नरेंद्र शर्मा: यूसुफ को ‘दिलीप कुमार’ बनाने वाले कवि, लेखक, गीतकार

नरेंद्र शर्मा पहले मदन मोहन मालवीय की पत्रिका 'अभ्युदय' से जुड़े, उसके बाद उन्होंने सिनेमा की दुनिया में कदम रखा

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कवि और गीतकार नरेंद्र शर्मा
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आधुनिक हिंदी कविता को जिस दौर ने सबसे अधिक प्रभावित किया है, उसे छायावादी दौर कहा जाता है. इस दौर में हिंदी साहित्य को सबसे अधिक समृद्ध करने वाले कवि, लेखक एवं संपादक हुए हैं, जिन्होंने अमर कृतियों की रचना की. इनमें जयशंकर प्रसाद, सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’, सुमित्रानंदन पंत और महादेवी वर्मा जैसे महान साहित्यकार शामिल हैं.

अमर गीतों की रचना करने वाले महान साहित्यकारों में एक नाम ऐसा भी है, जिसने साहित्य के साथ-साथ सिने जगत को भी अपनी लेखनी से एक से बढ़कर एक रचनाएं दीं.

इस सुप्रसिद्ध कवि, लेखक, गीतकार और अपने समय के जाने-माने संपादक का नाम है पंडित नरेंद्र शर्मा. इनका जन्म 28 फरवरी, 1913 को उत्तर प्रदेश के खुर्जा के जहांगीरपुर में हुआ था. इन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से अंग्रेजी में एम.ए. की शिक्षा प्राप्त की और फिर हिंदी साहित्य की सेवा करने के लिए कर्म-पथ पर निकल पड़े.

पहले ‘अभ्युदय’ पत्रिका से जुड़ाव, फिर सिनेमा

छोटी-सी उम्र से ही नरेंद्र शर्मा ने साहित्य में रुचि लेना आरंभ कर दिया था. जब नरेंद्र शर्मा सिर्फ 18 साल के थे, तभी इन्होंने अपनी साहित्यिक प्रतिभा का परिचय दे दिया था. तब इनकी पहली कविता ‘चांद’ नामक पत्रिका में छपी थी.

उस समय सुप्रसिद्ध कवि हरिवंशराय बच्चन के साथ इनकी तुलना की जाने लगी थी. 1933 में इनकी पहली कहानी ‘दैनिक भारत’ में छपी तो 1934 में इन्होंने महाकवि मैथिलीशरण गुप्त की काव्यकृति ‘यशोधरा’ की समीक्षा भी की. इसके अलावा इन्होंने ‘मोहनदास करमचंद गांधी : एक प्रेरक जीवनी’ नाम से महात्मा गांधी की जीवनी भी लिखी.

उस समय पंडित मदनमोहन मालवीय द्वारा स्थापित साप्ताहिक पत्रिका ‘अभ्युदय’ की चर्चा जोरों पर थी, इसलिए नरेंद्र शर्मा ने इस प्रसिद्ध पत्रिका से जुड़ने का फैसला किया और इस तरह इन्होंने बतौर संपादक इस पत्रिका का कार्यभार संभाला. इनके संपादन में निकालने वाले अंकों को खूब सराहा गया.

यह वह दौर था, जब भारतीयों पर अंग्रेजी हुकूमत का जुल्म बढ़ता जा रहा था. नरेंद्र शर्मा से जब यह सब न देखा गया तो इन्होंने भी दूसरे क्रांतिकारियों की तरह अंग्रेजी हुकूमत का विरोध करने की ठान ली, जिसकी वजह से इन्हें गिरफ्तार कर लिया गया. वे लगभग 3 सालों तक जेल में रहे और इस दौरान इनकी मुलाकात देश के प्रसिद्ध क्रांतिकारियों शचींद्रनाथ सान्याल और जयप्रकाश नारायण से हुई.

1943 में नरेंद्र शर्मा जेल से बाहर आए. तब सुप्रसिद्ध साहित्यकार भगवतीचरण वर्मा के आग्रह पर ये मुंबई आ गए और सिने जगत से जुड़ गए. सिने जगत से जुड़ने के बाद भी इनका साहित्य जगत से लगाव जरा भी कम न हुआ और दोनों ही क्षेत्रों को लगातार अपनी सेवाएं देते रहे. साहित्यिक सेवा करते हुए इन्होंने जहां एक ओर ‘प्रवासी के गीत’, ‘मिट्टी और फूल’ और ‘मनोकामना’ जैसी अद्भुत रचनाएं रचीं, वहीं सिने जगत को भी एक से बढ़कर एक अमर गीत दिए. इन्होंने तकरीबन 55 फिल्मों के लिए 650 गीत रचे.

यूसुफ खान को दिलीप कुमार बनाया तो ‘विविध भारती’ नाम भी सुझाया

‘बॉम्बे टॉकीज’ की स्थापना करने वाली देविका रानी ने अपनी ब्लॉकबस्टर फिल्म ‘ज्वार-भाटा’ के लिए नायक के रूप में यूसुफ खान नाम के एक पठानी नवयुवक को चुना था, लेकिन दिक्कत की बात यह थी कि उन्हें सिने जगत में अपनी फिल्म के नायक का नाम यूसुफ खान कुछ जंच नहीं रहा था.

इस बारे में उन्होंने पंडित नरेंद्र शर्मा से सलाह-मशविरा किया और कोई अच्छा-सा नाम सुझाने की बात कही. तब नरेंद्र शर्मा ने देविका रानी को दो नाम सुझाए— एक, वासुदेव और दूसरा, दिलीप कुमार. देविका रानी को अपनी फिल्म के नायक के तौर पर ‘दिलीप कुमार’ नाम जंच गया और इस तरह यूसुफ खान ‘दिलीप कुमार’ बन गए.

नरेंद्र शर्मा ‘आकाशवाणी’ से भी जुड़े रहे. यह साल 1957 की बात है, जब भारतीय रेडियो प्रसारण के क्षेत्र में एक ऐसा चैप्टर जुड़ा, जो अमर हो गया. इस चैप्टर का नाम है ‘विविध भारती’. यह भारतीय रेडियो प्रसारण का सबसे लोकप्रिय चैनल है, जिसे खूब सराहना मिली. इस चैप्टर को ‘विविध भारती’ नाम देने वाले भी नरेंद्र शर्मा ही हैं.

फिल्मी गीत लिखने के बावजूद बनी रही साहित्यिक गरिमा

यह एक बड़ी बात है कि सिने जगत से जुड़ने के बाद भी नरेंद्र शर्मा ने अपनी साहित्यिक गरिमा बरकरार रखी. इन्होंने साहित्य जगत से मुंह न मोड़ा और फिल्मी गीत लिखने के साथ-साथ अपनी साहित्य-साधना में भी लगे रहे. सिने जगत में अपनी एक विशिष्ट पहचान रखने वाली ब्लॉकबस्टर फिल्म ‘सत्यम शिवम सुंदरम’ के गीत भी इसी महान साहित्यकार ने लिखे. यह गीतों का ही प्रभाव था कि फिल्म को चारों ओर से सराहना मिली.

बहुमुखी प्रतिभा के धनी पंडित नरेंद्र शर्मा ने टीवी जगत के सबसे लोकप्रिय धारावाहिक ‘महाभारत’ के निर्माण में भी अपना अहम रोल अदा किया. जब बी.आर. चोपड़ा यह अमर धारावाहिक बना रहे थे, तब नरेंद्र शर्मा ने परामर्शदाता के रूप में अपनी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई थी. ‘आज के बिछुड़े न जाने कब मिलेंगे’ जैसे अमर गीत रचने वाले महाकवि पंडित नरेंद्र शर्मा ने 11 फरवरी, 1989 को हार्ट अटैक के कारण इस दुनिया अलविदा कह दिया.

एम.ए. समीर कई वर्षों से अनेक प्रतिष्ठित प्रकाशन संस्थानों से लेखक, संपादक, कवि एवं समीक्षक के रूप में जुड़े हैं. वर्तमान समय में स्वतंत्र रूप से कार्यरत हैं. 30 से अधिक पुस्तकें लिखने के साथ-साथ अनेक पुस्तकें संपादित व संशोधित कर चुके हैं.

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