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सेबी का नया फैसला: म्यूचुअल फंड निवेशकों के लिए क्या बदलेगा

नए नियमों के मुताबिक अपने आप को ढालने के लिए सेबी ने म्युचुअल फंड कंपनियों को 3 महीने का समय दिया है.

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40 से ज्यादा म्यूचुअल फंड कंपनियां और करीब 2,000 म्यूचुअल फंड स्कीमों में से निवेश के लिए सही फंड का चुनाव बेहद मुश्किल है. और ये चुनाव तब और मुश्किल हो जाता है जब एक ही कंपनी अलग-अलग नामों से एक जैसी कई फंड स्कीमों को लॉन्च कर देती है. लेकिन अब म्यूचुअल फंड निवेशकों की फंड चुनने की मुश्किल थोड़ी आसान हो जाएगी. सेबी ने शुक्रवार को म्यूचुअल फंड इंडस्ट्री के लिए एक बड़े रिफॉर्म का ऐलान कर दिया है.

सेबी ने साफ किया है कि अब म्यूचुअल फंड सिर्फ पांच सेगमेंट के दायरे में ही अपनी स्कीम चला पाएंगे. ये सेगमेंट हैं इक्विटी, डेट, हाइब्रिड, सॉल्यूशन ओरिएंटेड और अन्य. इक्विटी सेगमेंट में 10 कैटेगरी रखी गई हैं जिनमें मल्टीकैप, लार्जकैप, मिडकैप, स्मॉलकैप और ईएलएसएस (इक्विटी लिंक्ड सेविंग् स्कीम) शामिल हैं.

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डेट सेगमेंट में 16 कैटेगरी हैं जिनमें लिक्विड, अल्ट्रा शॉर्ट ड्यूरेशन, मनी मार्केट और डायनामिक बॉन्ड शामिल हैं. हाइब्रिड सेगमेंट में 6 कैटेगरी हैं वहीं सॉल्यूशन ओरिएंटेड में 2 कैटेगरी बनाई गई हैं. फंड हाउसों को हर वर्ग में केवल एक ही स्कीम रखने की इजाजत होगी. हालांकि इस नियम से इंडेक्स फंड, ईटीएफ (एक्सचेंज ट्रेडेड फंड), फंड ऑफ फंड्स और थीमैटिक स्कीमों को बाहर रखा गया है.

म्यूचुअल फंड निवेशकों को क्या फायदे होंगे

नए नियमों के मुताबिक अपने आप को ढालने के लिए सेबी ने म्यूचुअल फंड कंपनियों को 3 महीने का समय दिया है. इस दौरान सभी कंपनियों को ये सुनिश्चित करना होगा कि सेबी की बनाई कैटेगरी के हिसाब से उनकी एक ही म्यूचुअल फंड स्कीम बाजार में रहे. अगर एक से ज्यादा ऐसी स्कीमें चल रही होंगी तो कंपनियों को उनका विलय करना होगा. सेबी के नए ऐलान से एक आम म्यूचुअल फंड निवेशक को क्या फायदे होंगे, आइए देखते हैं:

कम होगा कंफ्यूजन

एसोसिएशन ऑफ म्यूचुअल फंड्स इन इंडिया यानी एम्फी के मुताबिक देश में 41 एसेट मैनेजमेंट कंपनियां या म्यूचुअल फंड हाउस हैं, जिनकी 830 ओपन एंड और 1095 क्लोज एंड स्कीमें चल रही हैं. इतनी ज्यादा स्कीमें आम निवेशक को कंफ्यूज करती हैं. सेबी के नए ऐलान के बाद स्कीमों की संख्या कम से कम 20-25% घट जाएगी, जिससे निवेशकों के लिए चुनाव आसान होगा. होता ये भी है कि एक ही म्यूचुअल फंड हाउस एक जैसी कैटेगरी के एक से ज्यादा स्कीमें चला रहा होता है, जिनमें कोई खास अंतर नहीं होता है. हम आपको यहां ऐसे दो उदाहरण दे रहे हैं. लार्जकैप फंड कैटेगरी में एसबीआई म्यूचुअल फंड की दो स्कीमें हैं—एसबीआई निफ्टी इंडेक्स फंड और एसबीआई मैग्नम इक्विटी फंड. इन दोनों ही फंड का बेंचमार्क है निफ्टी 50. और अगर आप दोनों स्कीमों के पोर्टफोलियो पर नजर डालें तो उनमें भी बेहद मामूली अंतर है.



नए नियमों के मुताबिक अपने आप को ढालने के लिए सेबी ने म्युचुअल फंड कंपनियों को 3 महीने का समय दिया है.
2 अलग स्कीमें लेकिन शेयर एक जैसे
(फोटो: क्विंट हिंदी/तरुण अग्रवाल)
इसी तरह मिडैकप कैटेगरी में एलएंडटी म्यूचुअल फंड की दो स्कीमें हैं- एलएंडटी मिडकैप फंड और एलएंडटी इमर्जिंग बिजनेसेज फंड. इन दोनों ही फंड के पोर्टफोलियो में मौजूद शेयरों पर अगर नजर डालेंगे तो काफी समानता दिखेगी. अंतर बस ये होगा कि किसी सेक्टर के शेयरों में एक स्कीम का निवेश दूसरे से कुछ ज्यादा है.


नए नियमों के मुताबिक अपने आप को ढालने के लिए सेबी ने म्युचुअल फंड कंपनियों को 3 महीने का समय दिया है.
2 अलग स्कीमें लेकिन सेक्टर एक जैसे
(फोटो: क्विंट हिंदी/तरुण अग्रवाल)

ऐसे उदाहरण आपको कमोबेश हर म्यूचुअल फंड हाउस की स्कीमों में मिल जाएंगे.

लार्जकैप मतलब लार्जकैप फंड

सेबी ने लार्जकैप, मिडकैप और स्मॉलकैप कंपनीज की परिभाषा भी तय कर दी है. सेबी ने कहा है कि मार्केट कैपिटलाइजेशन के हिसाब से टॉप 100 कंपनियां लार्जकैप कहलाएंगी, 101 से 250वें नंबर तक की कंपनियां मिडकैप होंगी और 251वें से नीचे की कंपनियां स्मॉलकैप. ये लिस्ट एम्फी की वेबसाइट पर साल में दो बार- जून और दिसंबर के अंत में अपडेट की जाएगी. इसके बाद म्यूचुअल फंड हाउस अपनी अलग-अलग परिभाषाएं नहीं गढ़ पाएंगे. और जिस कैटेगरी के शेयरों में निवेश का वादा होगा, उसी कैटेगरी में निवेश अनिवार्य होगा. इससे ना सिर्फ फंड स्कीमों की रेटिंग आसान होगी, बल्कि एक जैसी कैटेगरी की स्कीमों की परफॉर्मेंस की तुलना भी की जा सकेगी.

निवेश पर रिटर्न बेहतर होंगे

म्यूचुअल फंड स्कीमों का विलय होने से निवेशकों को एक और फायदा होगा. दरअसल म्यूचुअल फंड स्कीमों के एसेट अंडर मैनेजमेंट (एयूएम) के आधार पर उनके खर्च तय होते हैं. पहले 100 करोड़ के एसेट पर अधिकतम 2.5%, अगले 300 करोड़ पर 2.25%, फिर उसके बाद 300 करोड़ पर 2% और उसके बाद के एसेट पर 1.75% से ज्यादा खर्च नहीं किया जा सकता. जब स्कीमों का विलय होगा तो उनका एसेट साइज बड़ा होगा तो एक्सपेंस रेश्यो कम हो जाएगा. और कंपनियों के कम खर्च का फायदा बेहतर रिटर्न के रूप में निवेशकों को मिलेगा.

निवेशकों को नजर बनाए रखनी होगी

वैसे तो इस बात की आशंका काफी कम है कि सेबी के फैसले के बाद कोई स्कीम बंद होगी, फिर भी निवेशकों को इस बारे में अपने म्यूचुअल फंड हाउस से पता कर लेना चाहिए. किसी फंड की स्कीमों का विलय होने के बाद निवेशक को ये भी देखना होगा कि नई स्कीम उसकी जरूरत पर खरी उतरती है या नहीं. ऐसा ना होने पर उसके पास विकल्प होगा उस स्कीम से निकलकर किसी दूसरी स्कीम में निवेश करने का. हालांकि ऐसा करने पर निवेशकों को अपनी होल्डिंग पीरियड और म्यूचुअल फंड की कैटेगरी के मुताबिक टैक्स भी देना पड़ सकता है. इसलिए जरूरी है कि वो अपने आंख-कान खुले रखें. अपनी म्यूचुअल फंड कंपनी के संपर्क में रहें, बदलावों को समझें और फिर फैसला करें.

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