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लेनिन की मूर्ति तोड़ना राजनीतिक लफंगेपन की निशानी: आशुतोष

त्रिपुरा विधानसभा चुनाव के नतीजों के बाद हिंसा बढ़ती जा रही है 

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लेनिन की मूर्ति तोड़ना राजनीतिक लफंगेपन की निशानी: आशुतोष
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सुबह जब अखबार देखा तो तकलीफ हुई. त्रिपुरा में लेनिन की मूर्ति को बीजेपी के समर्थकों ने जेसीबी लगाकर तोड़ डाला . और लेनिन के सिर के साथ फुटबॉल खेला . त्रिपुरा में 25 साल तक वामपंथ की सरकार थी और इसी दौरान लेनिन की मूर्ति लगाई गई . नि:संदेह, लेनिन वामपंथ के सबसे बड़े नेता हैं और 1917 की वामपंथी क्रांति के सबसे बड़े प्रतीक चिन्ह भी .

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त्रिपुरा में लेनिन की मूर्ति तोड़ कर उसके सिर से फुटबॉल खेला गया
फोटो:Twitter

पिछली शताब्दी में कार्ल मार्क्स के बाद सबसे बड़े प्रेरणा पुरूष भी लेनिन ही थे . उनसे प्रेरणा लेकर दुनिया को दूसरे हिस्सों में वामपंथी क्रांतियों को अंजाम दिया गया . भारत में भी उनके समर्थकों की कमी नहीं है . भले ही वामपंथी न जाने कितने धड़ों में बंटे हों पर लेनिन पर किसी भी वामपंथी दल को कभी भी अविश्वास नहीं रहा . आज भी दुनिया में वामपंथ के किले ढहने के बाद लोग लेनिन का सम्मान करते हैं . ऐसे में भारत में उनके साथ हुये दुर्व्यवहार पर मन दुखी हो जाता है .

मुझे ये दोहराने की जरूरत नहीं है कि मैं कभी भी वामपंथ का मुरीद नहीं रहा . छात्र जीवन में मेरे कई मित्रों ने मुझे सीपीएम-सीपीआई-सीपीआई(एमएल) का सदस्य बनाने की कोशिश की पर वे कभी कामयाब नहीं हुए .

मुझे वामपंथ में सर्वहारा की लड़ाई अच्छी लगती थी, ये भी अच्छा लगता था कि वो वर्गविहीन समाज के निर्माण का सपना देखता है, ये भी ठीक लगता था कि वामपंथ पूंजीवाद को चुनौती देनेवाला एक वैचारिक आंदोलन है पर मुझे सशस्त्र क्रांति की बात नहीं समझ में आती थी .
वामपंथ पूंजीवाद को चुनौती देनेवाला एक वैचारिक आंदोलन है
फोटो:Twitter

समाज परिवर्तन के लिए हथियार का इस्तेमाल मुझे ठीक नहीं लगता था . मैं गांधी को अपना हीरो मानता था . गांधी में तमाम खामियों के बाद अहिंसा मुझे अच्छी लगती थी . उनका धर्म से ज्यादा अध्यात्म पर जोर मुझे आकर्षित करता था . इसके बावजूद मैं हमेशा मानता था कि लेनिन पिछली शताब्दी के तीन सबसे बड़े नेताओं में से एक हैं . मैं ये भी जानता हूं कि 1991 में सोवियत संघ के ढहने के बाद पोलैंड, चेकोस्लोवाकिया, रोमानिया जैसे देशों में वामपंथी सरकारों के गिरने के बाद वहां लेनिन की मूर्तियों के साथ यही बर्ताव किया गया था .

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और ये भी सच है कि इराक में अमेरिकी फौज के हमले के बाद जब वहां सद्दाम हुसैन को सत्ता से बेदखल किया गया था तब भी सद्दाम की मूर्ति गिरायी गई थीं और उसके साथ फुटबॉल खेला गया था .

अमेरिकी मीडिया ने उस तस्वीर को जम कर दिखाया था, ये संदेश देने की कोशिश की थी इराक के लोग सद्दाम की तानाशाही से कितने ऊबे हुये थे, अमेरिका ने इराक पर हमला कर इराकियों को ‘आजाद’ कराने का काम किया है . हालांकि बाद में ये साबित हो गया था कि अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश और ब्रिटिश प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर ने पूरी दुनिया से झूठ बोला कि सद्दाम हुसैन न्यूक्लिअर बम बना रहा था और अगर उसे सत्ता से नहीं हटाया जाता तो वो पूरी दुनिया के लिए खतरा साबित होता .

असली मकसद 9/11 का बदला

उनका असली मकसद 9\11 की आतंकवादी हमले का बदला लेना था, पूरी दुनिया को बताना था कि अमेरिका पर आतंकवादी हमला करने का अंजाम क्या हो सकता है . सद्दाम जो ईरान-इराक युद्ध के समय में अमेरिका का पिट्ठू था , जिसे बलि का बकरा बना दिया गया था.

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9 सितंबर, 2001 को अमेरिका के वर्ल्ड ट्रेड सेंटर से टकराए थे आतंकियों के विमान 
(Photo: Reuters)

उसकी मूर्ति से तोड़फोड़ अमेरिका कार्रवाई को सही ठहराने का एक प्रयास था . यहां मेरा मकसद सद्दाम हुसैन की ज्यादतियों को सही ठहराना बिलकुल नहीं है . सद्दाम एक तानाशाह था और अपनी जनता पर उसने खासा जुल्म ढाया था, खासतौर पर कुर्द समुदाय के साथ .

इसी तरह जब तालिबान ने अफगानिस्तान पर कब्जा किया था तो जो एक तस्वीर मेरी जेहन में आज भी जिंदा है वो है बामियान घाटी में बुद्ध की विशाल मूर्ति को डायनामाइट लगाकर उड़ा दिया जाना . चौथी और पांचवीं शताब्दी की इस बेमिसाल मूर्ति को सिर्फ इसलिए उड़ा दिया गया था कि तालिबान के सर्वोच्च नेता मुल्ला ऊमर के मुताबिक बुद्ध की मूर्ति इस्लामी परंपरा के खिलाफ है. क्योंकि इस्लाम में मूर्ति पूजा की मनाही है .

पूरी दुनिया इतिहास की इस अद्भुत धरोहर और गांधार कला के खूबसूरत नमूने की बर्बादी पर सन्न रह गई थी . सद्दाम तो एक तानाशाह था . उसने अपनी जनता पर जुल्म किया था . पर बामियान की मूर्ति ने किसी का कुछ भी नहीं बिगाड़ा था . वो इतिहास के उस पन्ने को बस रेखांकित करती थी कि कैसे अफगानिस्तान का सिल्क रूट एक समय में बौद्ध धर्म का बड़ा केंद्र था . इस बेजान मूर्ति से नफरत का कोई कारण नहीं था . फिर मूर्ति क्यों उड़ाई गयी . ये एक सवाल है .

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मुर्ति उड़ाना नफरत का प्रतीक है . सद्दाम, अपनी जनता की नफरत से ज्यादा अमेरिकी नफरत का प्रतीक बन गया था . मध्य पूर्व एशिया के एक बड़े तबके को सद्दाम का इस तरह से अपमान अरब राष्ट्रवाद, अरब राष्ट्रीयता, अरब अस्मिता को पैरों तले कुचलना लगा था . तालिबान की मानसिकता बताने की जरूरत नहीं है . इस तरह की इस्लामिक कट्टरता ने एक अति आधुनिक अफगानिस्तान को मध्ययुगीन देश में बदल दिया . तालिबान ने अपनी नफरत में अफगानिस्तान को इतना पीछे धकेल दिया है कि उसे उबरने में सदियां लगेंगी . 
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नफरत . जी हां . लेनिन की मूर्ति तोड़ना नफरत ही है . वामपंथ से बीजेपी/आरएसएस का नफरत का ही रिश्ता है . आरएसएस प्रमुख गोलवलकर ने अपनी किताब में वामपंथ का शुमार देश के दुश्मनों में करते हैं . इनके मुताबिक वामपंथ एक विदेशी विचारधारा है . इसकी प्रतिबद्धता देश के प्रति न होकर सोवियत रूस और चीन की प्रति है . और वामपंथी रूस और चीन के इशारे पर भारत में अस्थिरता फैलाना चाहते है .

यही कारण है कि केंद्र में सरकार आने के बाद आरएसएस/बीजेपी ने वामपंथ को देशद्रोही साबित करना शुरू कर दिया . जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में कश्मीर के बहाने हमला महज इत्तेफाक नहीं हैं .

ये कहा गया कि जेएनयू आतंकवादियों का अड्डा है . भारत के टुकड़े करने वालों को प्रश्रय देता है . कन्हैया कुमार के साथ अदालत परिसर में जानलेवा हमला और उसके बाद हमलावरों पर किसी भी तरह की कार्रवाई न होना ये दर्शाता है कि ये एक सोची समझी योजना का हिस्सा है . इसी तरह दिल्ली के रामजस कालेज में भी वामपंथी छात्रों और अध्यापकों पर आरएसएस के छात्र संगठन ने हमला किया था . एक तरह का आतंक बरपा रहा कई दिन तक . पर यहां भी कार्रवाई के नाम पर ठन ठन गोपाल . त्रिपुरा में तो मान सकते है कि 25 साल शासन करने के बाद एक तबके में वामपंथ को लेकर गुस्सा है . पर जेएनयू और रामजस कालेज का क्या कुसूर ?

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यहां सवाल ये है कि आरएसएस/बीजेपी को ये हक कैसे मिल गया कि वो दूसरी विचारधारा के प्रतीक पुरूषों/चिन्हों के साथ फ़ुटबॉल खेले ? बीजेपी को ये नही भूलना चाहिए कि जनता ने बीजेपी को मौका दिया है पर इस चुनाव में भी वामपंथ को बीजेपी के बराबर 43% वोट मिले हैं . उसे ये भी नहीं भूलना चाहिए कि भारत की तुलना न तो सद्दाम के प्रकरण से हो सकती है और न ही बामियान से और न ही पुराने वामपंथी मुल्कों से .

भारत एक लोकतंत्र है . यहां ऊपर वर्णित मुल्कों की तुलना में लोकतांत्रिक परंपरा की जमीन काफी पुख्ता है . भारत में सत्ता का परिवर्तन बंदूक नली से नहीं होता है और न ही यहां पर तख्ता पलट की रवायत है . हर पांच साल के बाद चुनाव होता है, आज जो पार्टी भारी बहुमत से सरकार में है वो अगले ही पल पैदल हो सकती है जैसे वामपंथ त्रिपुरा में जमीन पर आ गया .

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आज तो बीजेपी/आरएसएस ने लेनिन की मूर्ति गिरा दी . अगर पांच साल बाद फिर वामपंथ सरकार में आ गया तो क्या त्रिपुरा में बीजेपी/ आरएसएस के हर नेता की मूर्ति को इसी तरह से ढहा कर फुटबॉल खेला जाना चाहिये ? क्या आरएसएस/बीजेपी ये परंपरा स्थापित करना चाहता है ? क्या आरएसएस/बीजेपी ये चाहता है कि लेनिन की तरह ही जहां जहां बीजेपी की सरकारें नहीं है जैसे ओडिशा, बंगाल, पंजाब, कर्नाटक, तेलंगाना, केरल, मिज़ोरम, तमिलनाडु, आंध्र, दिल्ली में उनके प्रतीक पुरूषों के साथ लेनिन जैसा ही व्यवहार हो ?

त्रिपुरा में 25 साल तक वामपंथ की सरकार थी और इसी दौरान लेनिन की मूर्ति लगाई गई थी
फोटो:Twitter
बीजेपी/आरएसएस को ये भी नहीं भूलना चाहिए कि वाजपेयी सरकार के समय संसद में तमाम विरोध के बाद भी आरएसएस/बीजेपी के प्रतीक पुरूष विनायक दामोदर सावरकर की तस्वीर टांगी गई थी . 2004 में वाजपेयी की सरकार चली गई . पर तस्वीर टंगी रही . जब कि सावरकर का नाम गांधीजी की हत्या में भी आया था, वो गिरफ्तार भी हुए थे . तो क्या कांग्रेस सरकार को सावरकर की तस्वीर को हटा देनी चाहिए?

लोकतंत्र में अहंकार और नफरत के लिए जगह नहीं होनी चाहिए. पर 2014 के बाद जिस तरह से फ्रिंज एलीमेंट के नाम पर अल्पसंख्यक, उदारवादियों पर हमले हो रहे है, वो चिंताजनक है . फिर चाहे पहलू खान या जुनैद की हत्या हो या फिर गो रक्षा के नाम पर ऊना में दलितों की क्रूर पिटाई या पूर्व प्रधानमंत्री वाजपेयी के सहयोगी रहे सुधींद्र कुलकर्णी का किताब विमोचन के समय मुंह काला करना हो, या पद्मावत की हीरोइन दीपिका पादुकोण की नाक काटने की धमकी, ये एक नई संस्कृति को जन्म दे रहे हैं.

ये संस्कृति ‘राजनीति के लफंगेपन’ की ओर इशारा करती है . मुहल्ले के गुंडों को देश की राजनीति की दिशा तय करने की इजाजत नहीं दी जा सकती . ये देश के लिये खतरनाक है . आरएसएस/ बीजेपी को भी इसकी कीमत दीर्घकाल में चुकानी पड़ेगी . क्योंकि गुंडों की कोई विचारधारा नहीं होती .

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