरी तरह से उत्साही नहीं है, क्योंकि हिंद-प्रशांत पर घोषणाएं जारी करना एक बात है, लेकिन युद्धग्रस्त अफगानिस्तान में जमीन पर उतरना बिल्कुल दूसरी बात.

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एस. जयशंकर की पिछली अमेरिका यात्रा

याद कीजिए , इस साल मई में जयशंकर की वाशिंगटन यात्रा शानदार तो नहीं थी - भारतीय विदेश मंत्री को अमेरिकी राष्ट्रपति से मिलने का मौका नहीं मिला था. भारत तब COVID-19 संक्रमण की घातक दूसरी लहर की चपेट में था. क्वाड के वैक्सीन वितरण प्रयासों का केंद्र बनने के पहले के वादे पर कार्रवाई की घोषणा करने के बजाय, जयशंकर वैक्सीन के मोर्चे पर सहायता का अनुरोध करने के लिए वाशिंगटन में थे.

वैसे भी, भारतीय अर्थव्यवस्था 2016 से लड़खड़ा रही है. एक ऐसी स्थिति जो नरेंद्र मोदी सरकार के खराब नीतिगत फैसलों से बदतर हो गई है. COVID-19 महामारी ने 2020 में भारत की जीडीपी को 7.3% की नकारात्मक दर से पीछे किया, जबकि लाखों लोग को गरीबी में धकेल दिया.

(लेखक ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन, नई दिल्ली में विशिष्ट फेलो हैं. इस आर्टिकल में छपे विचार लेखक के अपने हैं. इसमें क्विंट का उनसे सहमत होना जरूरी नहीं है.)

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