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अफगानिस्तान में तालिबान के कब्जे के बाद पाकिस्तान के जोखिम और चुनौतियां

तालिबान और पाकिस्तान के संबंध उतने अच्छे भी नहीं हैं जितना आमतौर पर दिखाई देता है या माना जाता है.

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कई सालों तक, पाकिस्तान (Pakistan) ने पश्तून राष्ट्रवाद और भारत की आलोचना के कथित खतरे के खिलाफ अपनी तालिबान (Taliban) समर्थक नीति का बचाव किया. इस उद्देश्य को पूरा करने के लिए, तालिबान को अफगानिस्तान में रणनीतिक पकड़ बनाने के लिए पाकिस्तान ने प्रायोजित किया.

अब जब से अमेरिका और पश्चिम के देशों ने अफगानिस्तान को तालिबान के हाथों में छोड़कर 20 साल के युद्ध को खत्म कर दिया, तब से पाकिस्तान को स्थानीय और अंतरराष्ट्रीय जिहादियों से जुड़ी एक और गंभीर चुनौती का सामना करना पड़ रहा है.

सीमा पार तालिबान अमीरात तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) के लिए ये मनोबल बढ़ाने वाला साबित होगा, जो हिंसक समूह है और पाकिस्तान में एक इस्लामी व्यवस्था के लिए 'जिहाद' करता है. इससे कई और जिहादी समूह जैस इस्लामिक स्टेट इन खुरासान प्रांत (ISKP), इस्लामिक मूवमेंट ऑफ उज़्बेकिस्तान (IMU) और जातीय उइघुर तुर्किस्तान इस्लामिक पार्टी (TIP) भी प्रेरणा लेंगे.

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पाकिस्तान की हिचक

पाकिस्तानी मीडिया में उत्साह होने के बावजूद, अफगानिस्तान में जोखिम साफ और स्पष्ट हैं, यही वजह है कि पर्यवेक्षक पाकिस्तान के नीतिगत हलकों में एक हद तक झिझक देखते हैं. इस्लामिक अमीरात को मान्यता देना या दूसरे जब तक मान्यता दें तब तक ऐसा करने से दूर रहना, इन दोनों के अपने-अपने परिणाम हैं.

एक सवाल के जवाब में, पाकिस्तान के आईएसआई प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल फैज हमीद हंसते हुए कहते हैं, "इसके बारे में चिंता मत करो, सब कुछ ठीक हो जाएगा,".

शीर्ष पाकिस्तानी अधिकारियों के कई बयानों से भी हिचकिचाहट दिखाई देती है. जुलाई में, विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी ने कहा था कि "तालिबानी बदल गए हैं" और उन्हें "स्मार्ट" और "समझदार" भी बताया. सेना और आईएसआई प्रमुखों ने एक ऑफ-द-रिकॉर्ड ब्रीफिंग में बताया कि अफगान और पाकिस्तानी तालिबान "एक ही सिक्के के दो चेहरे" हैं. इंटीरियर मिनिस्टर शेख राशिद अहमद ने लड़ाकों को "नया, सभ्य तालिबान" कहा, और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) मोईद यूसुफ ने वाशिंगटन में एक संवाददाता सम्मेलन में कहा कि पाकिस्तान अफगानिस्तान में "जबरदस्ती अधिग्रहण स्वीकार नहीं करेगा".

जोखिम और परिणाम

पाकिस्तान अतीत में अफगानिस्तान के संबंध में अमेरिका की "डू मोर" डिमांड यानी और अधिक करने की मांग के बारे में शिकायत करता रहा है. हमेशा की तरह पाकिस्तानी नेतृत्व का कहना है कि उनके देश को खून और पैसे के मामले में नुकसान उठाना पड़ा है और वह आतंकवाद पीड़ित रहा है. हालांकि, अमेरिका ने इसे अपने "गैर-नाटो सहयोगी" द्वारा दोहरे खेल के रूप में देखा.

पाकिस्तान के लिए कठिन क्षण तो तब आया जब चीन ने भी जुलाई में एक हमले के बाद अफगान में और अधिक करने का संकेत दिया, जब नौ चीनी इंजीनियर मारे गए थे. चीन को इस हमले के पीछे तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) और तुर्किस्तान इस्लामिक पार्टी (TIP) पर शक था, जिसे चीन पूर्वी तुर्किस्तान इस्लामिक मूवमेंट (ETIM) कहता है.

वैसे तालिबान कभी भी चीन के लिए सीधे तौर पर खतरा नहीं बना, लेकिन अफगानिस्तान में उनके 20 साल के विद्रोह ने टीटीपी, टीआईपी को सुरक्षित शरण दी है.

चीन को केवल अफगानिस्तान में आने वाले समय में विस्तार के लिए पाकिस्तान में अपनी महत्वाकांक्षी निवेश परियोजनाओं को जारी रखने के लिए एक सुरक्षित सुरक्षा वातावरण चाहिए. अब चीन की चिंताएं कम हों इसके लिए पाकिस्तान को कार्रवाई तो करनी होगी फिर चाहे वह टीआईपी (ईटीआईएम) के खिलाफ ही क्यों न हो.

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पहले की तरह सीधा नहीं रहा तालिबान

तालिबान और पाकिस्तान के संबंध उतने अच्छे भी नहीं हैं जितना आमतौर पर दिखाई देता है या माना जाता है. तालिबान नेतृत्व अपने पाकिस्तानी आकाओं के इरादों से अवगत है और तालिबान को समर्थन देने में उनकी रणनीतिक और विदेश नीति से परिचित भी है.

पिछले कुछ महीनों के दौरान दोहा के दौरे पर आने वालों में से कुछ लोगों ने निचले और मध्यम श्रेणी के तालिबान प्रतिनिधियों से बात करने के बाद बताया कि "तालिबान नेतृत्व पाकिस्तान के बारे में उतना ही संदिग्ध है जितना कि तालिबान के बारे में पाकिस्तानी हैं".

अंतरराष्ट्रीय मोर्चे पर, पाकिस्तान पर तालिबान को सरकार बनाने को मजबूर करने का दबाव बढ़ रहा है. लेकिन ऐसा करने पर तालिबान नेतृत्व को अपने ही कट्टरपंथियों के विरोध का डर है, जो 20 सालों तक लड़े.

इस बीच, पाकिस्तान सभी जातियों के प्रतिनिधियों वाली सरकार बनाने के लिए तालिबान पर दबाव का उपयोग करके अपने संबंधों को जोखिम में डाल रहा है क्योंकि ऐसा न करने पर पाकिस्तान के पश्चिमी देशों के साथ संबंधों बिगड़ सकते हैं.

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