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मोदी और मुसलमानों पर उनके बयान: डैमेज-कंट्रोल मोड में PM या विरोधाभासों के पुलिंदा?

मुसलमानों पर निशाना साधने वाले भाषणों के बाद, मोदी ने हाल ही में दावा किया कि उनका वह मतलब नहीं था, जो निकाला जा रहा है.

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यदि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (PM Modi) के सत्ता में रहने की एक दशक की कहानी को एक फिल्म की तरह लिखा जाए, तो उनके दिलचस्प व्यक्तित्व के विभिन्न पहलुओं को दर्शाने वाले फिल्म में तीन वर्जन हो सकते हैं.

पहले वर्जन में, उन्होंने अपने आकर्षक नारे- "सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास" के साथ भारत के युवा अल्पसंख्यक मुसलमानों के लिए अपने दृष्टिकोण को सामने रखा. सत्ता में अपने पहले पांच साल के कार्यकाल के अंत में उन्होंने मुसलमानों से कहा था, "मैं चाहता हूं कि आपके पास एक तरफ कुरान हो और दूसरी तरफ कंप्यूटर हो."

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दूसरे स्क्रिनप्ले में मोदी को नकारात्मक ढ़ंग से मुसलमानों पर निशाना साधते हुए दिखाया जा सकता है. प्रधानमंत्री के रूप में अपने दूसरे कार्यकाल के अंत में, मोदी ने मुसलमानों के प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष संदर्भ के साथ इतने सारे चुनावी भाषण दिए हैं कि उन सबके पीछे एक खास तौर-तरीके को नजरअंदाज करना मुश्किल है.

उन्होंने मुगल- मीट खाने वालों पर निशाना साधा, जो अक्सर मुसलमानों या उनकी संस्कृति को रूढ़िवादी हिंदू धर्म या इतिहास से अलग दर्शाता है. मोदी ने बार-बार कहा कि कांग्रेस पार्टी का चुनावी घोषणापत्र उनको स्वतंत्रता-पूर्व भारत में मुस्लिम लीग के एजेंडे की याद दिलाता है.

एक अन्य भाषण में, उन्होंने कहा कि कांग्रेस हिंदू पिछड़ी जातियों से आरक्षण छीनकर मुसलमानों को दे देगी. फिर बार-बार नकारे जा चुके विरासत कर के प्रस्ताव या आर्थिक सर्वेक्षण के बारे में भी मोदी ने अपनी राय रखी. एक भाषण में, उन्होंने कहा कि कांग्रेस हिंदू महिलाओं से मंगलसूत्र छीनकर मुसलमानों के बीच बांट देगी. दूसरे में, उन्होंने कहा कि कांग्रेस धन छीन लेगी और इसे घुसपैठियों और "जिनके कई बच्चे हैं" उनको दे देगी.

मोदी के भाषण को कवर करने वाले पत्रकारों ने बताया कि वह मुसलमानों को निशाना बना रहे थे. इस बात को मोदी ने नकार दिया है और यह इस फिल्म में मोदी का तीसरा, ग्रे वर्जन होगा.

इस आखिरी वर्जन को उनके निर्वाचन क्षेत्र, पवित्र शहर वाराणसी में बहती गंगा की बैकग्राउंड में फिल्माया गया है. इसमें मोदी ने दावा किया की कि उनका वह मतलब नहीं था, जो उनकी बातों से निकाला जा रहा है.
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उन्होंने इंटरव्यू ले रहे एक पत्रकार से कहा, "यहां तक ​​कि हिंदुओं के भी कई बच्चे हैं." उन्होंने कहा कि मैं जिस दिन हिंदू - मुसलमान करूंगा, मैं सार्वजनिक जीवन में रहने योग्य नहीं रहूंगा. लेकिन तथ्य यह है कि उन्होंने कांग्रेस नेता और पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के एक भाषण का जिक्र करते हुए मुसलमानों की ओर इशारा करके "घुसपैठिए" शब्द का प्रयोग किया था.

क्या मोदी विरोधाभासों का पुलिंदा हैं या वे डैमेज-कंट्रोल मोड में हैं?

वास्तव में, देखने पर ऐसा लगता है मानो मोदी 18 साल बाद आनुपातिक रूप से उस गलती का बदला ले रहे थे, जो डॉ. मनमोहन सिंह ने 2006 में की थी जब उन्होंने एक भाषण में अपने शब्दों में अनुसूचित जाति, जनजातीय लोगों और मुस्लिम अल्पसंख्यकों के संदर्भों को एक साथ जोड़ दिया था. इस भाषण का जो जैसा चाहता वैसा मतलब निकाल सकता था. मनमोहन सिंह के ऑफिस ने मामले को स्पष्ट करने के लिए एक बयान जारी किया था, लेकिन मोदी ने उसे नजरअंदाज कर दिया.

यही नहीं, "मैं हिंदू-मुस्लिम नहीं करता" वाले अपने इंटरव्यू के ठीक एक दिन बाद ही मोदी ने भाषण दिया कि कांग्रेस पार्टी मुसलमानों पर बजट का 15 प्रतिशत खर्च करना चाहती है और पार्टी का बजट एजेंडा "विभाजनकारी" था.

यह स्पष्ट है कि मोदी कांग्रेस पार्टी के उन दावों का काउंटर कर रहे हैं कि बीजेपी भारत के संविधान में आमूल-चूल परिवर्तन करना चाहती है. इसके जवाब में मोदी का दावा है कि विपक्षी दल धर्मों के बीच समानता के सिद्धांत को नष्ट करना चाहता है. सूक्ष्म तथ्य यह है कि संविधान "अन्य पिछड़ा वर्ग" (OBC) के लिए कोटा प्रदान करता है और इसमें मुस्लिम समुदाय के वर्ग भी शामिल हैं. हालांकि आमतौर पर यह गलत समझा जाता है कि C का अर्थ "जातियां/ कास्ट" है, न कि "वर्ग/क्लास".

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कांग्रेस और बीजेपी, दोनों ही इस पर जोर देते हुए स्पष्ट नहीं करते हैं, जिससे गलत व्याख्या और राजनीतिक छींटाकशी की गुंजाइश बनी रहती है. यह अक्सर बदसूरत कट्टरता का खतरा पैदा करती है. मोदी कांग्रेस की कमजोरी का फायदा उठाते हैं, जो यह स्पष्ट नहीं करती है कि वह केवल वंचित मुसलमानों को ओबीसी के एक छोटे उप-वर्ग के रूप में मानती है.

सवाल बड़े हैं. क्या मोदी विरोधाभासों का पुलिंदा हैं? या क्या वह विवादास्पद चुनावी भाषणों से पिछले तीन हफ्तों में उभरी आलोचना को लेकर डैमेज-कंट्रोल मोड में हैं? या मोदी ऐसे कट्टरपंथी हैं, जो मुसलमानों को निशाना बनाने वाले भाषणों के माध्यम से भारतीयों का ध्रुवीकरण कर रहे हैं?

इसका जवाब इस बात पर निर्भर करता है कि आप किससे बात कर रहे हैं. हमें मोदी के बयानों को समझने के लिए उससे जुड़े सभी सवालों को उसके उचित संदर्भ में जांचने की आवश्यकता है.

नेता के समर्थक और कट्टर फॉलोअर्स यह कहने के लिए बाध्य हैं कि सामने वाले ने या किसी पत्रकार ने उनकी बात का गलत मतलब निकाला है. उन्होंने अपने नेता के दावों को आंख मूंदकर सच मान लिया है. लेकिन हमें नेता के फेस वैल्यू से परे देखने की जरूरत है. भले मोदी थोड़ा भी पर्दे के पीछे से निशाना साध रहे हैं, लेकिन बीजेपी कार्यकर्ताओं और यहां तक ​​कि पार्टी द्वारा नियुक्त राज्यों के राज्यपालों सहित वरिष्ठ नेताओं ने कोई कसर नहीं छोड़ी है.

सोशल और डिजिटल मीडिया में बीजेपी समर्थक और उसके दक्षिणपंथी सहयोगी स्पष्ट रूप से मुसलमानों या उनकी धार्मिक प्रथाओं और बहुत कुछ को निशाना बनाते हैं. बीजेपी खुद दंगा भड़काने वालों को चुनाव टिकट देती है, जो मुस्लिम समुदाय के ऐतिहासिक जुड़ावों या समकालीन नेताओं को निशाना बनाने के लिए आक्षेप, संकेत और इससे भी बदतर तरीकों का इस्तेमाल करते हैं.
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देश के सबसे अधिक आबादी वाले राज्य, उत्तर प्रदेश में पार्टी की सरकार है और उसके एक भी विधायक मुस्लिम समुदाय से नहीं है. इस साल वाराणसी से चुनाव लड़ने के लिए मोदी के संसदीय चुनाव नामांकन में दलितों और पिछड़ी जातियों के प्रस्तावक नजर आए, लेकिन एक मुस्लिम स्पष्ट रूप से अनुपस्थित था. लगातार भाषणों में, बीजेपी नेता कांग्रेस पार्टी द्वारा मुस्लिम "तुष्टिकरण" पर निशाना साधते हैं, जिसे समकालीन सामाजिक न्याय शब्दावली में "समावेश" या "सकारात्मक कार्रवाई" की नीति के रूप में देखा जाएगा.

क्या भारत में एक ऐसा प्रधानमंत्री और सत्तारूढ़ दल है, जो एक ऐसे धार्मिक समुदाय को दरकिनार कर देता है, जिसकी आबादी पिछली जनगणना के आंकड़ों के आधार पर कुल आबादी का 14 प्रतिशत है? बीजेपी का कहना है कि वह भारतीयों को धार्मिक आधार पर विभाजित नहीं करती है. भले ही वह विकासात्मक नीतियों में जाति या लिंग के आधार पर पिछड़ेपन को स्वीकार करती है लेकिन यह मुसलमानों के बीच वंचितों को पहचानने से इनकार करती है. इसे ही एनालिस्ट ध्रुवीकरण की राजनीति कहते हैं.

यह उदारवादी विचारकों और बहुलवाद/प्लूरलिज्म की शपथ लेने वाले पश्चिमी लोकतंत्रों के राजनयिकों को चिंतित करता है, लेकिन बीजेपी का एक ही जवाब होता है: "जिनको बुरा लगेगा वो मायने नहीं रखते हैं, जो लोग मायने रखते हैं, उन्हें बुरा नहीं लगेगा." मोदी का वैचारिक दांव भी एक चुनावी दांव है, जो हिंदी पट्टी में कच्ची धार्मिक भावना और बहुलवादी आदर्शों के बीच अलगाव पर खेला जाता है.

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विपक्ष बिखरा हुआ है और अक्सर अल्पसंख्यकों की रक्षा करते समय मुसीबत में पड़ जाता है - और अक्सर बीजेपी के आक्रामक प्रचारकों के पिच पर खेलता है. मुगल इतिहास या मंदिरों के विनाश के परोक्ष संदर्भों के माध्यम से बीजेपी अक्सर धार्मिक भावनाओं को ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संदर्भ में व्यक्त करती है. इस तरह बीजेपी मध्ययुगीन, प्राचीन और आधुनिकता के बीच के विभाजन को धुंधला कर देती है.

इससे एक सवाल उठता है: क्या इससे मोदी को एक वैश्विक नेता के रूप में नुकसान नहीं होगा जो वसुधैव कुटुम्बकम् के नारे के साथ वैश्विक शिखर सम्मेलनों में भाग लेते हैं?

इसका निंदनीय उत्तर यह होगा कि ऐसी दुनिया में जहां अमेरिका गाजा में नागरिकों पर बमबारी करने वाले इजरायल का समर्थन करता है और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की सेना यूक्रेन में नागरिक इमारतों को निशाना बनाती है, वहां नैतिक अधिकार के मामले में किसी भारतीय प्रधानमंत्री द्वारा की गई कुछ दोहरी बातें शायद ही मायने रखती हैं.

बीजेपी के कट्टर हिंदू राष्ट्रवादी, जो मोदी को भगवान के रूप में देखते हैं, वे आधुनिक उदारवादियों को खुद के विचार रखने वाले प्रतिद्वंद्वी विचारकों के रूप में नहीं बल्कि पश्चिमी धुनों पर नाचने वाले विदेशी एजेंटों के रूप में देखते हैं.

एक तरह से मोदी गेम ऑफ थ्रोन्स में दबदबा बनाए बैठे हुए हैं. यदि वह तीसरा कार्यकाल जीतते हैं, तो राजनीतिक शक्ति नामक डिटर्जेंट उन्हें चुनावी अंधराष्ट्रवाद के पापों को धोने में मदद कर सकता है. यदि वह हार जाते हैं, तो उनकी राजनीतिक शक्ति की महिमा भले कम हो जाए अपने समर्थकों में दबदबा कम नहीं होगा.

(लेखक एक वरिष्ठ पत्रकार और टिप्पणीकार हैं, जिन्होंने रॉयटर्स, इकोनॉमिक टाइम्स, बिजनेस स्टैंडर्ड और हिंदुस्तान टाइम्स के लिए काम किया है. उनसे ट्विटर @madversity पर संपर्क किया जा सकता है. यह एक ओपिनिय पीस है और व्यक्त किए गए विचार लेखक के अपने हैं. क्विंट हिंदी का सहमत होना आवश्यक नहीं है.)

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