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डॉ. अंबेडकर,जिन्होंने 3 शिक्षकों से मंत्र लेकर बदली भारत की तस्वीर

अंबेडकर एक इतिहासकार और अर्थशास्त्री होने के अलावा एक बेहतर राजनेता थे

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जब भारत अंग्रेजों से आजादी के लिए लड़ रहा था तो इस बात को लेकर भी बहस हो रही थी कि अंग्रेजी शासन के खात्मे के बाद किस प्रकार का भारत बनाया जाना है. उस दौर में, विशेषकर 1905 से लेकर 1935 के बीच में, इस बात पर काफी जोर डाला गया था कि भारत को अपनी अंदरूनी संरचना को बदलकर समता और न्याय का संसार रचना है. इस समता और न्याय की दुनिया की कल्पना मोहनदास करमंचद गांधी, भगत सिंह, जवाहरलाल नेहरू और डॉ. भीमराव अंबेडकर ने अपने-अपने तरीके से की थी. यहां मैं अपने आपको डॉ. अंबेडकर तक सीमित रखूंगा.

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डॉ. अंबेडकर का जन्म एक अछूत परिवार में हुआ था. वे जिस समुदाय में पैदा हुए थे, उस समय उसी प्रकार के सैकड़ों समुदाय जातीय उच्चताक्रम से उपजे बहिष्करण, अपमान, संताप से पीड़ित थे. उन्हें शिक्षा से वंचित रखा गया था. सार्वजनिक संस्थाओं, फेलोशिप और सज्जन अध्यापकों की सदाशयता की मदद से डॉ. अंबेडकर ने अपने युग में शिक्षा की संभव उपाधियां प्राप्त कीं. वे अर्थशास्त्र के ज्ञाता थे, बेहतर वकील थे और मंजे हुए इतिहासकार भी और इन सबसे बढ़कर एक राजनेता.

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अंबेडकर एक इतिहासकार और अर्थशास्त्री होने के अलावा एक बेहतर राजनेता थे
डॉ. अंबेडकर चाहते तो ऐशो-आराम की जिंदगी जी सकते थे, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया
(फोटो: Facebook)

जिस दौर में डॉ. अंबेडकर भारतीय परिदृश्य पर आए थे, उसके कुछ समय बाद अमेरिका में काले लोगों के आंदोलन हुए. इसमें डॉ. राममनोहर लोहिया और मार्टिन लूथर किंग जूनियर महत्वपूर्ण थे. अंबेडकर, लोहिया और मार्टिन लूथर किंग जूनियर ने बहिष्कृत और संतप्त जनों की लड़ाई को न्याय और जनतंत्र की लड़ाई में बदला.

डॉ. अंबेडकर चाहते तो ऐशो-आराम की जिंदगी जी सकते थे, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया. वे ऐसा कर भी कैसे सकते थे? उनके तीन शिक्षकों ने भी ऐसा नहीं किया था. महात्मा बुद्ध ने लोगों के कष्ट देखे, हिंसा से ग्रस्त समाज देखा; कबीर ने धर्म और शास्त्र की संस्थागत जकड़बंदी देखी; ज्योतिबा फुले ने पेशवाओं के अत्याचार, किसानों और शूद्रों की दुर्दशा देखी, शिक्षा तक पहुंच न हो पाने से उनकी दुर्गति देखी. इन तीनों ने करूणा, समानता, अहिंसा आधारित समाज का सपना देखा. डॉ. अंबेडकर इन तीनों को अपना शिक्षक मानते थे. इन तीनों ने जिस समाज का सपना देखा था, उसे प्राप्त करने के लिए डॉ. अंबेडकर ने कोई कसर बाकी न छोड़ी. उन्होंने खूब पढ़ा, लिखा और धारदार तर्क विकसित किए. आगे चलकर उन्होंने अपनी इस पढ़ाई और तर्क का कमजोर लोगों की दशा सुधारने में किया.

यूरोप बस सकते थे अंबेडकर

महात्मा गांधी के हवाले से रामचंद्र गुहा अपने एक लेख में लिखते हैं कि डा. अंबेडकर बहुत सादा जीते थे. वे चाहते तो प्रतिमाह एक या दो हजार रूपए कमा सकते थे. यह 1934 की बात है. वे इस हालत में भी थे कि वे चाहते तो यूरोप में बस सकते थे, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया. उनकी लगभग हर जीवनी में यह बात दोहराई गयी है कि उन्होंने व्यक्तिगत और सार्वजनिक दुख सहकर भी करोड़ों लोगों के जीवन में प्रकाश फैलाया. आज भारत के दलितों और स्त्रियों के जीवन में यह प्रकाश राजनीतिक प्रतिनिधित्व, सामाजिक सम्मान, सांस्कृतिक आत्मविश्वास और जीवन के हर क्षेत्र में दावेदारी के रूप में फैल रहा है. यह समय है कि हम डॉ. अंबेडकर के जीवन की उन वैचारिक उपलब्धियों का जश्न मनाएं जिनसे भारत को एक करूणा आधारित, समतामूलक और न्यायपूर्ण देश में बदला जा सके. जिसमें स्त्रियों और दलितों को सम्मान मिले.

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यदि आप सैकड़ों पृष्ठों में फैली हुई संविधान सभा की बहसों को देखें तो आपको जानकार हैरानी होगी कि जब भी इस सभा में अनुसूचित जातियों के लिए आरक्षण या विशेष प्रावधानों की कोई चर्चा होती थी तो संविधान सभा में शामिल उच्च वर्ग इसका विरोध करता था. कभी कभार यह भी कहा जाता था कि ‘हमारे समाज’ में सब ठीक है और अनुसूचित जातियों के लिए किसी विशेष प्रावधान कि जरूरत नहीं है.

और इन सबके बीच में उपस्थित बाबू जगजीवन राम, पृथ्वीसिंह आजाद, धर्म प्रकाश चुप्पी साध जाते थे. ऐसे अवसरों पर, संविधान सभा के अध्यक्ष के रूप में और एक सदस्य के रूप में डॉ. अंबेडकर इस चुप्पी को तोड़कर अनुसूचित जातियों के पक्ष में खड़े होते थे. संविधान सभा में वे अपने पद का कोई बेजा इस्तेमाल नहीं करते थे, बल्कि एक ज्ञानी और सुजान राजनेता की तरह भारत को एक बेहतर समाज बनाए जाने के लिए प्रयत्नशील होते थे.

अंबेडकर एक इतिहासकार और अर्थशास्त्री होने के अलावा एक बेहतर राजनेता थे
समानता के स्वप्नदर्शी 
(फोटोः Twitter)

अंबेडकर ने कोलंबिया और लंदन में देखा था कि किस प्रकार वहां के समाज में महिलाएं आगे जा रही हैं, जबकि भारत के सार्वजनिक जीवन में वे कहीं दिखाई नहीं पड़ती थी. भारत के हजारों साल के धर्म शास्त्रीय अनुभवों को आंबेडकर ने पढ़ा था, उस पर गहन तरीके से सोचा था. इसलिए वे लगातार उनके हक के लिए खड़े रहे. जब उन्होंने मनुष्य और उसके पानी पीने के गरिमापूर्ण अधिकार के लिए महाड़ सत्यग्रह किया था तो उसमें महिलाओं की भागीदारी थी.

यह 1927 की बात है. इस घटना को भुला दिया जाता है और मुख्यधारा के इतिहास लेखन में कहा जाता है कि महात्मा गांधी ने स्त्रियों को बाहर निकाला. अंबेडकर ने दलित स्त्रियों को लड़ना सिखाया. अपने सार्वजनिक जीवन में उन्होंने स्त्रियों से पढ़ने और अपनी आवाज बुलंद करने की अपील कि. बम्बई की मिलों से जुड़ी मजदूर बस्तियों में वे जाते और उन्हें शिक्षित करते थे. कौशल्या बैसंत्री की आत्मकथा पढ़िए तो आप जान पाएंगे कि भारत की करोड़ों दलित महिलाओं के जीवन को उन्होंने कैसे बदल दिया.

वे यह भी मानते थे कि महिलाओं को सम्पत्ति में अधिकार और विवाह के मामले में आत्मनिर्णय का अधिकार दिए बिना समता आधारित समाज नहीं बन पाएगा. जितनी बहादुरी से वे दलितों के लड़ रहे थे उतनी ही शिद्दत और बेचैनी से वे स्त्रियों के पक्ष में खड़े थे - चाहे वह संविधान सभा की बैठक हो या जवाहरलाल नेहरू के मंत्रिमंडल में अपनी बात रखनी हो. जिन नेहरू ने महिला अधिकारों के लिए संविधान सभा में भावपूर्ण तकरीरें की थीं और जिनकी प्रशंसा हंसा मेहता ने की थी, वही नेहरू अपने कैबिनेट मंत्री डॉक्टर भीमराव अंबेडकर की बात नहीं मान रहे थे. अंबेडकर ने इस्तीफा दे दिया.

निर्भया और कठुआ जैसे पूरे देश को झकझोर देने वाले बलात्कार हो गए. क्या महात्मा बुद्ध ऐसा समाज चाहते थे. हवा से सीको घड़ियां उत्पन्न करने वाले बाबाओं की चरण- रज में लोटते खिलाड़ियों की कल्पना क्या कबीर ने की होगी या शिक्षा और रोजगार विहीन महिलाओं की कल्पना ज्योतिबा फुले और सावित्रीबाई फुले ने की होगी? क्या इसी दिन के लिए डा. अंबेडकर ने जवाहरलाल नेहरू के मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया था.

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( इस आर्टिकल के लेखक रमाशंकर सिंह भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान के फेलो हैं. इस आर्टिकल में छपे विचार उनके अपने हैं. इसमें क्‍व‍िंट की सहमति होना जरूरी नहीं है)

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